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Sunday, 25 October 2020

जीवन के दहकते दिनों में.....

जीवन के दहकते दिनो में पहली कमाई
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                                            ● सतीश छिम्पा

 ("तुम्हारी आंखे बहुत गहरी है, उदास सी, जानती हूँ ये जादुई कुदरती है।" मुझे आज भी उस लाइब्रेरियन मैडम से संकोच होता है।)

     बात सन् 2002 की है। मैं 9वीं क्लास में पढ़ता था। पारिवारिक आर्थिक स्थितियां ज्यादातर इसी तरह की होती हैं ,खासकर सीमांत किसान परिवारों के तो झाग आए ही रहते हैं। आदमी जब तक समझ पाता है... तब तक ये पूंजीवादी साजिशें उसकी उम्मीद के घेटू लगाकर काम कर जाती है। 
    वो एक दौर था जब अक्सर हमारे मुहल्ले आदि के लोग समय निकाल एक दूसरे से हथाई बहाने हाल चाल पूछने जाया करते थे। कुछ लोग कॉमिक्स तो कुछ गुलशन नंदा टाइप साहित्यिक पुस्तकें और पत्र-पत्रिकाएं भी मंगवाते पढ़ते थे। शिव भाई की पंसारी की दुकान तक पर कुछ ना कुछ मिल जाया करता था।  लोग बाग अध्ययन और चर्चा करते थे। बातों के केंद्र में विमर्शों के मुद्दे तय हुआ  करते थे। विमर्श होते थे....चर्चाएँ... हथाईयाँ होती थी।    
        अब सब अतीत हुआ। क्योकि अब संबन्ध हो या जो भी बला हो सब की सब अर्थ केंद्रित हो गई है। रिलेशनशिप तक समझौतों पर आ टिका है। ख़ैर, मैं अभी इन सबके लिए बहुत छोटा था। शायद नहीं। किशोरावस्था के तूफ़ानी संवेगों और जरुरतो और काम दिहाड़ी सब की सब एक साथ उलझी की मैं चिड़चिड़ा तो नहीं लेकिन गुस्सैल जरूर हो गया था। हर एक बार, हर बार, बार बार मेरी उम्मीदिन, सपने और हौसले टूटे हैं। टूटने या पिछड़ने या हारने का स्वाद और अपमान और कुंठा जिस कमजोर घर के यहां बटाऊ बनकर आते हैं, घेरते हैं सबसे पहले सबसे बड़े बच्चे को, उम्मीदों को जड़ से तोड़ डालने के लिए। जब ज़िन्दगी ही ब्याज पर लगी हो तब आठ रुपया सैंकड़ा, कम नहीं होता।

       यही वह समय था जब मैं उम्र के पन्द्रहवें साल में था और परिस्थितियों को देखते हुए मुझे पढ़ाई के साथ-साथ काम भी करना था। इसलिए बहुत सी जगहों पर काम के लिए मारा मारा फिरता रहता। मेरा दुबला पतला सींकिया बदन मुझे हर मेहनत वाले काम की जगहों पर अयोग्य करार दिलवा देता। स्कूल के लिए बैग उठाकर घर से निकलता तो (पुरानी आबादी राजकीय माध्यमिक विद्यालय) स्कूल जो बहुत दूर था, रास्ते मे आने वाली दुकानों या कबाड़ियों से काम का पूछते हुए जाता था। नहीं मिलना था तो नहीं ही मिला मुझको कोई काम कि कह सकता अपने आप को कि मैं हूँ मेरे पिता का कमाऊ बेटा।
         
          बाद में बहुत समय निकलने के बाद मुझे वाटर वर्क्स के बेलदारों के साथ काम मिल गया था। यह खुला दिहाड़ी का काम था, मतलब कि आपको काम मिल गया तो ठीक ना मिला तो चालो पूठा। मैं बेलदारों के साथ काम करने लगा था। कस्बे में जहाँ कहीं भी पानी की पाइप लिकेज होते तो बेलदार उन्हें ठीक करते। मेरा काम होता कस्सी (कुदाल) से खुदाई करके पाइप तक पहुंचना। दस रूपये फ़ीट के हिसाब से मुझे रूपये मिलते जो कभी साठ से ऊपर नहीं पहुंचे थे। स्कूल के बाद मैं सीधा काम पर होता। जब पहले पहल मैं काम पर गया तो वो एक बहुत सम्पन्न परिवार का पानी कनेक्शन था। रविवार का दिन था, मई की तपती दोपहर। करीब पांच फ़ीट गहरा गड्ढा था। खुदाई के बाद बेलदारों ने पाइप ठीक कर दी। काम के बाद जब पैसे लेने गए तो जाने कैसे दरवाज़े की धड़क से मेज़ पर रखा गुलदस्ता गिरकर टूट गया। मेरे बॉस बेलदार को उसके हिस्से के रूपये मिल चुके थे, मेरी बारी आई तो मैडम ने कहा की तुमने नुकसान किया है, तुम्हारे रूपये कटेंगे।

-"मैंने क्या नुक्सान किया है ?"

-"तुमने गुलदस्ता तोड़ा है, जानते हो कितना महंगा था। जयपुर से लाये थे हम.... " मैडम ने कहा।

-"इसे मैंने नहीं तोड़ा, अपने आप गिरा है, आपको पूरे पैसे देने होंगे ।"

-"तुमने ही तोड़ा है, बीस रूपये मिलेंगे, तीस कटेंगे। लेना है तो लो वरना रास्ता नापो ।" मैडम ने फरमान सुना दिया। अब किया क्या जा सकता था, हारकर बीस रूपये पकड़ लिए।  गुस्सा आ रहा था सूगली पर, मगर खुश भी था कि जीवन में पहली दफ़ा कमाई की है। घर पहुंचते ही पैसे माँ को दिए तो माँ ने कहा कि मैं अपनी कमाई इकट्ठी कर लूँ, पढ़ाई के काम आएगी। क्या तो पढ़ाई, क्या कमाई, क्या समाई, कहाँ कुछ जानता था मैं। जीवन था जो थाप मारकर इधर तो घुसंड मारकर बक्खी में उधर चलने को कहता।

      ये मेरे जीवन के सबसे मुश्किल, आग तो क्या आग है, कमजोर और छोटा शब्द है, लोकानुभवो के दहकते लावा से मेरा परिचय होने लग गया था।  सामाजिक और आर्थिक स्थितियां ही किसी परिवार को समाज मे स्थापित करने का मसाला होती है। पारिवारिक हालातों का क्या कहा जाए जब अधिकांश भारतीय इसी तंगहाली में जीवन जीते रहे हो ।

       अब मैं रोज़ काम पर जाने लगा था। स्कूल, किताबें, काम और कस्सी, मेरी दिनचर्या थी। थक जाता था मगर ये अहसास मुझे उत्साहित करता था कि मैं घर में कुछ सहारा दे रहा हूँ। सहारा, कभी बीस कभी दस कभी कुछ नहीं, कभी उदासी तो कभी उल्लास, हंसी, सुख और पीड़ाओं का यह पतनूळा..... सिर्फ मेरे ही नहीं बल्कि परदादा से दादा को और दादा से पापा को और पापा से अब मुझे मिल रहा था। यह एक ऐसी विरासत की वसीयत होती है जिसमे गवाह या वकील या कागज़ पत्तर की नहीं, कलम स्याही की भी नहीं बल्कि नस्ल और रक्त और संबंधो के पक्के हस्ताक्षर की जरूरत होती हैं। उस महिला का बर्ताव जो रहा हो या उसके बाद के लोगों ने जो कपट पाप धोखा किया हो, वे सब के सब जीवन के सबसे जरूरी पाठ है जो मैं कभी नहीं भूलता हूँ।

      अब सूरतगढ़ में उसका नाम जम गया है। स्थापित है और तो और वो  मैडम पहले से काफी ज्यादा अमीर, बहुत रहीस हो चुकी है। काइयाँपन भी पहले से बहुत ज्यादा।  अब सूरतगढ़ में भाजपा की छुटभैया टाइप की नेतण भी है। ह्म्म्म, चल बल तो पता नहीं लेकिन चुनाव चुनूव नही लड़ने लग लुग गई है। अब वे जाने किस किस तरह के  एनजीओ टाइप संस्थाओं में गरीब, दमित, दलित, स्त्री और वंचित और  महिलाओं और मज़दूरों के लिए काम करती है। वो मैडम अब क्रांतिकारी महिला है, जोरदार आग, लावा, पानी, बम एटम बम जाने क्या क्या उपाधियां लिए घूम रही है। मैने तो बस ऐसी विज्ञप्तियां पढ़ी है।

( वे मुश्किल दिन जब नादान थे हम और नादानी में सीख गए जीवन का सबसे मुश्किल, पीड़ादायक और खतरनाक अध्याय, पाठ और सीख)


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