मुक्तिकमी लोक

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Wardha, Maharashtra, India

Saturday, 14 November 2020

एक उजास भरा पन्ना


आवारा की डायरी......

एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....
                                     
                                         ● सतीश छिम्पा

(एक नहीं अनेक हैं वे स्त्रियां जिनके होने से संभव हुआ मेरा भी होना)
                                       

एक या दो ही नहीं
अनेक थीं वे
वे जो लोकगीत की शैली में प्रीत के गीत
शोकगीत, हरजस, कूकड़ो गातीं हुई आई जीवन मे
कुछ वे जो लोकगाथाओं का टॉनिक जीवन द्रव्य बनाकर दे गई थीं बाहर ही
एक वो, जिसने ईमान को पक्का करके, स्थाई रखना सिखाया
जी हां भाई, कोई एक या दो नहीं बल्कि सारे गांव और ढाणी और चक और झुग्गियां और फेक्ट्रियो में खपने, फंसने और दबाए जाने वाली स्त्रियां
पोछा, झाड़ू और कम दिहाड़ी वाली पीले रंग और हर वक्त बीमार अंग अंग की धनी ये स्त्रियां 
एक साथ औचक, गरिमामय और भिन्न भिन्न इलाको और मौसमो और समय मे कर के जापा जना था मुझको
अलग अलग होकर भी एक जो थीं
उन उदास चेहरे और सूनी आंखों वाली महिलाओं ने पाला था मुझको....
अन्याय के विरुद्ध उठ खड़े होने, चलने और जीवन से जीवन तक
और फिर महान मुक्ति समर तक का सफर तय हुआ
इन्ही स्त्रियों के कारण
                             
मैं कोई दरवेश, गांधी या देवता नहीं ना पीर या औलिया कि हर तरह से पवित्र और साफ होऊं, या मैं कोई जींवता पित्तर भी नहीं कि सामाजिक आदर्शवादी प्रदूषण को नज़रंदाज़ कर सकूं। मैं आदमी हूँ, पाश के शब्दों में कहूँ तो तमाम छोटी बड़ी चीजों से मिलकर बना हूँ। निर्मम  आत्मालोचना के अभाव में जो प्रदूषण बाहर है, कलाओं में- सब भीतर पैठकर आदमी को मार देता है। बचता है तो बस एक लिक्खाड़। दो पाया आदमखोर। मैं जब आत्मालोचना के निर्मम पक्ष को उभारने में सफल हुआ और कमजोरियों को काटकर सकारात्मक हुआ तो अचानक हुए इस बेहतरीन बदलाव से अनेक यथास्थितिवादी मित्रों की मूक नाराजगी, दुश्मनी झेलने को मिली। अभी भी यही चल रहा है। समय है, समाज इसी को देखकर बदलता है- आप मानसिक गुलामी का पट्टा उतार कर फेंकेंगे तो बुर्जुआजी बख्शेगा कैसे ?  मगर जीवन का प्यार भाया तो ऐसा भाया कि जच गई इस अंधकार के कारावास से निकलने की और निकल आया, कलाओं की पूंजीवादी मध्यमार्गी प्रदूषित, दिमागी गुलामी से आज़ाद हो गया। 

       मैं दिमाग़ी बोझ झेल नहीं पाता था, चिंताएं मेरे सोच मेरे सब कुछ को निचोड़ डालती था। बहुत जल्दी मैं अवसाद में आ जाता था। सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक दंद फंद देखकर मेरा खून जलता था, जानता था कि कुछ कर नहीं पाऊंगा क्योंकि यहां जो सबसे ज्यादा सेटिंगबाज है, वो सबसे ज्यादा सम्मान पाता है। एक पचास वर्षीय अध्यापक ग्यारहवीं जमात की पन्द्रह साला लड़की के संवेगों का फायदा उठाकर  बलात्कार करते हुए उसको बीमारी की हद पर लेजाकर पटक देता है। बच्चों का जीवन बर्बाद कर देना, गुटबाजी, अपने शब्द युवाओ की जबान पर रखकर महान संघर्षशील का खिताब लेने के बचकाने तरीके, उफ्फ ये प्रदूषक तो इनके आदर्श हैं। एक अधेड़ शोध निर्देशक तब तक गरीब परिवार की लड़की को सताता है, जब तक कि वो कोम्प्रोमाईज़ ना कर ले। ये धनपशु पकड़े जातें हैं कुकर्म करते हुए... कुछ बिगड़ता तक नहीं । इतना कुछ हो जाने के बाद भी ये लोग सम्मानित बने हुए हैं और कोई पछतावा या ग्लानि भी नहीं है तो समाज के सभ्यक विषय पर शोध किया जाना चाहिए।

  मुझे बुर्जुआ फ़ितरतों से नफरत है और सरमायदारी की शह पर चल रहे विमर्शों से उतनी ही नफरत है जितनी फासीवादियों से है।  स्त्री मेरे लिए कभी भी किसी  लिसलिसे आदर्श रूप में नहीं रही है। वे मौलिक अंदाज में उपस्थित है, जैसे पुरुष है, लेकिन उससे मेरे अस्तित्व के काफी ज्यादा नज़दीक है। मेरा जन्म हरयाणा के एक संपन्न किसान परिवार में - एक घरेलू कामगार  स्त्री की कोख से हुआ है। एक ऐसी मज़दूर जो एक पांव की धिराणी हैं। विकलांगता को धत्ता बताकर सामाजिक जटिलताओं और पारिवारिक उपेक्षाओं को हाशिए पर डालकर स्त्री ने मुझे एक बेहद मजबूत धरातल पर टिका दिया था। मेरा पालन पोषण किसी एक नहीं बल्कि अनेक स्त्रियों के बीच उन्ही की गोदी में खेल कूद कर हुआ था। मुझे जन्म देने वाली स्त्री कामगार तो पहला घुंटीया देने वाली बोळती नानी (गांव में बोळती कहते थे इस बहुत ज्यादा बुजुर्ग दलित महिला को, नायक जाति की थीं जो मिथकीय झूठ को कथा रूप में सुनाती, मेरी प्रिय नानियों में से एक थी।) थीं तो मुझे दूध पिलाकर जीवनदान देने वाली स्त्री किसान जाट थीं जो मौसी लगती थी।

       पहले पहल मुझको गोद मे उठाकर जो बाहर लेकर आई थी वो मेरी बहन प्रमिला थी। पालन पोषण के दौर में मुझे गोद का झूला और जीवन के मासूम पक्षो को दिखाने वाली औरतें, चमार और मजहबी थीं, मेरी नानी, मामी और मौसियां वे ही थीं। कभी जब ददिहाल (दादेरै) जाते तो भुआ, चाची मुझे गोद में लेकर घुमाने ले जाती। ननिहाल में सां'ड बिमाणनै के लिए जब नाना जी इधर उधर किसी बास में जाते तो मुझे टोडिया दिखाने लेकर जाया करती थी पंडितों की इंदो मौसी,  उनके घर मे भी दो टोडिए थे। जीवन मे जो सबसे पहली पहल की पसंदीदा चीज थी वो एक कीसानी परिवार से आई मामी ने खिलाई थी..... ताजा चूंटीया और आज तक मैं उसकी मिठास और स्वाद के तिलिस्म से निकल नहीं पाया हूँ। 
          स्कूल के पहले दिन जिसने भाषा को अ, आ, इ, ई रूप में लिखना सिखाया वो अंशु मैडम थी। मेरे किशोरवय दौर में जीवन का पहला एक तरफा प्यार जो थी वो एक पंजाबी लड़की थी जो मुझसे पन्द्रह साल बड़ी थीं, दरअसल वो मेरी आठवी क्लास की अध्यापिका थी। जीवन मे हकीकतन प्रेमिका जो सबसे पहले थीं, वो गवैया समाज की लड़की थी। जीवन मे जिन दो लड़कियों ने पहल करके मुझे प्रपोज़ किया उनमे एक यह भी थीं। पहले पहल जनाना मुलायम होंठो से चूमने के बजाए जो मेरा गाल खा गई थी वो किसी टांटिया लड़ने जैसी तासीर का असर कर गया था.. वो पास के किसी गांव से आने वाली एक विधवा महिला थीं जो अक्सर मुझे बांथ में ले लेती थीं। किशोरावस्था में जो जीवन का प्यार में पहला डब्लक्रोस किया वो छिंदी उर्फ़ छिंदर थी। पहली बार जिसकी कविता पढ़ी, सुनिधि सत्य थीं। कविता लिखी जिस पर पहले पहल वो मां थीं। युवावस्था में आया, उम्र अठारह वर्ष, खुद ही कलेजा कठोर करके जिसको प्रपोज़ किया, वो नंदा थी। पहले पहल जो प्रपोज़ असफल हुआ, वो नंदा ने ही किया। पहला गंभीर संबन्ध जिससे बना वो गोलू थी। चुंबन जो बदल गया मेरा संपूर्ण व्यक्तित्व, गोलू ने किया था। पहले पहल जिसके लिए प्रेम कविताएँ लिखी, गोलू थीं, कहानी लिखी वो भी गोलू थीं। जिसके साथ उदयपुर, हिसार, चंडीगढ़, भोपाल और कोटा की यात्रा की वह भी गोलू ही थी.... गोलू जो अक्सर वान्या, वार्या और नताली के नामो से कहानियो और कविताओं में लगातार आती रहती है। जिस लड़की ने पहले पहल प्रेम संबन्धों में स्वभिमान बचाए रखना सिखाया था वह भी गोलू ही थी। घर छोड़कर तित्तर जो हुआ वो शालू थी। पवना भी थीं एक जिसको मार दिया गया था, उसी की माँ और मामा द्वारा, जाने किस ऐब के कारण या अनियंत्रित इच्छाओं के चलते- अनजान लोगों, बदमाशो तक के साथ रहने लगी थी। अनियंत्रित इच्छाओं  के कारण जो वेश्याओं के यहाँ कई कई दिन रहा करती थी।
     प्रतियोगिता परीक्षाओं की जोरदार तैयारी मैंने सुनिधि को देखकर शुरू की, पहले पहल जिस उच्चाधिकारी लड़की को प्रपोज़ किया था वो जिया थी। मुझे हिन्दू से... मनुष्य बनाने वाली मेरी अग्रज साथी सुजाता बेनीवाल थीं। उसी से सुना था पहले पहल मार्क्स, एंजल्स, लेनिन, स्तालिन, माओ और कम्युनिस्ट् मेनिफेक्टो का नाम। और इन्हें पढ़ना और गुणना आदि कविता और चंचल ने सिखाया था। संशोधनवादी कॉमरेड्स की जगह सही लाइन पर विजेता लेकर आई थी। 

    निम्न आय वर्ग के या कहूँ अर्ध सर्वहारा परिवार से हैं हम और इसी स्थिति का मजाक बनाकर मेरी हर एक क्लास में बेइज्जती करने वाली वो बुर्जुआ फ़ासिस्ट लड़की थीं जो बाद में मनुष्य बन गई थीं।  मुझे पथभृष्ट, मानसिक अस्थिरता और अराजकता में धकेलने वाली भी एक स्त्री  थीं। भयानक ऐल्कॉहॉलिक जब हुआ तब हुआ बीस - बीस या कभी बाइस तो कभी चौबीसों घण्टे जी जान लगाकर भी जब हार पर हार और असफलता ही पांती आई तब तक बहुत ज्यादा टूट चुका था मैं- स्कूल हों या हथाई और खेल, हर एक दिन एक बार तो '' इंगै कन्नै फीस कोनी रै, जद ही ओ स्कूल में रोज दिनुगै का आथण बख्त बुहारी काढण जावै।'' इसको सुनना ही पड़ता- हालांकि यह कोई बहुत बड़ा या ठोस कारण नही है विचलन का-  मगर बचपने के घाव जाने किन स्याळों में और क्यों हरे हो जाते है।
         स्त्री, भले माँ, बहन, दोस्त या साथी या परिचित- जो भी हो ने ही मेरा यकीन करके हर एक बुरे वक्त में साथ निभाया और सहयोग किया। आज जब मैं हर तरहः से स्वस्थ और सजग ताजगी से भरा हूँ तो इसका कारण भी वे स्त्रियां ही हैं जिनके कारण मैं आज दर्शन और कलाओं के क्षेत्र में थोड़ा गौर करके उनसे कदम ताल मिलाने के प्रयास रहा हूँ।
    
    जब डिप्रेशन, अवसाद की अति और अराजकता, दिमागी पंगुपन हुआ तो कारण बनी मेरी अतिभावुकता, मासूमियत जिसका फायदा उठाकर मुक्ति मुक्ति, जुल्म और अन्याय अन्याय चिल्लाने वाले अस्तित्ववादी मध्यमार्गी राजस्थानी परिचित, जिनका उद्देश्य उनकी गलत स्थापनाओं के बाद ही समझ पाया। उनका फैलाया समानता आदि का झूठ और उसके पीछे के लंपट षड्यंत्र- जिसका मैं सहज शिकार हो गया। अपनो से दूरियां और अविश्वास आदि और भय, दुःस्वप्न, हार और हताशा और अकेलेपन का शिकार हुआ- सफेदपोश सम्मानित सज्जनों के कारण। मुझे अवारा, शराबी, सड़कछाप, बदमाश और लंपट आदि जो अलंकार मिले, इससे और इसके वर्ग की वहशी जमात से मिला जब मैंने इनका खिलौना बनने से इनकार कर दिया था और निर्ममता से सच बोला और लिखा। 

         इनका वार खतरनाक होता है। मैं अंधेरों में गुम हो जाता। मारा जाता मगर इस जहरीले समय से बाहर निकालकर लाई वो उम्मीद की एक लो... जीवन की एक जीवंत कड़ी, जो उजास भर गई मेरे भीतर, और सुधार दी सभी कमजोरियां, हताशा जनित आदतें, कमज़ोरी और बीमारी।  अनेक स्त्रियों से की घटिया हरकत की गलती मैंने हर बार सरेराह सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और कायम भी रहा। मोबाइल आदि से की गई बदतमीजियों से उभरने की ही देर थी, जब उस दौर से एकदम उभर कर जीवन संगीत पर थिरकना शुरू किया तो ठीक होकर उन सब से माफी मांगी जिनके साथ घटिया व्यवहार मैंने किया था। और स्त्री ने ही मेरा यकीन करके हर एक बुरे वक्त में साथ निभाया और सहयोग किया। आज जब मैं हर तरहः से स्वस्थ और सजग ताजगी से भरा हूँ तो इसका कारण भी वे स्त्रियां ही हैं जिनके कारण मैं आज दर्शन और कलाओं के क्षेत्र में थोड़ा गौर करके उनसे कदम ताल मिलाने के प्रयास कर रहा हूँ।

    अब जब मैं उस नरक से एकदम बाहर आ चुका हूँ तो जीवन से प्यार कर रहा हूँ। वे स्त्रियां जिन्होंने मुझे बनाया, पढ़ाया और जिंदा मनुष्य के रुप में स्थापित किया के साथ ही साथ उन जनानियों का भी आभार जिसकी वजह से कम से कम मुझे मनुष्य होने का अहसास तो हुआ ही था। उनका ही यह जीवन, उनकी ही है सब मेहरबानी, यह जुनून, जिजीविषा, हिम्मत और सब कुछ... और यह भी कि हारो नहीं , समझो, जानो, चालाकियों को पहचानो और भोमियो के बनाए महानताओं के बाड़ों को तहस नहस कर डालो, उठो और डटो और जूझ मरो इस कपट के विरुद्ध।

एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...