मुक्तिकमी लोक

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Wardha, Maharashtra, India

Sunday, 25 October 2020

आवारा की डायरी


विदर्भ डायरी के कुछ पन्ने -
 
 एक दिन वाया जयपुर.....                                                                       ● सतीश छिम्पा

  (जाने कैसा अजीब सा भाव है.....)

                दिन का यह हिस्सा, पहर,,- सुहाना मगर बोझल सा , जैसे किसी बहुत सुंदर, शांत से लोकगीत के लिए हिप- हॉप या फूहड़ कोई संगीत जो पाप है। अक्सर सोचते हुए पाते हैं कि जो खूबसूरत है:- वहम मगर वो अनेक उठाए रहते है। जादू भरी छुअन की बारीक अनुभूति सा, जैसे कोई बहुत प्यारी, सुंदर और मलूक सी लड़की उदास बैठी हो। बहुत बेकरार से होंठ जैसे मुस्कुराना चाहते हो और आंखे है कि उदासियों के तुफानो को समाए है भीतर- तिलिस्मी दिन, पहर। 

    कॉम्बिफ्लेम के लिए मेडिकल पर खड़ा था कि एक बाइक आकर रुकी, हैवी बाइक जो उस लड़की की थी, जिसकी देह बनी है असंख्य फूलों के रस से,  वो लड़की सामने  थी और मैं जैसे ओझल, हूँ ही नही जैसे वहां..... लड़की कुछ खरीद रही थी।

      -"कोंडम का पैकेट दीजिए....'' वो सहजता से, बिल्कुल आराम से खड़ी थी। अचानक यूँ ही उससे नज़र मिली और... जैसे इच्छाओं के आसमान से सदियों का प्यासा टुकड़ा बिछड़कर भटकते हुए आ पहुंचा हो.। उसने कोंडम का पैकेट लिया और मुड़ने ही वाली थी की एक तरफ खड़ा एक अधेड़ सा व्यक्ति पास खड़े व्यक्ति के बहाने ऐसे बोला कि सभी सुन सके, '' जमाना इतना गिर गया, देखो यार , कमाल है, हमारे घर की महिलाओं को तो इस गुब्बारे का नाम तक पता नही है....'' उसने भद्दे दांत निकाले ही थे कि लड़की रुक गई और पीछे मुड़कर बोली,  " तेरे घर की औरतों को इसके बारे में अगर पता होता  तो तेरे जैसा सामाजिक कोढ़ पैदा ही नही होता।"


             मैं हतप्रभ सा, एक टक उसी को देखता रहा, जब तक वो वहां से निकल ना गई । कौन थी यार वो, जादुई साया हो जसे।

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                       (२)
   
     यह जून का उमस भरा दिन जो लोक डाउन के कारण बहुत बोझल बन गया है। जाने क्या तारीख़ है। सूरतगढ़  में तो अभी लू शुरू नहीं हुई है मगर घर मे सब इसी  के परेशानी से तंग हुए बैठे होंगे।

   शाम का उदास धुंधलका अपने साथ चांदनी का ठंडा लिहाफ ले आता है, जाने आता है। मैं यूँ ही  बेखुदी में तफरी करता कॉलोनी से बहुत आगे सड़क पर घूम रहा था कि कोने की चाय की थड़ी पर एक गुलकन्दी सी लड़की सिगरेट पीते दिख गयी। मैं उसके पास स्टूल पर जाकर बैठ गया, कोई चेहरा इतना उदास भी हो सकता है, सूनी मगर प्यारी आंखे, उफ़्फ़.. सोचते हुए मेरा देखना कब टकटकी में बदल गया, पता ही नही चला।

"कोई प्रॉब्लम है?"

"नहीं तो"

"तो घूर क्यों रहे हो?"

"घूर नहीं रहा सिगरेट के बारे में सोच रहा हूँ।" मैं तो कुछ और ही कहना चाहता था कि उसने सिगरेट को मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने दो अंगुलियों के बीच सिगरेट रखी ओर कश खींचा। एक, दो, तीन और फिर, फिर....फिर....फिर..

"अरे सारी खत्म करोगे क्या?" अब वह मुळक रही थी।

"कौन हो यार तुम" उसने पूछा

"मतलब"

"मतलब तुम हो कौन? मेरी सिगरेट पी रहे हो, मुझसे बातें कर रहे हो।"

"दरअसल मैने आज तक इतनी खूबसूरत लड़की को कभी उदास नही देखा तो मन किया बात करने का''

"फ्लर्ट कर रहे हो?" वह फिर मुस्करा दी और अपना बैग उठाकर बाइक की ओर चली गयी

, "अब नाम पूछोगे, नम्बर भी मांगोगे न?"

"नहीं" मैंने कहा

"अच्छा"

"हां, क्योंकि ऐसा करने से इस जादुई मुलाकात का मजा खत्म हो जाएग।"

    उसके चेहरे पर हजारों आश्चर्य थे, वो मुळकी और उसकी बाइक दुग... दुग करती चली गयी।

  ....…ओ तेरी, अचानक ही। ये तो वो ही लड़की थी जो मेडिकल पर मिली थी..उफ़्फ़, अब जाने कहाँ मिलेगी।
       

  

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  (बदल बदल के आ रही हो जैसे मुश्किलें, पीड़ाएं, सुख और प्यार....यह भी तो रंग है जीवन का.....)

आवारा की डायरी में एक गुमनाम युवा लेखक के अज्ञात तारीख़ों में दर्ज ........
                          
(शराबी, लंपट, घमंडी, बदतमीज और भी जाने कितने ही अलंकार है उसके हिस्से.... मन अक्सर अकेला रहना पसंद करता है.. इस बीमारी को अब मैंने मन मे बैठा लिया।)

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 पन्ना -१

       'माहे मीर'' का यह कथन काफी चर्चित है, " आजकल जो लोग लिख रहे हैं उन सबमे तुम सबसे ज्यादा योग्य और अपने आप में बेहतरीन ग़ज़लगो हो। यह वे लोग भी जानते हैं जो तुम्हे मिटा देना चाहते हैं। मगर अफ़सोस कि तुम नहीं जानते और जिस दिन जानोगे, अदब में कयामत आ जाएगी।"  

इस घनघोर आत्ममुग्धता के साथ मैं अकेलेपन का शिकार हुए बिल्कुल अकेला बैठा हूँ। अब तो इसको पसन्द भी करता हूँ। लोक में ऐसे आदमी को इक्कलखोर कहा जाता है, शायद मैं इक्कलखोर ही हूँ। 

    कारण क्या हो सकता है इसके पीछे- यह कोई मायने नही रखता है। मेरी सपनो की बहुत ही ख़ूबसूरत दुनिया। एक ऐसी दुनिया जहां किसी का कोई दखल न हो। किसी का किसी से कोई वैर विरोध न हो, कोई अन्याय, शोषण और नफरत न हो, जहां हर ओर प्यार, मोहब्बत और सम्मान की भावना हो। योग्यता का सम्मान हो। ख़ूबसूरती को सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। कोई गरीब न हो, कोई इज्जत और कोई बेइज्जत न हो। मुझे ये सब सोचना, देखना अच्छा लगता है। मुझे पेड़ों, पहाड़ों, नदियों, झरनो और सागर का असीम विस्तार, हिरण, गाय, बच्छे, शेर, मोर, कोयल के सपने देखना बहुत भाता है। ख़ूबसूरती और प्रेम के यथार्थ और आदर्श रूप को देखना अच्छा लगता है। उस लड़की के होठों को चूमते हुए निकल जाना अंतिम छोर तक....  बरसात के मौसम और फूलों का खिलना, कोपलों का दमकना और तितलियाँ, तारे और धरती, मेरे सपनो के केंद्र में रहते हैं। सपनो में मैं उड़ता हूँ, समुद्र में तैरता हूँ, दौड़ता हूँ, चलता हूँ, टहलता हूँ...  फ़िल्म देखता हूँ, गाने गाता हूँ, प्यार करता हूँ... . लोक रंग के किसी रंगीन कार्यक्रम मे जीवन के उत्सव को मनाता हुआ मैं रेड वाइन के पेग लगाता हूँ। महफिलें सजाता हूँ। जहां होड़ आगे निकलकर धन कमाने की नही बल्कि हो अपने कम्यूनों के अधिकाधिक श्रेष्ठ और मजबूत बनाने की। उड़ता हुआ मैं तारों को छूकर धरती से मिला देता हूँ.....

         

पन्ना-३

 दिल करता है आग लगा दूं। नेस्तोनाबूत कर दूं, विध्वंस से मिटा दूं इस समाज को, इस वहशी लोगों के समाज को...  उफ़्फ़ ये हकीकत। आप जितने ज्यादा सीधे सरल होते हैं उतनी ज्यादा आपकी जड़ें काटी जाती आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे- उतना ही आपका सम्मान होगा। कुकर्म तक भुला दिया जाता है। सरकारी अधिकारी या उच्चाधिकारी हैं तो आप आलोचकों की नज़र में नाजिम हिकमत या नेरुदा या निराला या दुष्यंत होंगे। किसी स्थापित और चर्चित लेखक की जात के हैं तो एक ही दिन में आपकी किताबों का मूल्यांकन हो जाता है। 

   जिसके लिए, जिस मेहनतकशो के लिए कविता लिखने वाले, उन मजलूमो के लिए दो सेर आटा तक नही दे सका।

     निराशा, हताशा, पस्त, दुख, संताप, अकेलापन और गुस्सा और आक्रोश और इकलाब, विद्रोह मेरे भीतर बार बार ज्वालामुखी के लावा से दहकते हैं। दिन खतरनाक है जैसे मायकोव्स्की के अंतिम दिनों की तरह या हावर्ड फ़ास्ट के शहीदनामा के सजायाफ्ता मजदूर में, या द इडियट के निकोलायविच सा .. बेचैन सा।  लेखन में कुछ स्थापित नामों से असहमतियों के स्तर की असहमति नही बल्कि घनघोर नफरत करता हूं।  
  
   पन्ना-४

यह दुनिया दगा, कपट और छल से भरी हुई है। कपट से भरे कपटी लोग और साथ जहर से भी भरे है। उनमें किसी भी तरह की प्रतिभा नहीं है। वे पूंजी और मिडिया के कारण मुख्य धारा में बने हुए हैं। अमानुष विचारों को ढोते मुर्दा लोग

पन्ना-६ 

रात भर जगाया एक किताब और आधी बची फ़िल्म ने...

     रात एक मिनिट के लिए भी सो नहीं पाया। सारी रात जागता रहा। एक बेचैनी सी सारी रात मन में रही। इसके पीछे दो कारण थे। एक, पाकिस्तानी फिल्म माह-ए-मीर और दूसरा, स्वेतलाना अलैक्सीविच की किताब zinky boys, इनके कारण एक अजीब सी बेकरारी और कुछ सवाल मेरे भीतर आते और जाते रहे।

       'माह-ए-मीर'  के शायर जमाल में वर्तमान साहित्यिक और राजनीतिक व्यवस्था से असंतुष्ट युवा की झलक बार बार मिलती है । ठीक वैसी ही बेचैनी, विद्रोह, असंतुष्टि, अराजकता और आक्रोश। वह अदब के कुछ स्थापित नामों से असंतुष्ट था। उसे पता था कि साहित्य के ये नाम, थोथे हैं और चालबाजी, दगे और कपट से भरे है। उनमें किसी भी तरह की प्रतिभा नहीं है। वे पूंजी और मिडिया के कारण मुख्य धारा में बने हुए हैं। सिगरेट पर सिगरेट पीता, वह अपनी बेचैनी और कुछ नया करने की चाह में घोर अराजक हो जाता है। वह पुराने को उखाड़ फेंकना चाहता है क्योंकि वह जानता है कि वो कपट से भरा हुआ थोथा बांस भर ही है। नए कवियों की अगुआई करता हुआ वह हर तरह से सफल प्रयोग करता है। फिल्म का यह कथन काफी चर्चित है, " आजकल जो लोग लिख रहे हैं उन सबमे तुम सबसे ज्यादा योग्य और अपने आप में बेहतरीन ग़ज़लगो हो, यह वे लोग भी जानते हैं जो तुम्हे मिटा देना चाहते हैं, मगर अफ़सोस कि तुम नहीं जानते और जिस दिन जानोगे, अदब में कयामत आ जाएगी।", साहित्यिक कपट और चालबाजियों से जूझता एक बेरोज़गार युवा, क्या हमारी ही तरह का नहीं है। या हम उसी के तरह ही तो जूझे जा रहे हैं। हजार तरह की बेचैनियों और विद्रोह से भरे सच्चे  लोग इसी तरह हाशिए पर पटके जाने की असफल कोशिशों का शिकार होते है मगर अंत में जीत इन्हीं की होती है। इस अदबी युद्ध का निर्णायक पल और विजय का कारण उनकी प्रतिबद्धता और प्रचंड बौद्धिक प्रतिभा ही होती है।
          अलैक्सीविच की किताब zinky boys अभी पढ़ रहा हूँ। सोवियत संघ और अफ़गानी मुजाहिदीनों के बीच चले युद्ध की विभीषिका पर लिखी यह किताब आपकी चेतना पर करारा प्रहार करती है। मैं पूरी रात इसीलिए बेचैन रहा कि यह मुझसे बार- बार प्रश्न पूछती रही, युद्ध क्यों जरूरी है ? ताबूतों में भरी जाने वाली नंगी लाशें, कब्रों में दफ़न युवा, किशोर और प्रौढ़, कटी- फ़टी, चिथड़ा हुई लाशें, बलात्कार की शिकार लड़कियां, औरतें और बच्चे, भूख से बिलखते परिवार..... एक ही सवाल, युद्ध क्यों जरूरी है।



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     ज़िंदगी, मैं तुमसे प्यार करता हूँ.....

( विदर्भ डायरी का पन्ना जो यादों से भरा है।)

                                             ● सतीश छिम्पा

 (ये वही अंतर्देशीय पत्र है जो मेरे जन्म की सूचना और बधाई देने के लिए मामा जी श्री साहबराम छिम्पा ने मम्मड़ खेड़ा, हरयाणा से मेरे ददिहाल भेजा था। तस्वीर में मामा जी की गोद मे मैं हूँ।)

        एक दिन जब मैंने पता नहीं कितनवी बारी अपने बचपन की तस्वीर पोस्ट की तो अक्षय भाई का मैसेज आया, "सतीश भाई तुम अपने बचपन को बहुत मिस करते हो न ?" और इसी कड़ी में एक बार हिंदी राजस्थानी के महत्वपूर्ण कवि कथाकार आदरणीय प्रमोद कुमार शर्मा ने अपनी एक पोस्ट में लिखा था कि ''जाने क्यों, कैसे और कब एक सरलमना किशोर अपने अक्खड़ रूप के लिए दूर दूर तक विख्यात हो गया।",.. बहुत कम लोग होते हैं जो आपके भीतर के दर्द, पीड़ाओं और टीस देती यादों को समझकर आपके दिल को छू लेते  हैं।  इस प्रश्न ने एका एक बहुत कुछ सजीव कर दिया था।
        14 नवंबर, शुक्रवार की शाम 7:15 बजे मम्मड़ खेड़ा,  हरयाणा में ननिहाल में थाली का औचक उठा शोर, संगीत में बदलकर गांव भर में मुनादी कर आया होगा कि ख्यालीराम जी के दोहिता हुआ है। पतासे, गुड़ या बालूशाही भी बांटी गई थी। .... और फिर उसी महीने की 27 तारीख़ को मामा जी ने यह शुभ (या जो भी हो) समाचार बताने के लिए पापा के नाम यह अंतर्देशीय पत्र भेजा था। नीले रंग का यह अंतर्देशीय मेरे जन्म की सूचना और  उल्लासों को साथ लेकर घर पूगा तो पापा , दादा, दादी सबने इसे पढ़ने की असफल खेचळ तो की ही होगी। खत में लिखे निर्देश कि बधाई के लिए नाई आएगा उसको एक कंबल और 21 या 51 रुपए दे देना, खाली मत भेजना। नवम्बर के किसी दिन कोई खाकी वर्दी वाला डाकिया आसमानी रंग का वही अंतर्देशीय पत्र लेकर घर आया होगा और मोहल्ले में चारों ओर थाळी के साथ साथ बधाई हो बधाई गूंज गया हो कि 14 नवम्बर को हरयाणा के सिरसा जिले के गांव मम्मड़ खेड़ा की धरती पर एक लड़के ने जन्म लिया है। 
आकाशवाणी होती है कि ये आत्ममुग्ध छोरा एक दिन सब तरह के मानसिक और सामाजिक भचीड़ों से निकल कर, समय से लड़ भिड़ कर भविष्य के सुनहरे पन्नों पर हक मालिकाना स्थापित करेगा..... और लिखेगा समय की छाती पर

        'आवारा की डायरी'...

            बचपन और किशोरावस्था हरयाणा में ही बीते जो आम किशोरों से बहुत ज्यादा अलग और भयानक तूफानी द्वंद्व में गुजरे, जाने क्या कारण रहे कि वो ही तूफानी रुख आज तक कायम है. शायद हीनताबोध, कुंठाएं अभी भी है जिसके चलते सर्जनात्मकता गहरी हुई है। 
    
     एक छ साल के बड़ी बड़ी हैरानी भरी आंखों वाले बच्चे का स्कूल में दाखिला करवाया जाता है। घर मे बना समान लाने वाला थैला स्कूल बैग बन जाता है। पड़ोस के लड़के की पेण्ट काटकर ऊपर कर दी जाती हैं ताकि पहनकर वो स्कूल जा सके। गुमसुम और रोनी सूरत वाला वह बच्चा मुहल्ले ही बड़ी उम्र लड़कियों का चहेता भाई था। अभावों के चलते बहुत कम उम्र में ही बुजुर्गियत के लक्षण दिखने लगे थे। कभी बहुत समझदार तो कभी गुल्लक से पैसे चुराने वाला चोर बच्चा। जब मै स्नातक प्रथम वर्ष में था तब अक्सर आदरणीय बड़े भाई साहब राजेश चड्ढा कहा करते थे कि 'तेरी जिस्मानी उम्र से ज्यादा है ज़ेहनी उम्र।"

           जाने कितने ही कड़वे मीठे और खतरनाक अनुभव मुझे बचपन मे ही मिलने लग गए थे, जिसके कारण अब जीवन की औचक बुरी घटनाएं भी मैं सहजता से ले लेता हूँ। चोर, उचक्का, लंपट, आवारा, ऐयाश और शराबी, मेरे नाम के पीछे लगने वाले अलंकार थे, जिसे आज भी कुछ लोग जलन के कारण वापस हरा कर देना चाहते हैं।


      पाश के शब्दों में कहूँ तो मैं आदमी हूँ, जो हर निक्की मोटी चीजों से जुड़कर बना है, छोटी छोटी चोरियां करते हुए भी मैं चोर नहीं था। वर्गीय विभेद इसी काची उम्र में समझ आने लगा था जो आज तक किसी पाठ्यक्रम के इम्तिहान की तरह मेरे व्यक्तित्व और सोच के साथ चिपका हुआ है। ऐसा नहीं है कि मेरा लाड नहीं था, भरपूर था। अभावो  और हीनताबोध को ढो रहे वे लोग मुझे प्यार करते थे। गली, मोहल्ले के लोग और उनके वे बच्चे जो हमउम्र थे, कन्नी काटते हुए, मुझसे दूर- दूर रहा करते। आज भी माँ बताती है कि ,"जब तूं छोटा था तब मोहल्ले के बच्चे तुझे साथ नहीं खिलाते थे, तब तुम घर आकर नंग धड़ंग होकर ऊपर आसमान की तरफ हाथ फैलाकर जोर जोर से रोते हुए तोतली ज़बान में बोलते थे कि, "है भगवान मेरो कुण ही कोनी मैं एकलो हूँ।" दादी माँ जब तक जिंदा थी, यह बात अक्सर ही बताती, माँ आज बी गळगळी हो जाती हैं। इस वर्गीय, सामाजिक मगर बहुत ही बारीक विभेद को समझना तब असंभव था, मगर आज तो नहीं हैं। इसी के चलते मेरी किशोर उम्र जाने क्यों इस भेदभाव को जो तब मोहल्ले गांव, गुवाड़ से आगे स्कूल तक पहुंच गया था, जहां फीस, कपड़ों और अन्य कारणों के चलते मैं अच्छा विद्यार्थी होने के नाते भी यदा कदा या हर रोज ही किसी न किसी बहाने अध्यापकों से पिटता ही रहता था। जाने क्या था मेरी मुर्दनी शक्ल पर जड़ी इन आँखों मे कि कभी किसी अध्यापिका या अन्य महिलाओं ने मुझे तंग नज़रिए से नहीं बल्कि स्नेह, वात्सल्य और प्रेम के अथाह उफान के साथ व्यहार किया। जितना वात्सल्य मुझे यहां मिलता उतनी नफरत अध्यापको, सीनियर विद्यार्थियों और मुहल्ले के मिडिल क्लास परिवारों से लगातार मिलती ही रही थी।

      मेरे विद्रोही, अराजक, घनघोर घृणा और गुस्से का कारण मेरा यही काला अतीत है। और मेरा यही जीवन मेरे लेखन का केंद्र है। एक दिन मेरी एक कहानी पढ़ते हुए एक युवा लेखिका ने पूछा, ''तमने यह प्लॉट कहाँ से लिया है ?", मैं कोई जवाब देता इससे पहले ही उसके पिता ने कह दिया, ''इसको आयातित घटनाओं, भावों और विषय की कोई जरूरत ही नहीं पड़ती है।"  

      स्कूल में दसवीं बोर्ड परीक्षा तक मेरी स्कूल यूनिफॉर्म मोहल्ले के बड़ी उम्र लड़कों के ऊंचे हो चुके पुराने कपड़ों से ही बनकर काम चलाया जाता रहा। इसी दौर में जब किशोरों में द्वंद्व की स्थिति होती हैं, मुझमें यह प्रचण्ड तूफानी रूप में थीं। ग्यारहवीं क्लास का किशोर एम.ए. फाइनल ईयर की छात्रा को गर्लफ्रेंड बना लेता है तो कभी ढाणी की अधेड़ उम्र महिला की हवस का शिकार होते होते बचता है। शारीरिक सांवेगिक तुफानो से जूझता मैं वर्गीय विभेद और हीनताबोध और झूठे कपट भरे लांछनों को झेलता हुआ किशोर से युवावस्था की तरफ बढ़ रहा था। मुझमे स्वभाव गत बड़ा बदलाव होने लगा था। आक्रोश, और प्रचण्ड गुस्से, विद्रोही रुख, बदतमीजी, निडरता, दबंगई जाने कब, कैसे और क्यों मेरे स्वभाव का हिस्सा बन गई। चोरी, आवारगी, डाफा खाना, भटकते रहना, बैग उठाकर कहीं का कहीं ही निकल जाना। वर्ग और असमानता और क्रोध आदि सब इसी तरह के हालातों के कारण पैदा हुए थे।  हीनता जनित कुंठाएं, क्रोध और  शोषण, हास्य, बीमारू सोच जनित बातें और असमानता और नक़ाब लगे चेहरों को देख देखकर, महसूस कर मैं बहुत गजरे तक नफरत और गुस्से में उबलने लगता था। दब्बूपन जो मेरे स्वभाव का हिस्सा था, बदलकर प्रचण्ड रूप से वाचालता और निडरता में ढल गया था। अपनी स्थितियों को जानने, निदान करने के उपायों के लिए शुरू किया अध्ययन इस तेज गति से बढ़ा कि खुद ही खुद से पिछड़ गया। एक जिस्म में दो सख्सियत पैदा हो गई, शालीन, हंसमुख, सरल मिजाज, सहज और गंभीर बौद्धिक तो दूसरी अराजक, गुस्सैल, आवारा, लंपट और विद्रोही।      


  कभी किसी स्टोर में काम किया तो कभी परचून की दुकान पर, होलसेल की दुकानों का माल ढोया तो कभी किसी शोरूम में काम किया। फिर ट्यूशन पढ़ाया और स्नातक की, बीएड भी किया, और साथ ही साथ अलग अलग किस्म के हर तरह के अच्छे बुरे काम। लेखन की तरफ मुड़ना बहुत आत्मघाती और विचलन भरा था। मगर लेकर चलता रहा। यहां लेखन की दुनिया मे भी वही सब शुरू हो गया जो मै बचपन से भोगता आ रहा था। अन्याय, पक्षपात और कुढ़न, चिढ़न थी और है भी अन्य लेखकों में मुझको लेकर।  बीएड के दौरान कुंठाओ में और गहराई आई बेरोज़गारी और तंगहाली के चलते। और इस पीड़ा के चलते कब शराबी हो गया, पता ही नहीं चला। ये वो कलंक था जिसको बहुत जलालत के बाद भयंकर मुश्किलों के बीच त्याग दिया था। 

       मैं कोई देवता नहीं कि हर तरह से पवित्र और साफ होऊं, या मैं कोई पीर औलिया भी नहीं कि सामाजिक आदर्शवादी प्रदूषण को नज़रंदाज़ कर सकूं। ज्यादातर लोगों को मैं सुहाता नहीं, और कुछ यथास्थितिवादी मित्रों के तो कुछ भी गले नहीं उतरता तो मैं कैसे उतरता भले, हर एक आदमी के सामने ये लोग मेरा इस कपट के साथ गुणगान करते कि ना चाहते हुए भी मेरा नाम स्थापित कर दिया गया। क्या फर्क पड़ता है कि कोई मुझे बेवड़ा, शराबी, लंपट, आवारा, सड़कछाप या रंडीबाज या जो जिससे बन पड़े कहे भले। अंत मे मेरे सरोकार, मेरा काम और मेरा जीवन बोलेगा, कथा कहेगा अकथ बखत की..... जीवन को जीने का मेरा अपना अलग ढंग है। सोचने, समझने और काम का तरीका। सोच, शब्द और भाव, इस समाज ने मुझे उपहार में दिए थे।
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(आवारा की डायरी)

           सड़क पर चलते हुए, ठप ठप, टप-टप की आवाज़ें, आगे जाकर बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा,... जैसे सदियों पहले ही मर चुके हों शब्द, भाषा अलोप हो गई हो जैसे...  दरख्तों, पौधों और पशु -- पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक लोप हो गयी हो। जैसे मर गया हो सब कुछ यहां, कुदरत का शब्दकोष जल गया लगता था। ज़बान बस बोझ थी। भाव सब अभाव में लौट लगाकर ठस गए थे।

      यही कुछ चलता ही रहने वाला था मगर अचानक नज़रों ने आंखों को धोखा दे दिया, निःशब्द बात हुई, इकरार और इनकार के बीच का स्पेस भरने का काम अब नए बने शब्द करेंगे, जब कभी वे बन गए तब....  वे दो बड़ी बड़ी काजल लगी आंखें,  जो घनघोर उदासियों में भी उदास होना नही जानती थी। एक शरारत, प्यार करने को ललचाई और नश्याई आंखों में निमन्त्रण भरी मुस्कुराहट का तिलिस्म, नीचे के होंठ की शेप जो बाद में पता चलता है कि ये सब उसकी कुदरतन खूबसूरती है।

     बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा टूट गया, कल...कल...कलकल बह निकला,...    शब्द जो लगता था कि मर गए, जीवन के गीत गा रहा हैं, अलोप हो गई भाषा मुखरित होकर अखर रच रही है ..  दरख्तों, पौधों और पशु -- पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक  हवाओं के शीतल वेग के साथ लौट रही हो। भाषा जो हर कहीं खत्म होने और लोप होने के खतरों से जूझ रही थी, उसकी हंसती आंखों के शब्दों को उधार लेकर बचा लिया है भाषा ने अपना अस्तित्व।

      शब्दकोष सीने से लगाकर, जीभ को बाइज्जत बरी कर दिया गया है। वो गहरे समन्दरों से मुट्ठी भर मोती ले आती थी। वो एक जो इस धरती की मिट्टी की पैदाइश नही लगती थी.....   प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। जिसकी एक छब देखने को इच्छाओं की भी इच्छाएं तरस जाती है। कामनाएं, धारणाएं, इच्छाएं सब की सब भटक कर निरर्थक हो जाती है।
   
वो अब कहाँ है..... कहाँ हैं अब वो लड़की.....


 जाने कब जुड़ गया डायरी के हरियल पन्नों के बीच इस उदास रात का यह एक भीगा हुआ पन्ना 






     तुम्हारा चले जाना कुछ यूं था कि जैसे भूरे काले बालों वाली उस लड़की की तरह जो मेरे कैनवास पर बनी हुई थी। जिसको देखकर मैं तुम्हारे अस्तित्व को महसूस करता था।  ज़िंदगी खूबसूरत नही है, खूबसूरत होती ही नही है जिंदगी तब जबकि  साथी ना हो इस अकेलेपन के सफर में, यह सच है, जीवन कभी भी बहुत खूबसूरत नहीं होता है। लेकिन मैं इसको

    क्या सच मे इससे कोई फर्क पड़ता है। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि तुम जा रही हो। पापी हूँ मगर चुप रहकर या झूठ बोलकर महान नही बन बनने के प्रयास नही कर सकता। झूठ का पुतला नही बन सकता कभी भी, तुम्हे यह पता है। तुम जाओ तो फर्क नहीं बल्कि अकेलापन डराता है। रह नही पाता मैं। बहुत दुख देता है शाम का अंधेरा, गुनगुना। मुझे बचाओ, बचा लो, अरे बचा लो मुझको....... कोई पत्ता तक नही हिला। नहीं, बहुत फर्क पड़ता है तुम्हारे जाने से, मत जाओ मेरी दोस्त, रुक जाओ।









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      सड़कछाप कवि के जीवन की बेतरतीब डायरी 

                                                                ● सतीश छिम्पा

 (तारीखों पर चलता तो तरतीब भी देता, समय कहाँ चलता है कभी पटड़ी पर.....)  

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        जहां मोहब्बतों की शुरुआत और दीवानगी अपनी हदें पार करके बेहद होती है और फिर इज़हार-ए-मोहब्बत के बाद इश्क के बगीचे से चुने गए फूलों को प्रेमी या प्रेमिका की बाहों पर सजाया जाता है। सफर जो कभी भी खत्म नहीं होता है, उसके अस्तित्व का  गौरव गान गाती हुई सडक अक्सर किसी सुहाने मोड़ पर ठहर ही जाती है। ठहरना या नही ठहरना किसी के बस में नही, परबस है। सड़कछाप को मालूम नही शायद कि ख़ूबसूरती का एक झरना यहां भी मौजूद है।

          सड़क छाप जानता है कि दुनिया के सभी महाकाव्यों की सर्जक है सड़कें, सड़कें काल की गति का ग्रीस है। सड़कें कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक का सफर है। सड़कें सामंती क्रूर व्यवस्था से निकल क्रांति की सोच में ढलती है। सड़कें प्रेमियों का आश्रय स्थल है, शराबियों का बिस्तर है, मजदूरों का रेस्टॉरेंट है और है घर से भागी लड़कियों का प्ले ग्राउंड... सड़कें इतिहास है, वर्तमान है और है भविष्य भी, सड़कें भावों के समानांतर एक और भाव है। शेरशाह सूरी हो या अकबर या औरंगजेब या फिरंगी या इसी देश के काले अंगेज या धनपति हो भले, राजशाही से लेकर नकली देवताओं के असली ठिकानों, लोकतंत्रों और लोकतंत्र से तानाशाहों तक और फिर आगे क्रांतियों और पराजयों से लेकर फिर से हुई किसी नई शुरुआत तक के सफर से परिचित है सड़कें।

     इस बेहद प्यारी सड़क पर खड़ा ,  सड़कछाप व्यग्र है,  आश्चर्यचकित,  उदास और किंकर्तव्यविमूढ़ और स्तब्ध...देखकर कि सड़क आदमी को बदलते देख रही है आदमी से केवल बुद्धिजीवीवादी में, कलाकार को देख रही है कुर्सी और ओहदेदार के आगे झुका हुआ और न सिर्फ देख रही है बल्कि व्यंग्य में हंस रही है। तंज कस रही है।

          सूरतगढ़ का सड़क छाप आश्चर्यचकित है कि सड़क ज़िंदा है और आदमी जो पहले कलाकार फिर बुद्धिजीवितावादी फिर मशीन में बदला था अब दो पाया कृत्रिम संवेदनशीलता वाला रोबोट बन गया है। सड़क छाप इसलिए भी आश्चर्यचकित है कि सड़क नाम से ज्यादा काम को महत्व देती है। उसकी इस चेतना पर इसलिए मुग्ध है कि वो चैतन्य है। पचास हजार का सवाल हल न कर सकने वाला जब बुद्धि से हारता है तब सड़कें विलाप करती है और बेरोज़गारी हंसती है।  

     सड़क छाप जानता है कि दुनिया के सभी महाकाव्यों की सर्जक है सड़कें, सड़कें काल की गति का ग्रीस है। सड़कें कालिदास से लेकर मुक्तिबोध तक का सफर है। सड़कें प्रेमियों का आश्रय स्थल है,शराबियों का बिस्तर है, मजदूरों का रेस्टॉरेंट है और है घर से भागी लड़कियों का प्ले ग्राउंड....सड़कें इतिहास है, वर्तमान है और है भविष्य भी, सड़कें भावों के समानांतर एक और भाव है। जिसको सहेजने और संवारने का काम बहुत जरूरी है। बहुत जरूरी है जैसे चुंबनों के किसी अनसुलझे सवालों का हल कर लेना।

      उदास मौसम में फिर उसका लौट आना और फिर विदर्भ डायरी, तारीखों की बस्ती में और वहां सड़क पर चलते हुए, ठप ठप, टप-टप की आवाज़ें, आगे जाकर बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा,... जैसे सदियों पहले ही मर चुके हों शब्द, भाषा अलोप हो गई हो जैसे...  दरख्तों, पौधों और पशु -- पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक लोप हो गयी हो। जैसे मर गया हो सब कुछ यहां, कुदरत का शब्दकोष जल गया लगता था। ज़बान बस बोझ थी। और..... शायद यही कुछ चलता ही रहने वाला था अगर अचानक नज़रों ने आंखों को धोखा न दे दिया होता तो, निःशब्द बात हुई, इकरार और इनकार के बीच का स्पेस भरने का काम नए बने शब्द करेंगे, जब कभी वे बन गए तब....  वे दो बड़ी बड़ी काजल लगी आंखें,  जो घनघोर उदासियों में भी उदास होना नही जानती थी। एक शरारत, निमन्त्रण भरी मुस्कुराहट का तिलिस्म, नीचे के होंठ की शेप जो बाद में पता चलता है कि ये सब उसकी कुदरतन खूबसूरती है।

     बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा टूट गया, कल...कल...कलकल बह निकला,...    शब्द जो लगता था कि मर गए, जीवन के गीत गा रहा हैं, अलोप हो गई भाषा मुखरित होकर अखर रच रही है ..  दरख्तों, पौधों और पशु -- पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक  हवाओं के शीतल वेग के साथ लौट रही हो। 
      शब्दकोष सीने से लगाकर, जीभ को बाइज्जत बरी कर दिया गया है। वो गहरे समन्दरों से मुट्ठी भर मोती ले आती थी। वो एक लड़की जो हाड़ मांस से नहीं बल्कि  प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। वो जो असंख्य गौरैया के संगीत से इस समाज, वर्ग और देश को सजा देना चाहती थी। कहाँ है अब वो लड़की जो जिसकी आंखों में मचलते थे नये समाज और मनुष्य के सपने।""
              सुबह आँख खुली तो ठंडी हवाएं चल रही थी। बुलबुल, फ़ाख्ता, सोन चिड़ी, हरि, लाल, संतरी और भी अनेक भांत की चिड़ियाएं गीत गा रही थी। मैंने ऊपर देखा, आसमान काला और सफेद था, आम दिनों की तरह ही। अपने चेहरे पर हाथ फिराने के लिए उठाए और नज़र पड़ी, हथेलियां जो गौरी होने के साथ लाल हुआ करती थी, काली हो गयी है, महाजन वाली मटकी सफेद हो चुकी है। छत के बनेरे पर बैठा मोर काला स्याह, देखकर घिन सी आ गयी। मेरे सिरहाने पड़ी रंगीन ज़िल्द की किताब सफ़ेद हो चुकी है। हर समय जो रंगीन लहरें मेरे भीतर उठती मचलती रहती है, वे ठस्स हो चुकी है। मेरी सम्वेदनाएँ बुझने लगी है और सामने दीवार पर टँगा एक प्रेमिल चित्र काला और सफेद होकर उदास हो गया है।


         मैं बाहर आ जाता हूँ। कीकर के पत्ते सफ़ेद है, खेरड़ा पूरा काला है। काला कुत्ता अब गहरा काला हो चुका है और पड़ोसन का घाघरा कुर्ता सफेद झक्क....उदास सा, उसके चेहरे से चूने वाला पसीना काला है...बिलकुल काला। ट्यूशन जाती अल्हड़ उम्र लड़कियां बुढ़ा गयी है।उनकी जीन काली है, उनके गुलाबी, हरे,पीले,नीले टॉप्स सफेद और काले हैं।उनके मुलायम गाल, पत्थरों से कठोर हो गए हैं। बाणिये की छत तक जाती अमर बेल काली है।सब कुछ काला है, सब कुछ सफ़ेद है, मैं काला, वो सफेद, वो काला, उधर वाला सफेद.....पड़ोसन जो खिलखिलाती, मोतियां लुटाती थी, आज उदास थी, सफेद कपड़ो में, मैं वितृष्णा से भर गया। घबराया हुआ लौट आया।
           घबराकर किताब खोली, सफेद पन्नो पर छपे काले अक्खर...एक, एक, एक फिर एक फिर से एक और अनेक कविताएं मेरे भीतर उतर गई....मैंने देखा मेरी हथेलियां लाल लाल थी। सामने सूखते कपड़े रंगीन थे। किताब की ज़िल्द बादामी थी। मैं बाहर गली में आ गया...गाय रात्ती थी। मोर अपने रंगों में था। अमर बेल हरी थी। पड़ोसन ने लाल सूट पहना था। ट्यूशन से लौटती लड़कियां नीली जींस पर गुलाबी, लाल,पीले , हरे,भूरे,स्लेटी, बैंगनी टॉप्स पहने हुए धीरे धीरे चल रही थी। उनकी चाल में जीवन उलझ उलझ जाता था, और मुस्करा रहा था। उनके गालों पर असंख्य गीत मचल रहे थे। एक लड़की मुड़ी और मेरी ओर बढ़ी, उसकी बगलों में इत्तरों का समुद्र बसा था। उसकी आँखों में जीवन हरियल हो रहा था, उसके होंट हिले, उसने कुछ कहा, क्या कहा? मुझे नहीं पता, मैंने नहीं सुना, "कुछ बोलो" मैंने कहा, उसने भी नहीं सुना, मैं आगे बढ़ता हूँ, उसे छु लेना चाहता हूँ, मेरी उंगलियाँ बस छूने ही वाली है और अचानक मेरी नींद टूट गयी,जाग आ गयी...सपना बीच में ही रह गया। सपनो का भी जाने कहाँ कहाँ किस किस के यहां खाता खुला हुआ है।

          हल्की बरसात में जब सड़क पर लाइट कलर के कपड़ों में कुछ लड़के- लड़कियां आपस में चुहल करते हुए जा रहे थे तब आवारा कवि के मन में आया कि जोर से कूकली मारे और उछल कर पास की दीवार पर बैठ जाए, या कोई गाना गाये, दौड़कर पीले सूट वाली लड़की के बराबर पहुँच जाए और कान्या मान्या कुर्र कर दे, मगर वो कुछ नहीं कर पाया और गर्दन नीची किये किसी शरीफ़ आदमी की तरह चलता रहा। उसने देखा पीले सूट वाली लड़की ने साथ चलते लड़के के धीरे से थापी लगाई, कितने खुश है ये लोग, उसने सोचा और सिगरेट सुलगा ली, धुंआ उड़ाता वो एक गली में मुड़ गया।

           पार्टी जोरों पर थी और उसका मन नहीं था भीड़ में बैठ कर चुस्कियां लेने का, एक कोना देखा और जम गया। एक के बाद एक, पता नहीं कितने 'एक' गटकने के बाद जब उसने ऊपर देखा, दीवार के पास गुलाबी रंग के टॉप में वो खड़ी थी। बहुत ख़ूबसूरत, मन हुआ छू ले, वो हाथ बढ़ाता है। छूना चाहता है मगर वो अदीठ हो जाती है। पता नहीं क्या जची कि आवारा कवि ने मोबाइल निकाला और जाने किसके नम्बर मिलाए, कुछ देर बात की और ख़्वाबों के पक्षियों के साथ हवा में उड़ने लगा।

-" और लोगे क्या ? " यह विनय था


-" ना पेट भर गया " कहकर वो बाहर आ गया, अंधेरा गहरा हो गया था और वो सीधा चला जा रहा था। कीकरों के पास कुछ आवाजें सुनकर रुक गया, देखा, गौर से देखा, और मुळक दिया

- " अगली सदी तुम्हारी होगी प्रेमियों, तब तुम्हे कीकरों और अँधेरे की ओट नहीं लेनी पड़ेगी " वो जोर से बोला और घर की तरफ बढ़ गया।

   एक तरफ उगा वो विशाल दरख़्त, जाने क्या नाम था उसका.... उसकी छाया जब दीवार पर पड़ती थी तो कामनाओं के रंगीन आकाश से बरसने लगती थी मन के सरोवर पर यादें....  सफेद हैयर बैंड सर पर कसकर निकल पड़ती थी वो प्यार के रसभरे मोसमो में नज़्म की तरह उतरने को मेरे दिल के पन्नों पर।

यह किसी बिसरा दिए गए साल की जनवरी का कोई दिन था, जब भीतर से पिघलते भावो की स्याही से लिखने लगा था मैं कविता। वो औसत से थोड़े ऊंचे  कद और भरी पूरी देह की थी। चेहरा, थोड़ा ललाई लिए हुए गौरे रंग का, किसी किसानी परिवार या कहें कि महिला एथलीट की सी फिटनेस थी....  गठन किसानी सा, किसी मध्य एशियाई हूर की तरह दिखती, कामुक कामनाओं को भड़काने वाले रसायनों से बनी या बुनी गई लगती थी। और ठोड़ी पर हल्का गड्ढा और गोलमटोल चेहरे पर हल्की मगर गंभीर मुस्कुराहट के प्राकृतिक मगर स्थाई से निशान से सजी तिलिस्मी दुनिया की जादुई खुशबुओं पर सवार होकर आई लगती थी। उसकी मजबूत मगर मुलायम देह यष्टि किसी जवान तो जवान बूढ़ों की भी कामुक कामनाएं जगा सकने की योग्यता रखती थी। बहुत ही प्यारी। खिला चेहरा, जादुई आंखे, लम्बे काले घने बाल, जब खुले छोड़ती जो घटाओं की तरह के असर करती और जो कमर से नीचे तक झूलते हुए किसी अनजाने सर्पिल तिलिस्म का स्रोत हो।  बहुत समझदार मगर मासूम और जज़्बाती।   

      बीते मौसमो के फ़ालसाई दिनों अब मैं तुम्हे याद नहीं करूँगा, गुलमोहर के फूलों की तरह दमकते पलों..... अब मैं तुम्हे बिसरा दूंगा.... इत्र घुली शरबतों से महकती शामों, अब तुम्हे दफ़न होना है, भावनाओं और नातों के  इस अकाल में अतीत की कब्र में.........

      .....उफ्फ.....''नींद क्यों टूट गई....? "


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एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...