मुक्तिकमी लोक

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Wardha, Maharashtra, India
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Wednesday, 14 October 2020

आवारा की विदर्भ डायरी -


सड़क पर चलते हुए, ठप ठप, टप-टप की आवाज़ें, आगे जाकर बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा,... जैसे सदियों पहले ही मर चुके हों शब्द, भाषा अलोप हो गई हो जैसे...  दरख्तों, पौधों और पशु पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक लोप हो गयी हो। जैसे मर गया हो सब कुछ यहां, कुदरत का शब्दकोष जल गया लगता था। ज़बान बस बोझ थी। भाव सब अभाव में लौट लगाकर ठस गए थे।
-" प्यार...."कौन था जो बोल गया इस वर्जित शब्द को जोर से...जानता हूँ, कभी भी किसी को भी यह पता नही लगेगा।

यही कुछ चलता ही रहने वाला था मगर अचानक नज़रों ने आंखों को धोखा दे दिया, निःशब्द बात हुई, इकरार और इनकार के बीच का स्पेस भरने का काम अब नए बने शब्द करेंगे, जब कभी वे बन गए तब....  वे दो बड़ी बड़ी काजल लगी आंखें,  जो घनघोर उदासियों में भी उदास होना नही जानती थी। एक शरारत, प्यार करने को ललचाई और नश्याई आंखों में निमन्त्रण भरी मुस्कुराहट का तिलिस्म, नीचे के होंठ की शेप जो बाद में पता चलता है कि ये सब उसकी कुदरतन खूबसूरती है।

बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा टूट गया, कल...कल...कलकल बह निकला,...    शब्द जो लगता था कि मर गए, जीवन के गीत गा रहा हैं, अलोप हो गई भाषा मुखरित होकर अखर रच रही है ..  दरख्तों, पौधों और पशु -- पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक  हवाओं के शीतल वेग के साथ लौट रही हो। भाषा जो हर कहीं खत्म होने और लोप होने के खतरों से जूझ रही थी, उसकी हंसती आंखों के शब्दों को उधार लेकर बचा लिया है भाषा ने अपना अस्तित्व।

शब्दकोष सीने से लगाकर, जीभ को बोझ मुक्त करके एक गहरे और सघन चुंबन के साथ बाइज्जत बरी कर दिया गया है। वो गहरे समन्दरों से मुट्ठी भर मोती ले आती थी। वो एक जो इस धरती की मिट्टी की पैदाइश नही लगती थी.....   प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। जिसकी एक छब देखने को इच्छाओं की भी इच्छाएं तरस जाती है। कामनाएं, धारणाएं, इच्छाएं सब की सब भटक कर निरर्थक हो जाती है।
   
वो अब कहाँ है..... कहाँ हैं अब वो लड़की.....?

 ● सतीश छिम्पा

Wednesday, 7 October 2020

आवारा की विदर्भ डायरी :- 1

आवारा की विदर्भ डायरी -


पाप मुक्ति  का पन्ना  :- ना कहानी, ना किस्सा बस अवसाद ही अवसाद.....

          
 सड़क पर मिले एक पोस्ट कार्ड पर लिखी ये कुछ पंक्तियां, महज़ पंक्तियां नहीं है ।
और तुम्हारी मौत, इस पूरे शहर की मौत होगी

हॉवर्ड फ़ास्ट के उपन्यास शहीदनामा के उस पात्र द्वारा कही गयी ये बात इन दिनों मुझे बहुत याद आ रही है जिसको अगले दिन फांसी दी जानी थी कि "मैंने पाप किये हैं मगर मैं अपराधी नहीं हूँ", अपराध के लिए सजा कानून देता है मगर पाप के लिए व्यक्ति का भीतर, उसका जमीर, उसकी अंतरात्मा सजा देते हैं। पाप मुक्ति के लिए मुझे किसी पंडित, मौलवी या पादरी की जरूरत नहीं है और ना ही किसी भंते की जरूरत है क्योंकि जो पाप मैंने तुम्हारी भावनाओं के खिलते हुए फूलों से खिलवाड़ करके किया है उसके लिए मेरा भीतर कळप रहा है, तुम्हे ही आवाज़ दे रहा है कि आओ और आकर मेरी प्रीस्ट बनो, या शायद नहीं, आओ और आकर मुझे इस बेचैनी से मुक्त कर दो, इस पाप से मुक्त कर दो, और हंसते हुए कहो कि अब फिर से ऐसा मत करना, और देखना फिर कभी मैं वैसा नहीं करूंगा। 
   
                                                 तुम्हारा शेखर

      शेखर जब एक शाम घूमने निकला तो कॉलेज ग्राउंड में उसकी मुलाक़ात अन्ना कारेनिना से हो गयी थी, वो एक साधारण मुलाक़ात थी, जिसका इतिहास में कोई जिक्र नहीं होना था, या एक ऐसी मुलाकात जो रूटीन में किसी से भी हो सकती थी, मगर उस मुलाकात में एक ख़ास बात थी, बहुत ही ख़ास, और ये ख़ास तब हुई, जब  अन्ना ने शेखर से कहा, "तुम्हारी काली आँखों में लाल सा कुछ है। ऐसा लाल जो जल्द ही तुम्हारे समूचे व्यक्तित्व को ढक लेगा।"

            शेखर आजकल अन्ना को खोज रहा है।

       ये गुलाबी से दिन थे जब शेखर पर लाल रंग का सुरूर चढ़ रहा था। उन्हीं दिनों एक बार बीकानेर रोड़ पर के एक चाय के ढाबे पर उसकी मुलाक़ात एक ऑवरकोट पहने दढ़ियल से मेले कुचैले शख्स से हुई थी, जिसकी ठहरी हुई सी गम्भीर आवाज़ में दुनियां भर का विद्रोह दबा हुआ था, समूची दुनिया की पीड़ाओं का घोल बनाकर पी गया हो जैसे, यह एक ऐतिहासिक मुलाक़ात थी, इतिहास के पन्नों में जिसका जिक्र ख़ुद भविष्य करेगा, क्योंकि उस शख्स ने कहा था, "शेखर, तुम्हारी तमाम ज़िन्दगी बेचैनी में गुजरेगी, सुकून कुछ एक पलों का होगा.. और तुम्हारी मौत, इस पूरे शहर की मौत होगी......."
       -"वो लड़की जो दरख्तों, पौधों और पशु पक्षियों की भाषा जानती थी, जो उछल कर एक छलांग में आसमान से मुट्ठी भर तारे तोड़ लाती थी। वो एक लड़की जो हाड़ मांस से नहीं बल्कि  प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। वो जो असंख्य गौरैया के संगीत से इस समाज, वर्ग और देश को सजा देना चाहती थी। कहाँ है अब वो लड़की जो जिसकी आंखों में मचलते थे नये समाज और मनुष्य के सपने।""
           दिल की, भीतर के कहीं गहरे भावनाओं के संसार की तड़फ, हर कोई नहीं जान पाता है । कहाँ जानता है ये जमाना कि उस एक लड़की के नाक के बिल्कुल ऊपर जो छोटा सा तिल है, उसमे बहुत गहरा और सघन तिलिस्म है। वो जब भी नीली जीन पर फिट-न-फिट डार्क मूंगिया या धारीदार चेक की बुशर्ट पहन कर आती तो मेरे भीतर भावुकता किसी सुनामी की तरह उठने लग जाती। वो औसत कद की दोलड़े हाडों वाली और गौरा- गुलाबी रंग वाली, तीखी नाक जो सिरे पर एक कट के कारण बेहद ख़ूबसूरत बन गया था। आंखे जैसे किसी शांत झील में उतरते चाँद की प्रतिमूर्ति हो। आवाज़, मन करता कि बस वो ही वो बोले, हम सुनते रहे लगातार और वो चुप ना हो, शब्द वहां अर्थों की सन्धि के मोहताज नहीं रहते हैं। वो लटूम जाते हैं उसके अस्तित्व और बिना बात की बात से। जब भी वह हंसती तो ऊपर का होंठ जो बहुत प्यारी शेप में था- ऊपर जाकर सिमटकर पतला सा हो जाता। वो इतना प्यारा था कि जो भी उसको देखता, अपना सब कुछ उसी पर वारने को तैयार हो जाता।  ठेठ ग्रामीण किसान परिवार में जन्मी संस्कृति चौधरी (नाम बदला हुआ है) को हिंदी बहुत अच्छी नहीं आती थी। जब भी वो हिंदी बोलती तो मायड़ भाषा राजस्थानी से शब्दो को उधार ळे लेती और हिंदी राजस्थानी मिक्स भाषा बोलते हुए, भाषा का कचरा कर देती थी मगर बोलते समय इतनी खूबसूरत लगती कि उसकी इस कमी की तरफ कोई ध्यान ही नहीं देता था।

मैं  राजस्थान लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी उसी बैच में जाकर करता था, जिसमे वो थी। जब वो पहले पहल क्लास में आई तब हम सभी दस मिनिट बाद होने वाले टेस्ट की तैयारी के जुटे थे। कमरे में बड़ते ही मेरी नज़र उस पर पड़ी और बस पड़ ही गई थी। जैसे जम गई हो उसके चेहरे पर मेरी नज़र। मैं एकटक, एक पलक उसको देखता रहा, टेस्ट देना भूल ही गया था। हालांकि मेरे पचास में से सैंतालीस नम्बर आए थे। उस दिन पहली ही बार क्लास में मेरा पहला नम्बर आया था और जब सर ने मुझे संबोधित करते हुए तारीफ पर तारीफ की, जिसे सुनकर फूल कर कुप्पा हो गया था।

अब मैं निश्चिंत था कि एक तो इस लड़की को मेरा नाम पता लग गया और दूसरी उसकी नज़रों में मैं एक साऊ, शरीफ़ और पढ़ाकू लड़का बन गया था।

अब हम अक्सर ही कोचिंग क्लास में एक दूसरे के सामने बैठेते थे। हमारी नज़रे एक दूसरी से हाथ मिलाती और इशारों में हाल चाल पूछती।  संस्कृति चौधरी के पिता किसी कॉलेज में  एसोसिएट प्रोफेसर थे। जाहिर है कि उनके जीन का असर संस्कृति की आदतों और पसंद नापसंद पर भी पड़ा ही था।

करीब महीने भर तक हम दोनों एक दूसरे को आंखों ही आंखों में नज़रों से चूमते, सहलाते रहे। एक भावुक दृश्य जब भीतर पैठ जाता है तो अपने आस पास का उजाड़ भी हरियल चमन की तरह लगने लगता है। 

उस दिन मैं किसी कारण से  कोचिंग में जा नहीं सका। मुझे मालूम था कि वो एन सही शाम के पांच बजे पुराने हाउसिंग बोर्ड कॉलोनो के पानी की टँकी के पास खड़ी अपने बड़े भाई का इंतज़ार करेगी। बस फिर क्या था। मैं पहुंच गया उस मायावी हुस्न के महासागर के पास।"

मुझे नही पता था कि वो भी मुझे पसंद करती थी (बिल्कुल देसी लुक था मेरा, इसलिए शंका हुई) इसिलिए तो मेरे कहने केे साथ ही फ्रेंडशिप का प्रपोजल स्वीकार लिया और 'मैं भी यही कहना चाहती थी', कहने के बाद, " सिर्फ अच्छे दोस्त ही बने रहेंगे, इसके आगे का सोचना भी मत।'

 हमने एक दूसरे के नम्बर लिए और हो गया हमारा संवाद स्थापित हो गया। हम अक्सर रात को एक या दो बजे तक मोबाइल से बात करते रहे। एक दूसरे के सानिध्य के इतने ज्यादा निर्भर हो गए कि जिस भी दिन शहर में नेट या मोबाइल सिम बंद होती थी तो उस दिन हमारी बातों का उतरता नशा तोड़ में बदल जाता औऱ हम किसी समेक एडिक्ट की तरह व्यवहार करने लगते। ये वे नशीले और खुशबूदार प्यारे दिन थे जब हम लोग हर रोज शाम को खेजड़ी मन्दिर के पास वाले धोरों पर जाते और घण्टों वहां बैठे रहते। बहुत बार ऐसा भी होता कि जब वो मुझे याद कर रही होती यो उसी वक्त मैं भी उसकी नश्याई आँखों की शराब पीने के जुटा होता था।

शहर में बदल रहे इस कस्बे की कोई ऐसी गली नही बचो थी कि जो हमे पहचानती ना हो। हर गली, हर दीवार पर हमारे रिश्ते की घोषणा छपी होती थी।

एक बार दिसम्बर की एक भयंकर सर्द रात को एक बजे उसका मैसेज आया, "हमारे घर की पिछली दीवार के पास आकर मैसेज करना, अर्जेंट, अभी आओ, 

मैंने आव देखा ना ताव, जैकेट पहनकर निकल पड़ा। पांच  या दस मिनिट बाद उसको सूचना दी तो वो दीवार पर आ गई और मैं कुछ कहता इससे पहले ही उसने एक डोलू मुझे पकड़ा दिया, 'इसमें खीर है,मैंने बनाई है।", और जल्दबाजी में वहां से जाने को मुड़ी ही थी कि मैंने अपनी दोनों हथेलियों के बीच उसका चेहरा लेकर होठों का बहुत गहरा, सघन और संपूर्ण चुम्बन ले लिया और फटाफट घर की और चल दिया। रास्ते मे उसका मैसेज आया, "साले हरामजादे कुत्ते नीच, मैंने भाइयों से कहकर तेरी ऐसी तैसी ना करवा दी तो जाट की जाई ना कहना।", मैं भयभीत था। डरते डरते उसको 'सॉरी', रिप्लाई किया।

- "कोई सॉरी सूरी नहीं है भोसड़ी के हरामी ठरकी, चल दफा हो चूतिए।"
 उस रात बाकी की तमाम रात मेरी जाग कर इस फिक्र में कटी कि सुबह उसके भाई कहीं घर आकर ही ना लड़ाई कर ले, हालांकि लड़ाई लुडुई की बात पर मैं विचलित नहीं था, ये तो हम अक्सर ही कॉलेज या ग्राउंड में करते झेलते ही थे। दिक्कत उससे ब्रेकप और बात को घर में किसी को बताने के बाद जो मेरी बेइज्जती होनी थी और इज्जत का जो बलात्कार होना था, उसका ख्याल प्रचण्ड रूप से मुझे झकझोर रहा था।

  भय और अकेलेपन से जूझता मैं दो दिनों तक हर रोज रात को बहुत देरी से घर में घुसता था। जाने कब क्या कांड करवा दे, गुस्सेल और स्वाभिमानी लड़की जो ठहरी।

      एक ऐसी ही सुनसान रात में जब मैं दो बजे घर मे घुसने ही वाला था कि मोबाइल मैसेज आ गया।, '"अभी, इसी वक्त पिछली दीवार पर आ, जल्दी।''

मैं कुछ बोलता मगर बोल नहीं पाया, और भाजकर दीवार के पास अंधेरे की ओट में खड़ा हो गया, जहां दूसरी तरफ से एक बहुत फैले हुए दरखत की छाया उस अंधेरे को और ज्यादा गहरा और गहन बना रही थी। वो आ गई। अब हम दोनों दीवार पर आमने सामने खड़े थे। चुप चाप, निःशब्द, किसी मरघट की सी उदास इस कंटीली चुप्पी मेरा काळजा धड़...धड़ाधड़... धड़ की तरह ही भय का भूकम्प उठा रहा था। मैं बोलना चाह रहा था मगर मेरी जीभ सूखकर जैसे ताळवे से जा चिपकी हो। शब्द भीतर ही भीतर भ्यां कर रहे थे कि अचानक उसने मेरा चेहरा पकड़ा और उसी तरह का बहुत गहरा मादक चुंबन मेरे सिगरेट से काले हुए होठों को बहुत बारीकी और कोमलता से चूम लिया। जा

"सॉरी शेखर, तुमने किस ही तो किया था और मैं मूर्ख तुम पर गुस्सा गई थी।" उसने कहा तो मेरे भीतर का भय प्यार और स्नेह की चाशनी में डूबकर मधुमय बन गया था। उस जादुई अहसास को मैं अपने दिल के भीतर भावों की तिजोरी में सजाकर रख लिया था।

अब हम लोग हर रोज उसी दीवार पर लटक के एक दूसरे को घण्टों चूमते रहते, तब तक जब तक कि हमारे होंठ रूखे और सूखे होकर जलने ना लग जाए।

एक दिन जब मोहल्ले में जागरण था और उसके घर के सभी लोग उसमे शामिल होने चले गए, तो उसने मुझे उसी तरीके से बुलाया और फिर अपनी तरफ नीचे उतरने को कहा। मैं डरते हुए उतर गया, मगर फिर सहज हो गया देखकर की वहां पिछवाड़े पशुओं के लिए बने गेराज टाइप कोठे में हम मिलन सुख ले सकते हैं। हम सुबह 5 बजे तक उसी गैराज में एक दूसरे के भीतर के तिलिस्म को पढ़ और छूते रहे।

अब हम रोज दीवार पर मिलने की बजाए उस कोठे में मिलते जहां एक बुरी तरह टूटी चारपाई हमारे लिए सुख सेज बनकर आराम  देती थी।

करीब साल भर चली इस प्रेम की प्रेमिल कहानी का अंत भी इसकी शुरुआत की तरह दोगाचिंति में ही हुआ।
हम दोनों को ही नहीं पता था कि हो क्या रहा है। हमे इससे कुछ मतलब ही नहीं था मगर मतलब होना चाहिए जरूर था। अराजकता और जल्दबाजी में मैं कुछ विशेष नहीं सोच पाया था। वैसे भी होनी को कौन टाल सकता है। यह दिसम्बर के अंतिम सप्ताह का कोई बहुत ही सर्द दिन था जब मैं अपनी शैलिनी वूडली या कभी कभी नताली पोर्टमैन भी कहता था, मिलने, एक सम्पूर्ण मुलाकात की उम्मीद में गया। हम दोनों अभी एक दुसरे की बाहों के गर्म लावे से गर्मा ही रहे थे कि आहट सुनकर उसने उसी वक्त मुझे धक्का देकर फटाफट भागने के लिए कहा, मैं दिवार पर एक ही छलांग में चढ़ गया और एक भयंकर सरसराहट के साथ बहुत ही तेज गति से मारा गया लट्ठ, निशाना चूक कर दीवार पर लगा, इतना तेज की पक्के रद्दे की ईंट भी हिल गई। कूद कर घर की विपरीत दिशा में दौड़ता हुआ मैं पसीने पसीन हो गया था, मगर कदमो में जैसे बिजली आ गई हो और मैं दस मिनिट बाद एक टूटे खण्डकर के अंधेरे में जा दुबका था। बड़ी मुश्किल से सुबह हुई और घर जाकर लेट गया, भय था कि उन लोगो ने मुझे पहचान ना लिया हो, वे घर तक ना आ जाए। इसी सोच के साथ मुझे नींद आ गई और जब जगा तो संस्कृति का ही मेसेज था। 

- "फिक्र मत करना, तुम्हे उन्हेंने नहीं पहचाना और हॉकी स्टिक से मार खाकर भी मैंने तेरा नाम  नही बताया।
    मैं दुख, ग्लानि, पीड़ा और अकेलेपन का एक साथ ही शिकार हो गया, बेहद शर्मिंदगी भी। तीन दिन बाद सीधे उसके घर की गली में पहुंच गया।
       मैं उस दुख, तकलीफ और पीड़ा से एकदम हिल सा उठा था जब उसी गली के एक मित्र जोगिंदर रंधावा ने बताया कि उसकी तो कल शादी कर दी, तुम तो जानते हो कि किसान वर्ग में लड़कियां मिलती ही नहीं है, इसलिए लपक लिया रिश्ता प्रोफेसर साहब ने।  ज्यादा खर्चा नहीं किया बस चुन्नी चढा कर व्हीर कर दी गई है। हाथों हाथ ही रिश्ता पकड़ लिया और भेज दी गई। 
    मैं जैसे किसी बहुत ऊंची पहाड़ी से नीचे खाई में धकेल दिया गया हूँ। गश खाकर गिरने ही वाला था कि खंबे को पकड़कर कुछ देर रिलैक्स हुआ और टूटे दिल के साथ घर की तरफ चल दिया।
   एक बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण रिश्ते का यूँ बिखर जाना मेरे लिए बहुत पीड़ादायक था।
  अभी मैं उसको भूल कर उबरने ही वाला था कि उसका मैसेज आ गया, हाउसिंग बोर्ड कालोनी की तरफ आओ अभी के अभी। मैं चला गया, मगर वहां अफसोस के अलावा कुछ था ही नहीं । सब ठीक है के अंदाज में मैं जाने ही वाला था कि उसने कहा, "शादी हो गई तो क्या हुआ, हम अब भी पहले की तरह आसानी से रातें बिता सकते हैं।।"
   हालांकि मैं इतना भी ईमानदार नहीं हूँ जितना तब हो गया था। मैंने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा दिया, "नहीं यार, किसी को धोखे में रखकर मुझसे प्यार का निभाव नहीं हो सकेगा।", और फिर घर की तरफ निकल गया। हम दोनों के बीच लम्बा मोन पसरा और फैलता ही रह गया। वो जैसे परिदृश्य से गायब ही हो गई हो। 
  पर फिर एक दिन अगस्त की बीस तारीख को वो मेरे घर आई और एक नाजुक मायावी तासीर के तिलिस्मी  चुंबन से मुझे उस अंधेरे से बाहर निकाल लाई। वो लड़की नहीं, जादुई हूर थी कोई।
   संस्कृति आज भी उसी तरह दिखती है, मगर मेरी नज़र वैसी नहीं रही, इनमे बुराइयों का टीर आ गया है। 
       अब वो कहाँ है, मुझे नहीं पता।
 
      ● सतीश छिम्पा

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किस्सा:- "आप बेहद ख़ूबसूरत हैं....."
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                             ० सतीश छिम्पा

           कल एक प्यारी सी दोस्त से बात हो रही थी। वो इस बात को लेकर भावुक होकर दुःखी हुई, अचानक गुस्सा हो गई थी कि आजकल बदनीयत से छूना या चिकोटी काटना या, शरीर के सीक्रेट अंगों पर चुपके से थपकी देने जैसी घटनाएं होती है। एक लड़की कभी भी ऐसी घटनाएं नहीं भूलती और उन लोगों के लिए उसके मन में नफ़रत भर जाती है। उसका मानना था कि अगर आपको कोई लड़की अच्छी लगे, प्यारी लगे तो उसे तंग करने के बजाए उसकी ख़ूबसूरती, मसलन उसके बालों, गालों या आँखों की तारीफ़ कीजिए, उसे अच्छा लगेगा और यह है भी जेंटल तरीका......

               उसकी बात सही थी। छेड़खानी या हवस भरा स्पर्श हर हालत में निंदनीय और घ्रणित ही होता है। घटियापन और कमीनगी से भरा हुआ।
      
       बी.ए. फाइनल ईयर के एग्जाम चल रहे थे। और हर साल की तरह इस बार भी मेरा इकोनॉमिक्स में बुरा हाल था। कुछ भी याद नहीं था और मैंने पासबुक के पिछली तरफ के पीले पन्ने (इनमे पूरे पाठ्यक्रम के नोट्स होते हैं) फाड़कर अंट में दबा लिए और बाथरूम के रोशनदान में छिपा दिए, पेपर शुरूहो गया था।  कुछ भी नहीं आ रहा था। फिर भी दो पन्ने भर दिए, करीबन पोण घण्टे के बाद पिसाब की छुट्टी ली और बाथरूम में जाकर सात पॉइंट हथेली पर लिख लिए, प्रश्न की भूमिका लिखी, फिर पॉइंट्स और उनके मनगढ़ंत उत्तर.... ये सिलसिला चलता रहा.... और... और.... और... और  फिर समय पूरा हुआ और मेरा पेपर जोरदार हो गया। बाहर आया तो निरुपमा (कॉलेज की एंजेलिना जोली) ने मुझसे कहा, "तुम नकल कर रहे थे न??"

-"नहीं तो"

-"जानती हूँ कर रहे थे, तभी बार बार बाथरूम में जा रहे थे।" उसने कहा तो हंसकर मैंने बताया कि , "हाँ, कर रहा था।"
   वो जाने लगी तो मैंने उसे रोका और कहा," आप बेहद ख़ूबसूरत हैं। खासकर आपके नयन नक्श और बाल"
वो एक पल चुप रही और बोली,"मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी सतीश, जानते हो मेरी एंगेजमेंट हो चुकी है"

-"अगर मैंने आपकी तारीफ़ की है तो इसका मतलब यह नहीं है कि मैं आप पर लाइन मार रहा हूँ, आप ख़ूबसूरत है तो दिल किया कि आपकी तारीफ़ करूँ और कर दी। 
-"थैंक यू.... मैंने सोचा आप भी दूसरों की तरह..." वो पूरी बात नहीं कह पाई मगर मैं समझ गया था।

-"नहीं, ऐसा नहीं हैं, मैं भी दूसरों की तरह ही हूँ। जान बूझकर या गलतफहमी, जो चाहो मान लो, बहुत सी लड़कियों को तंग किया है और सुनो ... अगर मेरी प्रेमिका नहीं होती या मैं सिंगल होता तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होनी थी आपको प्रपोज़ करने में।" मेरी बात सुनकर जोर से हंस पड़ी वो और बोली,"कमाल ही हो तुम...."  वो दिन है और आज का दिन है। हम बहुत अच्छे दोस्त हैं।
     
      इस पर एक बात और याद आ रही है, जो किसी साथी ने बताई थी, "किसी एन. आर.आई. दोस्त ने बताया था कि एक बार हम किसी अंग्रेज दोस्त के यहाँ डिनर करने गए तो उनकी बेटी को देखकर हमारे साथी ने कहा, "she is very beautiful..."  तारीफ़ सुनकर उनका पूरा परिवार बहुत खुश हुआ था और हमारी खूब पूछ हुई, अच्छा खाना और महंगी शराब परोसी गयी थी। वहीं अगर हम भारत में ऐसी तारीफ़ करते तो छित्तर परेड पक्की ही होनी थी, क्योंकि हम पश्चिम के मुकाबले बहुत पिछड़े हुए हैं, मानसिक स्तर में भी....." 
 
       -"सतीश, यार तेरी आंखें बहुत गहरी और सूनी सी है। एक अजब तरह का आकर्षण है इनमे.... कमाल।" सोनाली तो चली गई कहकर। और मेरा हाल था कि रात भर सो नहीं पाया। माँ डांटते वक्त कहती है, "आंख देख तूं इंगी, कुलिया है जाणै ।'
    -"बटन हैं क्या ?''
   -'' दिद्दा फूट गया के।"
  - "डोभा उघाड़ ले.....'इनके अलावा कभी कोई कॉम्प्लिमेंट नहीं मिला, वो भी लड़की से... . किसानी और कस्बाई मानसिकता का मेल हमेशा ही आत्मघाती होता।
     नहा धोकर टंच मंच होकर, सेंट लगाकर, डीओ और लगा लिया था। निकल लिया प्यारे के घोडों पर सवार होकर, "जब लड़की तेरी तारीफ कर रही है तो पट ही गई समझ सतीश कुमार......." काम आसान सा था।

    -" ... हलो, मुझे लगता है कि मैं आपको चाहने लगा हूँ...''

  -" .... सिर करै मतिरियो सो... काल बड़ाई करदी जद होग्यो के ?? लड़की किसी की बड़ाई कर दे, कॉम्प्लिमेंट दे तो तुम लोग ये क्यो सोचते हो कि चालू है, पट जाएगी..." उसने बात खत्म की उससे पहले ही धूजते पैरों से दौड़ लिया घर की तरफ।

        सामाजिक नियमावली जो अतीत से ही पीढ़ी दर पीढ़ी यहां आकर जम गई ही, स्वभाव बन चुकी है। आप प्रगतिशील, जनवादी वामपंथी, सेक्युलर और लिबरल नाम सुनकर प्रभाव में आ जाते हैं। पता तो बाद में चलता है कि यह तो ढोल है।
 
       -"आपकी आंखें बेहद खूबसूरत हैं। होठों की शेप भी, सांवला रंग आपकी इस किसानी स्त्री से शरीर और नक्श पर कत्ल लगता है।" उसने ऊपर से नीचे तक गौर से मुझे देखा और बोली, ".... आपका नाम सतीश है ?

-- "जी"  आश्चर्य हुआ मुझे। मैं कुछ बोलता उससे पहले ही उसने कहा, ''आवारा हंसों का जोड़ा"..... वो चली गई।

 - "कमाल है, ये वही है । फेक आईडी जिसने कविता में जोरदार प्रयोग करके एक बार गी सबको हिला दिया था।"..... 
        सच..... प्यार, साथी और ज़िंदगी से खूबसूरत कुछ भी नहीं हैं।

    ( बहुत बाद में हम बहुत अच्छे दोस्त और साथी रहे, जब तक कि वो जिंदा थी, तब तक)

००००

क्रांति कैसे होगी कॉमरेड ? मार्क्सवाद क्या होता है सर ?????
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                                                   ● सतीश छिम्पा

           मैं तब 9  वीं क्लास में था। उम्र  13 या 14 साल रही होगी। कुछ तुकबन्दियाँ करने लगा था। उसी दौरान मेरी पहली रचना (कविता) बालहंस (राजस्थान पत्रिका की बेहतरीन बाल साहित्य की पत्रिका) में छपी थी। नाम था 'सैनिक से'। इसी समय मैं एस. एफ.आई. जो माकपा का छात्र संगठन था में शामिल हुआ। राजनीतिक समझ जीरो थी। इंकलाब जिंदाबाद, मुर्दाबाद में मजा आता था। संघ की शाखा में भी जाता था। इसका विवरण एक अलग पोस्ट में किया जाएगा। एस. एफ.आई. मेरे लायक कुछ नहीं था। हड़ताल हो तभी मजा आता था। हां, इतना जरूर था कि पढ़ने की भूख जगी, मगर इस भूख को शांत करने का माद्दा एसएफआई के पास भी नहीं था। किताबें कैसे, कब, कहाँ से  हासिल की इस पर आप ''किस्सा एक किताब चोर'' जो बाइस रचनाओं का है, चार फेसबुक पर भी है... को पढ़ सकते हैं। मैं थोड़ा बहुत भी पढ़ता तो उतने में ही अनेक सवाल मेरे भीतर पनपने लग जाते थे। जिज्ञासा, इच्छा, एव और जुनून... सवाल दर सवाल, जुनून, हौसला... शाखा में ना तोकेवल जाना छूटा बल्कि नफरत भी हो गई थी। मुझे उस माहौल से तो निकलने में मुश्किल नहीं हुई मगर मार्क्सवाद के अध्ययन में हुई। क्रांति क्या होती है ? कैसे होती है ? क्यों और प्रक्रिया क्या होती है ? जवाब ही नही मिलते थे। किताबें ना होने के कारण। बहुत जल्द मैं इसको भी सहज सरल बना चुका था। दिक्कत फिर भी आ ही गई। लेनिन, स्तालिन से तो बच्चा बच्चा परिचित था लेकिन मैं ट्राटस्की, ख्रुश्चेव, नम्बूदरीपाद, रणदिवे, तेलंगना, नक्सलबाड़ी, हो ची मिन्ह, चे ग्वेरा आदि के ध्वन्यार्थ को समझ नहीं पाता था, एसएफआई का नेतृत्व भी लेनिन, स्तालिन, चे और भगतसिंह के अलावा कुछ जानते नहीं थे। यह अज्ञानता काफी समय रही, चोरी करते हुए अध्ययन, बहस जो फिजूल भी होती थी- के कारण जान गया था और फिर एस.एफ.आई. को उसके  गलत ट्रैक और पोलिटिकल लाइन की कोई रूपरेखा के साथ अनेक अन्य कारण भी थे। सबसे बड़ा, इंकलाब के नारे क्यों लगाते हैं ये लोग जबकि लड़ना चुनाव है। चुनाव ? कम्यूनिष्ट नहीं है ये लोग, और हो गया था अलग।

       इससे कुछ पहले यह हालत थी कि मैं अक्सर लेखन और उससे जुड़े दूसरे मुद्दों, स्वयं के संवेग जनित अतिभावुकता आदि भावों से परेशान रहता।  इसलिए हर बार एक अध्यापक जो लेखक भी थे को अपनी हर लिखी कविता पढ़वाता था। एक बार जब मैंने अपनी कविता दिखाई ताकि वे जरूरी संशोधन कर दे।  कविता पढ़ने के बाद उन्होंने कहा,
"जानते हो मेरी क्या विचारधारा है?" मैं नहीं जानता था।

-"मैं राष्ट्रवादी हूँ।" उन्होंने आगे कहा, "और तुम्हारी कविता मार्क्सवाद से प्रभावित है।"

-"मार्क्सवाद क्या होता है सर ? ?" मैंने मासूमियत से पूछा। जबकि बहुत जल्द विद्यार्थी बन गया था उसके बाद मार्क्सवाद का, जो आज भी हूँ।

-"ये जो तुम कविता में दिहाड़ी, भूख, गरीबी की बात कर रहे हो, यही मार्क्सवाद है।"

-"पर सर ये तो सच्चाई है सर, मेरे पापा, चाचा, पाडोसी और बहुत से लोग दिहाड़ी ही करते हैं। सात रिपिया सैंकड़ा ब्याज भी....''

-"तुम प्रकृति पर लिखो, हमारी धरोहर खेजड़ी पर, किले, गढ़, ढाब और गंगासिंह और धोरों और पेड़ पौधों और सौंदर्य पर लिखो।" उन्होंने कहा, मेरे कुछ पल्ले नहीं पड़ा।

पर आज जब मैं मार्क्सवाद को जान चुका हूँ, जान भी रहा हूँ, पढ़ चुका हूँ, और निरन्तर  पढ भी रहा हूँ और मार्क्सवादी हो गया हूँ और लगातार आत्मालोचना के ताण इसमे और सुधार के लिए प्रयास भी कर रहा हूँ। उस दिन की उनकी बात को इसीलिए तो भली प्रकार समझता हूँ कि वे ऐसा क्यों बता रहे थे।

   अक्सर जनांदोलनों के समय मेरी उपस्थिति और सक्रियता से चिढ़कर वे ट्यूशन वाले बच्चों को कहते हैं, "रंडीबाज है, बदचलन.... घटिया आदमी है आवारा किस्म का...." 
..... और वे युवा ये सब मुझे बताते हुए या बातें करते हुए जाने किस फ़िल्म के डायलॉग को चबा चबा कर कहते हैं, "आवारा होना ये है तो हम भी बनेंगे आवारा....''

(तस्वीर मई दिवस की है। कुछ पहले शहीद दिवस की भी।)

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स्वरा भास्कर मुझे तुमसे इश्क हो गया है.....

                                        ● सतीश छिम्पा

     (स्वरा भास्कर इसलिए जरूरी नही हो जाती कि वो निडरता से सच को खुलकर बोलती है बल्कि वो जरूरी हो जाती है क्योंकि उसको पता है बहुत अच्छे से कि इसकी वजह से उसका कॅरियर चौपट हो जाएगा। बड़बोली कंगना रणौत से स्वरा की तुलना करना स्वरा के किरदार का अपमान है।)

      निडर, निसंकोच और प्रतिबद्ध अदाकारा स्वरा फासिज़्म के विरुध खुलकर बोलने वाली एक जीवित अभिनेत्री है। इसकी जिंदा बातें और प्रतिरोध के कारण इसके किरदार से इश्क होना लाज़िम है।

     स्वरा भास्कर के पास चेतना है। चेतन्य विचार। फासिस्ट दौर में उसने हमेशा शोषण तंत्र के सबसे निर्मम भाग, मतलब नेतृत्व, सरकार ही नही बल्कि व्यवस्था पर भी प्रश्न उठाए। और वो लगातार इन ज्वलंत राजनीतिक- सामाजिक मुद्दों को लेकर  मुखर रही हैं। सीएए और जेएनयू में हुई हिंसा को लेकर स्वरा भास्कर लगातार अपना विरोध जता रही थी, जिस वजह से वह बहुतों के निशाने पर भी हैं। ऐसे फासिस्ट अंधड़ में उम्र की लिहाज शर्म भूलकर  राज शांडिल्य ने भी अपने ट्विट में स्वरा के खिलाफ अभद्र शब्द का इस्तेमाल किया, जिसके बाद स्वरा ने भाषा की गरिमा कायम रखते हुए उन्हें करारा जवाब दिया है। राज शांडिल्य ने ट्विट में लिखा- "सस्ती चीजों पर ध्यान न दें...स्वरा भास्कर से महंगा दैनिक भास्कर बिकता है।" शायद उन्हें भी अपनी भाषा आपत्तिजनक लगी होगी, क्योंकि निर्देशक ने तुरंत ही ट्विट को डिलीट कर दिया। स्वरा भास्कर ने भी उनके ट्विट पर करारा जवाब देते हुए लिखा- अगली बार रोल ऑफर करने और आपकी फिल्म के ट्रेलर को शेयर करने की रिक्वेस्ट वाले मैसेज भेजने से पहले आप भी सस्ती हरकतों के बारे में थोड़ा सोच लेना। बहुत प्यारी और यूनिक अभिनेत्री हैं।

     स्वरा भास्कर क्यों इतनी बेहतरीन और संजीदा ऐक्ट्रेस है, क्यों वो चीजो को बारीकी से पकड़ती है ? संवेदना की गहन गूंझळ को कैसे छू लेती है। फासिस्ट लंपट गुंडावहिनियो के हमलों, कुत्सा प्रचार के विरुद्ध आज अचानक एक वीडियो सामने आया जिसमे वो होस्ट को अपना घर दिखा रही है और अचानक वे स्वरा की लाइब्रेरी के पास पहुँच जाते हैं। होस्ट बोलती है कि इसमें से आपकी पसंदीदा किताब निकालो तो स्वरा भास्कर अवतार सिंह पाश की सम्पूर्ण कविताएं निकालती है जो हिंदी में आधार प्रकाशन ने छापी है और कहती हैं कि " पाश मेरे प्रिय कवि हैं , अब मैं विदा लेता हूँ, लोहा, सबसे खतरनाक प्रिय कविताएं हैं", वहीं जब होस्ट स्वरा के घर में घुसती है तो एक कविता पोस्टर दिवार पर लटका दिखता है, केदारनाथ जी की 'मई दिवस' कविता का जो सम्भवतः पंकज दीक्षित सर का बनाया है। मई दिवस कविता को सम्हालना तो दूर की बात है बॉलीवुड के हीरो हिरोइन इस की संवेदना के नज़दीक ही नहीं फटक सकते।
          बहुत से अभिनेता अभिनेत्रियों में किताबो के लिए रूचि है, मगर नन्दिता दास या स्वरा भास्कर की प्रतिबद्ध भूमिका सबसे अलग और आद्भूत है। रंगमंच और सिनेमा की इस पीढ़ी में स्वरा जैसे इक्का दुक्का ही कलाकार है जो जिंदा सोच रखते हैं। नसीरुद्दीन शाह एक साक्षात्कार में कहते हैं कि " रंगमंचीय कलाकार को लोक के जिस सबसे गहरे अनुभवों के बीच उतरना होता है वहां उसके विज़न की भी परख होती है जो विस्तृत नही होगा कभी भी बिना किताबों के....."

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साहित्य और कलाओं के बौद्धिक माहौल से सीधा नशा मुक्ति केंद्रों की यातनाएं
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    ( अराजकता सिर्फ जीवन मे ही नही, लेखक में भ है। यह डायरी जो है, बेतरतीब सी, बस यही है जीवन भी। तुम्हे क्यो नहीं पसंद उस अराजक का होना।
बीमार आवारा, घनघोर शराबी-आवारा  की डायरी. --४ )

                                         ● सतीश छिम्पा 

   पन्ना, जाने कैसे बेतरतीबी छाई है.  
 
            वार्ड नंबर  11 या  तीन या टुंडला या अबोहर या एथेंस या स्पार्टा,  दिल्ली या हल्दीघाटी या खानवा का मैदान या कोई सा भी हो 'पन्ना'- इतिहास बीमारियों को ढोता नहीं है। इतिहास की तिलिस्मी दुनिया या गूजळक या भूलभुलैया या आकर्षण या जो भी हो, मुझे खींच ले जाता है- वियना नही देखा कभी मैंने मगर स्टीफ़न स्वाइग से साक्षात्कार कर रहा हूँ- या होता हूँ, मैं सतीश या शेखर, क्या कुछ फर्क पड़ता है ?... एक बीमार बंदे से मुलाकात जो अर्धविक्षिप्त है और खुद को कहता है-  सृजनधर्मी , शायद हो कोई गुमनाम युवा लेखक जिसकी डायरी की अज्ञात तारीख़ों में दर्ज है-- आदमी मारा जाता है, भेड़िया धर्म के बंकर में रहता है सुरक्षित..... बेतरतीब संवादों की बेतरतीब डायरी और अर्धविक्षिप्त आदमी के सवाल.....  ........
                              
.......शराबी, लंपट, घमंडी, बदतमीज और भी जाने कितने ही अलंकार है उसके हिस्से.... वो जिसका नाम शेखर है या है सतीश या जो भी हो- जिसका भी हो.... " जिसका नही, मेरा, सिर्फ मेरा'' ,-

     -- वह अक्सर  अकेला रहना पसंद करता है/ निज बोल नही बोलता है तो धमकाया जरूर जाता है, खुद ही के अंतर से, करता हूँ--. शेखर को अब ना जाने किसने  मन के मे बैठा लिया। उफ़्फ़, सच मे ही बावळी लोल है...

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 पन्ना -१

       'माहे मीर'' का यह कथन काफी चर्चित है, और मुझमे घनघोर आत्ममुग्धता के अराजक लक्षण" आजकल जो लोग लिख रहे हैं उन सबमे तुम सबसे ज्यादा योग्य और अपने आप में बेहतरीन ग़ज़लगो हो। यह वे लोग भी जानते हैं जो तुम्हे मिटा देना चाहते हैं। मगर अफ़सोस कि तुम नहीं जानते और जिस दिन जानोगे, अदब में कयामत आ जाएगी।"

पन्ना-२

    मैं अकेलेपन का शिकार हुए बिल्कुल अकेला बैठा हूँ। अब तो इसको पसन्द भी करता हूँ। लोक में ऐसे आदमी को इक्कलखोर कहा जाता है, शायद मैं इक्कलखोर ही हूँ। कारण क्या हो सकता है इसके पीछे- यह कोई मायने नही रखता है। मेरी सपनो की बहुत ही ख़ूबसूरत दुनिया। एक ऐसी दुनिया जहां किसी का कोई दखल न हो। किसी का किसी से कोई वैर विरोध न हो, कोई अन्याय, शोषण और नफरत न हो, जहां हर ओर प्यार, मोहब्बत और सम्मान की भावना हो। योग्यता का सम्मान हो। ख़ूबसूरती को सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। कोई गरीब न हो, कोई इज्जत और कोई बेइज्जत न हो। मुझे ये सब सोचना, देखना अच्छा लगता है। मुझे पेड़ों, पहाड़ों, नदियों, झरनो और सागर का असीम विस्तार, हिरण, गाय, बच्छे, शेर, मोर, कोयल के सपने देखना बहुत भाता है। ख़ूबसूरती और प्रेम के यथार्थ और आदर्श रूप को देखना अच्छा लगता है। उस लड़की के होठों को चूमते हुए निकल जाना अंतिम छोर तक....  बरसात के मौसम और फूलों का खिलना, कोपलों का दमकना और तितलियाँ, तारे और धरती, मेरे सपनो के केंद्र में रहते हैं। सपनो में मैं उड़ता हूँ, समुद्र में तैरता हूँ, दौड़ता हूँ, चलता हूँ, टहलता हूँ...  फ़िल्म देखता हूँ, गाने गाता हूँ, प्यार करता हूँ... . लोक रंग के किसी रंगीन कार्यक्रम मे जीवन के उत्सव को मनाता हुआ मैं रेड वाइन के पेग लगाता हूँ। महफिलें सजाता हूँ। जहां होड़ आगे निकलकर धन कमाने की नही बल्कि हो अपने कम्यूनों के अधिकाधिक श्रेष्ठ और मजबूत बनाने की। उड़ता हुआ मैं तारों को छूकर धरती से मिला देता हूँ.....

          एक हजार उधार, पव्वा एक और फिर सड़क पर- सुबह पता लगा- बेवड़ा गिर गया था....

पन्ना-३

 दिल करता है आग लगा दूं। नेस्तोनाबूत कर दूं, विध्वंस से मिटा दूं इस समाज को, इस वहशी लोगों के समाज को...  उफ़्फ़ ये हकीकत। आप जितने ज्यादा सीधे सरल होते हैं उतनी ज्यादा आपकी जड़ें काटी जाती आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे- उतना ही आपका सम्मान होगा। कुकर्म तक भुला दिया जाता है। सरकारी अधिकारी या उच्चाधिकारी हैं तो आप आलोचकों की नज़र में नाजिम हिकमत या नेरुदा या निराला या दुष्यंत होंगे। किसी स्थापित और चर्चित लेखक की जात के हैं तो एक ही दिन में आपकी किताबों का मूल्यांकन हो जाता है। 
   जिसके लिए, जिस मेहनतकशो के लिए कविता लिखने वाले, उन मजलूमो के लिए दो सेर आटा तक नही दे सका।

पन्ना :- ४.

     निराशा, हताशा, पस्त, दुख, संताप, अकेलापन और गुस्सा और आक्रोश और इकलाब, विद्रोह मेरे भीतर बार बार ज्वालामुखी के लावा से दहकते हैं। दिन खतरनाक है जैसे मायकोव्स्की के अंतिम दिनों की तरह या हावर्ड फ़ास्ट के शहीदनामा के सजायाफ्ता मजदूर में, या द इडियट के निकोलायविच सा .. बेचैन सा।  लेखन में कुछ स्थापित नामों से असहमतियों के स्तर की असहमति नही बल्कि घनघोर नफरत करता हूं।  
  
   पन्ना-५

यह दुनिया दगा, कपट और छल से भरी हुई है। कपट से भरे कपटी लोग और साथ जहर से भी भरे है। उनमें किसी भी तरह की प्रतिभा नहीं है। वे पूंजी और मिडिया के कारण मुख्य धारा में बने हुए हैं। अमानुष विचारों को ढोते मुर्दा लोग
        -''लड़ाई मत किया करो यार-- कभी देखा है किसी को  बोलते हुए या किसी को सुना है- प्रतिरोधक होकर खुलेआम बोलते हुए ?'' 

एक दिन चला जाऊंगा
कहानियों पर सवार होकर
कल्पनाओं से दूर बहुत दूर.......
तब-मत खोजना उस भूख से भयभीत, जीवन के संक्रमण से डरे हुए, पीड़ाओं और पनियाई
लाल आँखों वाले किसी लड़के को

        क्या हुआ था उस दिन- उस दिन जब पूरे दिन आंधियां चलती रही और बादल जिन्हें बरसना था मरुधरा और मैदान और घग्घर नदी के इस बहुत सुंदर और रमणीय और कामनाओ को जगा देने वाली सबसे प्यारी धरती, धरती के इस बहुत प्यारे हिस्से जिसको हम कहते हैं नखलिस्तान -- बरसना था और झूमना था। नहाना था शेखर को- नहीं, मेरा नाम ही शेखर है- बावळी टाट..... क्या हुआ था उस दिन या उस समय या उस जगह जहाँ कभी कुछ समझ ही नही आता.... पता लगा-- वो जो सदियों की गुलामी तोड़ने, अन्याय और ज़ुल्म का मुंह मोड़ने आदि का का नारा ललकारा स्टाइल में फैंकते, लाल टोपी और लाल जैकेट आदि के फैशन को मार्क्सवाद या कम्युनिष्ट की पहचान कहने वाले जब पुरस्कार के लिए किसी दल्ले के सामने कोड कोड में कोड्डे होकर अपनी गुदा पर ठप्पा लगवाकर बन जाते- सरकारी या अकादमिक कवि रूप भेड़िये- संपादक बने इस तरह के भेड़िया जो आदमखोर कवि की कल्पना का पिछवाड़ा ठोककर डाटा लगा देते हैं। और फिर ......

तुम फ़िक्र मत करना मेरे शहर
मैं नहीं लौटूंगा, नहीं लौटूंगा तेरी जगमगाती दुनियां में
नहीं आऊंगा तेरे प्यार के बाज़ार में सजी
पीड़ाओं की दुकानों पर
मैं इस बात से फिक्रज़दा नही कि मेरी याद कि परछाइयों के साथ कोई चलेगा कि नहीं
या कोई चमकते जुगनुओं से पूछेगा मेरा पता
नहीं- मेरे शहर
मैं अब नहीं लौटूंगा तुम भी किसी भावुकता से भरे
अकेलेपन को ढोते बच्चे में मत खोजना
मेरे बचपन के उदासी भरी आंखों और चेहरे के अक्स

उम्मीदें जहाँ हार जाती है..... ज़िंदगी वहाँ मौत बन कर हमे बाँहों में कसती... मौत, और आत्महत्या के लिए सल्फास जो मुझे मिली नहीं, फंदा डाला नही, स्प्रे ताले में है-- और मैं, मैं डर गया, हिम्मत नही पड़ी---, अगर आज ये कारा हो जाता तो क्या कोई भी इंकलाबी या जीवित युवा, सहज इस दिशा बाबत सोच कायम रख पाता- साथी कह नही सकते क्योकि ज्यादा पता नहीं।

        कितनी बार इन सब बेतरतीब कागज़ो और डायरियों को तरतीब देकर लिखा, सहेजा, बचाव किया और फिर हर बार फ़ंटेसी, कहानी या जीवनी या जो भी हो, ढालने की कोशिश की, मगर नही, मैं मेरे 'मैं' के लिए जिस 'शेखर' रख रहा था वो अजब था- गाड़ी सेट नही बैठी..... उफ्फ, यह बेचैनी, अब खुद ही पढ़ें; नीचे एक अध-पागल जो जाने क्यों  और कौन सा अफ़साना था जिसको अभी ही, बिल्कुल अभी सब सुन रहे थे। 
    जैसे कील दिया गया हो उन्हें या किसी तिलिस्म में बांधा गया हो। एक किसी कवि जिसका किस्सा लोग हवाओं की सरसराहट में तलाशते हैं। कयास लगाते थे- वो एक  बीमार कवि था। एक ऐसा शराबी  कवि जिसने खुद से ही खुद को खत्म कर लिया था। 

    मोहब्बत या बेरोजगारी या क्रांति या उपेक्षा, दलगत राजनीति करते लेखक, गांजा, पोस्त या शराब या जो भी हो, वही कारण था उसका, उसकी बर्बादी में हाथ था

 ( पन्ना- ११)

      उस बीमार कवि से मुलाकात...  जिसका नाम शेखर ( और एक बीमारी खुद मेरे अस्तित्व की थी जो हर बार या कहूँ, हीरो, बौद्धिक स्टार या ऐसा ही कुछ समझने के फेर में मैं हास्यास्पद हो जाता हूँ इस शेखर नाम के खुद मेरे ही किरदार से) था, जो टॉलस्टॉय के उपन्यास 'इडियट' वाली जादुई नारी नस्तास्या फिलिप्पोवना से इश्क करता है-- जो हकीकतन नामुमकिन तो नही मगर मुश्किल था- गुलाबी होठों के चुंबन से- प्यार, संभोग और पलायन... पलायन ?? पलायन शायद नहीं--- सुबह सुबह हैंगओवर से बचाव के लिए एक पव्वा दारू या-- पूरे दिन पीते रहना और- जब जब भीतर भूकंप उठते तो 'बिफोर रेन'-की श्यामवर्णीय कमसिन तो नही मगर ज्वाला सी दिखती  नंदिता दास के होठों की शेप पर फिदा होकर  कविता लिखता है, बुरा क्या है ? .... भला भी तो नही है ना । चल छोड़ो यार-- कभी कभी वो जो दीप्ति नवल जैसी सांवली सलौनी साथी की चाहत रखता हुआ कल्पना के बिस्तर पर उसको महसूस करता हुआ पड़ा रहता है रात भर (बस मैं ये ही एक जुल्म खुद के साथ बर्दाश्त नही कर सकता हूँ और भगाकर आवरण रूपी शेखर को, खुद आता हूँ) प्यार भरे सपनो संग, और जैसे सपनो की बहुत सघन, पवित्र और मीठी सी काम इच्छाएं जैसे ही हावी होकर मुझे, मुझमें ही स्थाई करने की कोशिश करती है- उसकी बहुत गहरी, बड़ी बड़ी कामुक मगर शरारती आंखे- थोड़ा टेढ़ा करके गर्दन को जब देखा कातिल तकणी से और वे सपने जो हमेशा हमेशा के लिए वहां स्थाई होने थे-- रात के स्वप्नदोष से झरकर बन गए दाग- चाँद में अब भी दिख रहे हैं जैसे- मर चुके शुक्राणुओंं की लाशें....

   आदमी अब कहाँ है
-" यह टूम तो गई काम से-- सुबह चार बजे से दारू पी रहा है....'' कौन था, पागल साला।

     मैंने उसको देखकर पुकारा शेखर नाम लेकर  तो, ''शेखर ? कॉमरेड ?''...... उसने कहा । सही सोचा था शायद । वही शेखर जो लाल लाल आंखों और बेतरतीब सी जिंदगी जी रहा घनघोर अराजक कवि। शेखर या खुद मैं ??? जाने क्यों आज बरसात नही हुई।

  ( पन्ना--१२)

   -"यह निहायत गलत है या सही, पता नही, नीलम दोस्त है और दिवाकर की प्रेमिका - (नाम बदल हए हैं।) एक या दो बार गलतफहमी या जो हो उसे समझा जा सकता है- आज अठाइस दिन हुए- अनवांटेड की कितनी गोलियां दे दी- या वो दूसरे वाली.... वो चली गई, दिवाकर का ब्रेकप क्या मैंने करवाया था- साले....

    सब कुछ उजड़ा हुआ हो जैसे

(हम सब पागल है, मंडी के उत्पाद)

--''एक तो आवारा, नहाता नहीं है इसलिए बदबू आती है।" जैसे ही उसने सोचा, खुद से ही शर्मिंदा हुआ क्योंकि वो सलीके से रहता है। अरे उसने मतलब मैंने।
    

   -- " औसत नयन नक्श और दिखने में भी औसत, बेवकूफ सा लड़का है। '' इस बेइज्जती को अहम बनाऊं या बिल्कुल ही छोड़ दूं .. 

अब यह मैं नही, कोई महाकवि है जो कह रहा है कि
      - "मैं हैरान रह गया था जब पहली बार उसके बारे में सुना और बाद में एक झलक देखा भी।  वो पांच फ़ीट दस इंच लम्बा, हट्टा-कट्टा युवा है। अपने भीतर की दुनिया को बाहरी दुनिया से एकमेक करने के यत्न में अक्सर कुछ गड़बड़ कर देता है। आज जब मैं दोस्त के घर स्वादिष्ट खाने का लुत्फ़ उठाकर वापस लौट रहा था तो वो मुझे घग्घर वाली बाईपास पर मिला, हमने हाथ मिलाए, हाल चाल पूछे और उसने मुझे गोल्ड सिगरेट पेश की, सिगरेट जलाते हुए मैंने उससे उसकी योजनाओं के बारे में पूछा तो वो बोला.... 

   - "आत्महत्या और जीवन मे महीन सा ही फर्क होता है।"

       कैसा तो होगा वो पल, जब सांस रुकेगी 
     कैसा तो वह रस्सा होगा, जन्नत की कुंजी।

     'आत्महत्या' उफ़्फ़...

         ज़िन्दगी नरक होने वाली है.... और आत्महत्या, इसको भविष्य पर छोड़ते हैं। मैंने  यूँ ही सोच रहा था। और स्थाई किए जा रहा था सब के सब बीमार मूल्य।

   कविता, उन दिनों कोई आमद नही हुई, क्यों नही हुई, अन्याय है यह कुदरत का घोर अन्याय और एक गाली... शब्द बिखर गए
-" मैं चिड़ियाओं की आँखों में मचलते संगीत को सुनना चाहता हूँ। गौरैया के गीत एक लड़की के होटों पर सजा देना चाहता हूँ, उसको बताना चाहता हूँ कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ। फिजूल शब्द नही, जीवन के जीवंत शब्द।

    ... और हाँ मैं एक उपन्यास लिख रहा हूँ जिसमे वो दुनिया होगी, जिसका मैं सपना देखता हूँ"

-" तुम किस दुनिया के सपने देखते हो ?? " मैंने सुट्टा लगाते हुए पूछा

-" एक ऐसी दुनिया जो ख़ूबसूरत हो, जहाँ सब अपने हो, ना अकेला दुःख हो और ना अकेला सुख ही हो। शोषण, अन्याय, असमानता ना हो। "

-"  तो क्या इस दुनिया में सब अपने नहीं है" खुद से खुद ही हूँ मैं मुखतिब

-" सब अपने नहीं है। सबके सब अवसरवादी, कपटी जानवर हैं और आगे निकलने के कॉम्पिटिशन में इतने डूब चुके हैं कि इन्हें पता ही नहीं कि कब ये किसी दूसरे के कंधों पर पैर रखकर कामयाबी को छू लेते हैं और दूसरा, जिसके कंधों पर पैर रखा गया होता है, वो भी किसी दूसरे के कंधों को तलाश करता है। ये चालें, बिसातें, छल, कपट, दिलों के मेल से भरी दुनिया मेरी नहीं है, ये दुनिया जो किसी भूखे को दुत्कार दे, किसी नाकारा को काम ना दे सके, ये दुनिया मेरी नहीं है। भाई बहन संग पकड़ा गया किसी गांव के गैराज में और समाज सड़ने लगा--  ये रोज रोज धर्म, जाति, भाषा के नाम पर कत्ल जो हो रहे हैं, एक सम्पन्न बाप द्वारा अपने नाकारा बेटे को स्थापित करने के लिए, एक चालबाज धूर्त बाप द्वारा अपने बंजर बेटे को कलाओं में स्थापित करने के लिए जमीर मार ले खुद का, वो मेरा नहीं है।

   यह सोचना कितना मजेदार है कि हम महान हैं

 (पन्ना - १३)

         जहां खुलकर प्यार करना। प्यार का इज़हार करने को छेड़ना समझा जाता है। जहाँ  एक परिवार द्वारा अपनी बेटी को ब्लैकमेलिंग का हथियार बनाकर घरों को उजाड़ने के लिए जो साजिशें रची जाती है। एक कोई लड़की या लड़का बेरोज़गारी के कारण जिल्लत सहते हैं। किसी क्रांतिकारी लेखक को हाशिए पर पटक दिया जाता है। कोई जो नौकरी के लिए जिस्म का सौदा कर लेते हैं।  .... वे इसी दुनिया का हिस्सा है।" उसने फ़िल्मी हीरो की तरह डायलॉग बोले तो मैंने सिगरेट का गुल झाड़कर पूछा -" तो तुम नयी और ख़ूबसूरत दुनिया बनाने के लिए क्या कर रहे हो"

-" मेरे दोस्त ये दुनिया बहुत कठोर है, उबड़ खाबड़ है, भावों और सपनों की कातिल है। शब्द की तौहीन करने वाला जाहिल समाज क्या जाने कि प्यार का इज़हार करते शब्द, दुनिया के सबसे सुंदर शब्द हैं। फिर भी मैं पढ़ता हूँ, सपने देखता हूँ, जब मेरे बस में कुछ नहीं रहता तो शराब पीकर बेसुध हो जाता हूँ "

-" पार्टनर ऐसे तो ख़ूबसूरत दुनिया बनेगी नहीं"

-" बनेगी मेरे भाई जरूर बनेगी, वो वक्त भी आएगा।
     तुम देखना एक दिन जब दिन हमारे होंगे......।"

  कहते हुए वो जो मेरा एक हिस्सा था उधर, उस  बाएं तरफ़ के खेतों की ओर चल दिया। सोचा, जो लोग इसके साथ चले थे साम दाम और हर बुरी चालों के चलते स्थापित हो गए हैं। यह कितना प्रतिभाशाली था/ नहीं अभी भी है।... और फिर  मैंने आसमान की तरफ देखा, बगुलों की डार से एक बगुला बिछड़ गया और इधर-उधर गोते खा रहा है, मैं घर की तरफ़ बढ़ गया.... घर ?? कहाँ है घर?? मालिक कौन है- रात डंडे मारे गए सपनो के और फिर अस्पताल

        ● सतीश छिम्पा

क्रमशः.....
जारी...

.( आगामी भाग ४ कल पढ़िएगा)

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साहित्य और कलाओं के बौद्धिक माहौल से सीधा नशा मुक्ति केंद्रों की यातनाएं
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  ( यह टूम तो गई काम से-- सुबह चार बजे से दारू पीना शुरू करता है....'' जाने दे बेवड़ा क्या लिखेगा, यह एक बहुत बड़ा राजस्थानी लेखक था, हटा इस गंद को साला। और यह सेटिंगबाज संपादक)

                                         ● सतीश छिम्पा 

   पन्ना, जाने कैसे बेतरतीबी छाई है.  
 
            वार्ड नंबर  11 या  तीन या टुंडला या अबोहर या एथेंस या स्पार्टा,  दिल्ली या हल्दीघाटी या खानवा का मैदान या कोई सा भी हो 'पन्ना'- इतिहास बीमारियों को ढोता नहीं है। इतिहास की तिलिस्मी दुनिया या गूजळक या भूलभुलैया या आकर्षण या जो भी हो, मुझे खींच ले जाता है- वियना नही देखा कभी मैंने मगर स्टीफ़न स्वाइग से साक्षात्कार कर रहा हूँ- या होता हूँ, मैं सतीश या शेखर, क्या कुछ फर्क पड़ता है ?... एक बीमार बंदे से मुलाकात जो अर्धविक्षिप्त है और खुद को कहता है-  सृजनधर्मी , शायद हो कोई गुमनाम युवा लेखक जिसकी डायरी की अज्ञात तारीख़ों में दर्ज है-- आदमी मारा जाता है, भेड़िया धर्म के बंकर में रहता है सुरक्षित..... बेतरतीब संवादों की बेतरतीब डायरी और अर्धविक्षिप्त आदमी के सवाल.....  ........
                              
.......शराबी, लंपट, घमंडी, बदतमीज और भी जाने कितने ही अलंकार है उसके हिस्से.... वो जिसका नाम शेखर है या है सतीश या जो भी हो- जिसका भी हो.... " जिसका नही, मेरा, सिर्फ मेरा'' ,-

     -- वह अक्सर  अकेला रहना पसंद करता है/ निज बोल नही बोलता है तो धमकाया जरूर जाता है, खुद ही के अंतर से, करता हूँ--. शेखर को अब ना जाने किसने  मन के मे बैठा लिया। उफ़्फ़, सच मे ही बावळी लोल है...
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 पन्ना -१

       'माहे मीर'' का यह कथन काफी चर्चित है, और मुझमे घनघोर आत्ममुग्धता के अराजक लक्षण" आजकल जो लोग लिख रहे हैं उन सबमे तुम सबसे ज्यादा योग्य और अपने आप में बेहतरीन ग़ज़लगो हो। यह वे लोग भी जानते हैं जो तुम्हे मिटा देना चाहते हैं। मगर अफ़सोस कि तुम नहीं जानते और जिस दिन जानोगे, अदब में कयामत आ जाएगी।"

पन्ना-२

    मैं अकेलेपन का शिकार हुए बिल्कुल अकेला बैठा हूँ। अब तो इसको पसन्द भी करता हूँ। लोक में ऐसे आदमी को इक्कलखोर कहा जाता है, शायद मैं इक्कलखोर ही हूँ। कारण क्या हो सकता है इसके पीछे- यह कोई मायने नही रखता है। मेरी सपनो की बहुत ही ख़ूबसूरत दुनिया। एक ऐसी दुनिया जहां किसी का कोई दखल न हो। किसी का किसी से कोई वैर विरोध न हो, कोई अन्याय, शोषण और नफरत न हो, जहां हर ओर प्यार, मोहब्बत और सम्मान की भावना हो। योग्यता का सम्मान हो। ख़ूबसूरती को सम्मान की दृष्टि से देखा जाए। कोई गरीब न हो, कोई इज्जत और कोई बेइज्जत न हो। मुझे ये सब सोचना, देखना अच्छा लगता है। मुझे पेड़ों, पहाड़ों, नदियों, झरनो और सागर का असीम विस्तार, हिरण, गाय, बच्छे, शेर, मोर, कोयल के सपने देखना बहुत भाता है। ख़ूबसूरती और प्रेम के यथार्थ और आदर्श रूप को देखना अच्छा लगता है। उस लड़की के होठों को चूमते हुए निकल जाना अंतिम छोर तक....  बरसात के मौसम और फूलों का खिलना, कोपलों का दमकना और तितलियाँ, तारे और धरती, मेरे सपनो के केंद्र में रहते हैं। सपनो में मैं उड़ता हूँ, समुद्र में तैरता हूँ, दौड़ता हूँ, चलता हूँ, टहलता हूँ...  फ़िल्म देखता हूँ, गाने गाता हूँ, प्यार करता हूँ... . लोक रंग के किसी रंगीन कार्यक्रम मे जीवन के उत्सव को मनाता हुआ मैं रेड वाइन के पेग लगाता हूँ। महफिलें सजाता हूँ। जहां होड़ आगे निकलकर धन कमाने की नही बल्कि हो अपने कम्यूनों के अधिकाधिक श्रेष्ठ और मजबूत बनाने की। उड़ता हुआ मैं तारों को छूकर धरती से मिला देता हूँ.....

          एक हजार उधार, पव्वा एक और फिर सड़क पर- सुबह पता लगा- बेवड़ा गिर गया था....

पन्ना-३

 दिल करता है आग लगा दूं। नेस्तोनाबूत कर दूं, विध्वंस से मिटा दूं इस समाज को, इस वहशी लोगों के समाज को...  उफ़्फ़ ये हकीकत। आप जितने ज्यादा सीधे सरल होते हैं उतनी ज्यादा आपकी जड़ें काटी जाती आर्थिक तौर पर मजबूत होंगे- उतना ही आपका सम्मान होगा। कुकर्म तक भुला दिया जाता है। सरकारी अधिकारी या उच्चाधिकारी हैं तो आप आलोचकों की नज़र में नाजिम हिकमत या नेरुदा या निराला या दुष्यंत होंगे। किसी स्थापित और चर्चित लेखक की जात के हैं तो एक ही दिन में आपकी किताबों का मूल्यांकन हो जाता है। 
   जिसके लिए, जिस मेहनतकशो के लिए कविता लिखने वाले, उन मजलूमो के लिए दो सेर आटा तक नही दे सका।

पन्ना :- ४.

     निराशा, हताशा, पस्त, दुख, संताप, अकेलापन और गुस्सा और आक्रोश और इकलाब, विद्रोह मेरे भीतर बार बार ज्वालामुखी के लावा से दहकते हैं। दिन खतरनाक है जैसे मायकोव्स्की के अंतिम दिनों की तरह या हावर्ड फ़ास्ट के शहीदनामा के सजायाफ्ता मजदूर में, या द इडियट के निकोलायविच सा .. बेचैन सा।  लेखन में कुछ स्थापित नामों से असहमतियों के स्तर की असहमति नही बल्कि घनघोर नफरत करता हूं।  
  
   पन्ना-५

यह दुनिया दगा, कपट और छल से भरी हुई है। कपट से भरे कपटी लोग और साथ जहर से भी भरे है। उनमें किसी भी तरह की प्रतिभा नहीं है। वे पूंजी और मिडिया के कारण मुख्य धारा में बने हुए हैं। अमानुष विचारों को ढोते मुर्दा लोग

पन्ना-६ 
..... 

         -''लड़ाई मत किया करो यार-- कभी देखा है किसी को  बोलते हुए या किसी को सुना है- प्रतिरोधक होकर खुलेआम बोलते हुए ?'' 

एक दिन चला जाऊंगा
कहानियों पर सवार होकर
कल्पनाओं से दूर बहुत दूर.......
तब-मत खोजना उस भूख से भयभीत, जीवन के संक्रमण से डरे हुए, पीड़ाओं और पनियाई
लाल आँखों वाले किसी लड़के को

        क्या हुआ था उस दिन- उस दिन जब पूरे दिन आंधियां चलती रही और बादल जिन्हें बरसना था मरुधरा और मैदान और घग्घर नदी के इस बहुत सुंदर और रमणीय और कामनाओ को जगा देने वाली सबसे प्यारी धरती, धरती के इस बहुत प्यारे हिस्से जिसको हम कहते हैं नखलिस्तान -- बरसना था और झूमना था। नहाना था शेखर को- नहीं, मेरा नाम ही शेखर है- बावळी टाट..... क्या हुआ था उस दिन या उस समय या उस जगह जहाँ कभी कुछ समझ ही नही आता.... पता लगा-- वो जो सदियों की गुलामी तोड़ने, अन्याय और ज़ुल्म का मुंह मोड़ने आदि का का नारा ललकारा स्टाइल में फैंकते, लाल टोपी और लाल जैकेट आदि के फैशन को मार्क्सवाद या कम्युनिष्ट की पहचान कहने वाले जब पुरस्कार के लिए किसी दल्ले के सामने कोड कोड में कोड्डे होकर अपनी गुदा पर ठप्पा लगवाकर बन जाते- सरकारी या अकादमिक कवि रूप भेड़िये- संपादक बने इस तरह के भेड़िया जो आदमखोर कवि की कल्पना का पिछवाड़ा ठोककर डाटा लगा देते हैं।

    उफ़्फ़...

  पन्ना- ७

तुम फ़िक्र मत करना मेरे शहर
मैं नहीं लौटूंगा, नहीं लौटूंगा तेरी जगमगाती दुनियां में
नहीं आऊंगा तेरे प्यार के बाज़ार में सजी
पीड़ाओं की दुकानों पर
मैं इस बात से फिक्रज़दा नही कि मेरी याद कि परछाइयों के साथ कोई चलेगा कि नहीं
या कोई चमकते जुगनुओं से पूछेगा मेरा पता

पर मैं सोचता हूँ
हाँ,मैं सोचता हूँ
ढलते दिन जब मैं विदा लूँगा तेरी गली में उगे सूखे बरगद से तब- क्या वो विदाई के इस मुश्किल वक्त में
मुझे ख़ुद की बांथ भरने देगा
क्या वो
दूर होते मेरे साये को लगातार खड़ा देखेगा
चांदनी पर सवार होकर
क्या उसकी नज़रें आएँगी मेरी पैड़ सहलाने
नहीं- मेरे शहर
मैं अब नहीं लौटूंगा तुम भी किसी भावुकता से भरे
अकेलेपन को ढोते बच्चे में मत खोजना
मेरे बचपन के उदासी भरी आंखों और चेहरे के अक्स

  (देसी के पव्वों का जो असर है- अभी नही दिखेगा तुझको.... हट भोस्या मारीगा)

..... पन्ना- ९

उम्मीदें जहाँ हार जाती है..... ज़िंदगी वहाँ मौत बन कर हमे बाँहों में कसती...

    सल्फास मिली नहीं, फंदा डाला नही, स्प्रे ताले में है-- और मैं, मैं डर गया, हिम्मत नही पड़ी---, अगर आज ये कारा हो जाता तो क्या कोई भी इंकलाबी या जीवित युवा, सहज इस दिशा बाबत सोच कायम रख पाता- साथी कह नही सकते क्योकि ज्यादा पता नहीं।
       

    पन्ना- १०

        कितनी बार इन सब बेतरतीब कागज़ो और डायरियों को तरतीब देकर लिखा, सहेजा, बचाव किया और फिर हर बार फ़ंटेसी, कहानी या जीवनी या जो भी हो, ढालने की कोशिश की, मगर नही, मैं मेरे 'मैं' के लिए जिस 'शेखर' रख रहा था वो अजब था- गाड़ी सेट नही बैठी..... उफ्फ, यह बेचैनी, अब खुद ही पढ़ें; नीचे एक अध-पागल जो जाने क्यों  और कौन सा अफ़साना था जिसको अभी ही, बिल्कुल अभी सब सुन रहे थे। 
    जैसे कील दिया गया हो उन्हें या किसी तिलिस्म में बांधा गया हो। एक किसी कवि जिसका किस्सा लोग हवाओं की सरसराहट में तलाशते हैं। कयास लगाते थे- वो एक  बीमार कवि था। एक ऐसा शराबी  कवि जिसने खुद से ही खुद को खत्म कर लिया था। 

    मोहब्बत या बेरोजगारी या क्रांति या उपेक्षा, दलगत राजनीति करते लेखक, गांजा, पोस्त या शराब या जो भी हो, वही कारण था उसका, उसकी बर्बादी में हाथ था

 ( पन्ना- ११)

      उस बीमार कवि से मुलाकात...  जिसका नाम शेखर ( और एक बीमारी खुद मेरे अस्तित्व की थी जो हर बार या कहूँ, हीरो, बौद्धिक स्टार या ऐसा ही कुछ समझने के फेर में मैं हास्यास्पद हो जाता हूँ इस शेखर नाम के खुद मेरे ही किरदार से) था, जो टॉलस्टॉय के उपन्यास 'इडियट' वाली जादुई नारी नस्तास्या फिलिप्पोवना से इश्क करता है-- जो हकीकतन नामुमकिन तो नही मगर मुश्किल था- गुलाबी होठों के चुंबन से- प्यार, संभोग और पलायन... पलायन ?? पलायन शायद नहीं--- सुबह सुबह हैंगओवर से बचाव के लिए एक पव्वा दारू या-- पूरे दिन पीते रहना और- जब जब भीतर भूकंप उठते तो 'बिफोर रेन'-की श्यामवर्णीय कमसिन तो नही मगर ज्वाला सी दिखती  नंदिता दास के होठों की शेप पर फिदा होकर  कविता लिखता है, बुरा क्या है ? .... भला भी तो नही है ना । चल छोड़ो यार-- कभी कभी वो जो दीप्ति नवल जैसी सांवली सलौनी साथी की चाहत रखता हुआ कल्पना के बिस्तर पर उसको महसूस करता हुआ पड़ा रहता है रात भर (बस मैं ये ही एक जुल्म खुद के साथ बर्दाश्त नही कर सकता हूँ और भगाकर आवरण रूपी शेखर को, खुद आता हूँ) प्यार भरे सपनो संग, और जैसे सपनो की बहुत सघन, पवित्र और मीठी सी काम इच्छाएं जैसे ही हावी होकर मुझे, मुझमें ही स्थाई करने की कोशिश करती है- उसकी बहुत गहरी, बड़ी बड़ी कामुक मगर शरारती आंखे- थोड़ा टेढ़ा करके गर्दन को जब देखा कातिल तकणी से और वे सपने जो हमेशा हमेशा के लिए वहां स्थाई होने थे-- रात के स्वप्नदोष से झरकर बन गए दाग- चाँद में अब भी दिख रहे हैं जैसे- मर चुके शुक्राणुओंं की लाशें....

   आदमी अब कहाँ है
-" यह टूम तो गई काम से-- सुबह चार बजे से दारू पी रहा है....'' कौन था, पागल साला।

     मैंने उसको देखकर पुकारा शेखर नाम लेकर  तो, ''शेखर ? कॉमरेड ?''...... उसने कहा । सही सोचा था शायद । वही शेखर जो लाल लाल आंखों और बेतरतीब सी जिंदगी जी रहा घनघोर अराजक कवि। शेखर या खुद मैं ??? जाने क्यों आज बरसात नही हुई।

  ( पन्ना--१२)

   -"यह निहायत गलत है या सही, पता नही, नीलम दोस्त है और दिवाकर की प्रेमिका - (नाम बदल हए हैं।) एक या दो बार गलतफहमी या जो हो उसे समझा जा सकता है- आज अठाइस दिन हुए- अनवांटेड की कितनी गोलियां दे दी- या वो दूसरे वाली.... वो चली गई, दिवाकर का ब्रेकप क्या मैंने करवाया था- साले....

    सब कुछ उजड़ा हुआ हो जैसे

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 आवारा की विदर्भ डायरी :- विश्व पुस्तक दिवस..... 
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                                      ● सतीश छिम्पा

किताबें-
करती हैं बातें
आज की कल की... एक एक पल की
खुशियों की ग़मो की... फूलों की बमो की
प्यार की मार की..... जीत की हार की

"बेहतर दुनिया का रस्ता बेहतर किताबों से होकर जाता है"

        (..... दुनिया की हर आदत से बेहतर और पवित्र है किताब पढ़ने की आदत, आप अगर रोज एक किताब पढ़कर सोते हैं या पढ़े बिना आपको नींद नहीं आती तो आप जीवन की सबसे ख़ूबसूरत शै के साथ हैं। किताबों से किया गया प्यार कभी आपको निराश नहीं करता, यह आपको बेहतर बनाता है। जेब मे भले धेला ना हो मगर आप जब किताब मेलों और किताबों की दुकानों की ओर खिंचने लगते हैं तब समझिए कि आप सुंदरता की ओर बढ़ रहे हैं।)

ये पूंजीवादी साजिशें...... एक दौर था जब लोग किताबें पढ़ने में पढ़ाने और चर्चाओं को पसंद करते थे। बहस मुबाहिसे और पाठक मंचों का स्वर्णिम दौर था। साहित्यिक पुस्तकें और पत्र- पत्रिकाएँ ढूंढ़कर पढ़ते थे। पंसारी की दुकान तक पर सरस्वती, चांद, लहर, अणिमा, हंस, साप्ताहिक हिंदुस्तान और सारिका, धर्मयुग, नई कहानी और कविता आदि जैसी पत्र पत्रिकाएँ उपलब्ध हो जाती थी। लोग बाग अध्ययन और चर्चा करते थे। बातों के केंद्र में विमर्शों के मुद्दे तय हुआ  करते थे। विमर्श होते थे.... चर्चाएँ...  हथाईयाँ होती थी। छोटे से छोटा या कहूँ नया लेखक भी पहचान लिया जाता था। क्लासिक्स का जमाना था। विश्व साहित्य के अनुवाद हुआ करते थे। समकालीन आत्ममुग्ध बीमार मानसिकताओं वाली युवा पीढ़ी की तरह तंग नजरिया और गंभीरता का नकली आवरण, नकाब तब नहीं हुआ करता था। वे हकीकतन बेहतर लोग थे।

     अब सब अतीत हुआ। क्योंकि बाजार ये अच्छी तरह से जान गया है कि अपने मुनाफे में इजाफे के लिए कैसे इन सामाजिक प्राणियों की रुचियों को बदला जा सकता है। आप चाहे कितने ही चंट चालाक या डेढ़ स्याणे बनिए, वे फिर भी टोचरी में दे ही देंगे, कोई न कोई उत्पाद। बाजार में माल की कमी नहीं, इसीलिए श्रम के लिए मज़दूर भी कहाँ कम है। यह तो आप पर हैं कि आप कहाँ तक टिककर काम कर सकते हैं। मानसिक द्वंद्व, आर्थिक, सामाजिक और दैहिक द्वंद्वों के बीच, इसी तरह के पूंजी के पंक में पड़े बाजार में मुझको रोज़गार के लिए उतरना ही था। आज नहीं तो कल। किताबों ने उस समय जब अध्ययन बहुत कम ही था  या कहूँ शुरुआती समय मे था। मुझे बनाया और उभारा था।

     वो समय, आत्महत्या या भाग जाना, पलायन का विचार उफ्फ,  मुश्किल दिनों से क्यों न गुज़र रहे हो..... आत्मबल  आपको हमेशा संघर्ष की प्रेरणा देती है। हौसला देती है। जब आप भूख और बेरोज़गारी से मोर्चा ले रहे होते हो तब "चार्ली चैप्लिन" की आत्मकथा आपको ऊर्जा देती है। कठोर से कठोर दिनों में ऑस्त्रोव्स्की आपको जज़्बे से भर देता है और अँधेरे दिनों में नाजिम हिकमत की कविताएँ आपके सपनो को पंख लगा देती है.... और फिर अवसाद के बाद और हरा हो जाता है जीवन। अवसाद के कठोर दिनों में जब आप सम्हल नहीं पाते हैं और अंधेरों की और मुड़ जाते हैं, तब लगता नहीं कि ये अँधेरा कभी छंटेगा, मगर एक दिन जब कोई नर्म, मुलायम उम्मीद आपके भीतर उतरकर पलने लगती है, तब उजाले आपको अपनी बाँहों में लेने के लिए बढ़ते हैं....  दिन मुश्किल होते हैं और आप अपघात के करीब होते हैं, लोग समझते हैं कि आपका काम तमाम हो गया, आप खत्म हो गए कि एक दिन आप किताबों की ओर मुड़ जाते हैं और उठ खड़े होते हैं, तब जीवन आपके लिए फिर से सहज रूप धर लेता है। प्यार आपको बाहों में लेने को मचलने लगता है। दुनिया के वे दो तरह के लोग जो आपको प्यार करते हैं तो निर्मम तरीके से आपको रौंदकर मार देना जो चाहते हैं, विवश देखने के अलावा कहीं कुछ भी नहीं कर सकते हैं। 
 
मुझे यह कहने में या स्वीकारने में कोई हिचक नहीं हैं कि मैं आज भी किताबों के लिए, दुर्लभ मगर महत्वपूर्ण किताबो के लिए जोखिम उठा लेता हूँ। विश्व पुस्तक मेला (प्रगति मैदान, दिल्ली) का वह दौर आज तक मैं भूला नहीं हूँ जब एक धेला तक मेरी जेब मे नहीं था और में अवध असम गाड़ी में बिना टिकिट दिल्ली पहुंचा था। बिना किसी से संपर्क, घबराया, अजब सी विक्षिप्तों की तरह की शक्ल, अक्ल और बाल.... क्या करूँ और क्या ना करूँ में उलझा ही था कि एक कोई ऐसा दिख गया कि मेरा सब कुछ जो नामुमकिन था, हल हो गया (यह किस्सा अलग से कभी लिखूंगा) था। .... और जब मैं वापस सूरतगढ़ लौट रहा था तब मेरे पास बहुत सी किताबें थी, ऐसी किताबें जिनकी तासीर तक पहुंचना राजस्थानी युवाओं की रुचि का विषय ही नहीं रहा।

किताबें चोरी करना मेरी मजबूरन बनी आदत का एक बड़ा हिस्सा है। आज भी ना मिलती हो किताब तो चुरा लेता हूँ। किताबों के बारे में बीमार आदर्श भरी बातें बहुत चुभती है। किताबें पढ़ने की रुचि का मतलब कहानी उपन्यास ही नहीं भाई, इससे तो फिर टीवी ही देख लो, वो भी अच्छा है। बहुत से अन्य विषय, दर्शन का अध्ययन ज्यादा जरूरी है। जाने कितने ही मित्र परिचितों से उधार ले लेकर किताबे खरीद और पढ़ चुका हूँ। सूरतगढ़ में मार्क्सवादी स्टडी सर्किल भी मैंने ही शुरू किया था- एक ऐसी पहल जो अब तक राजस्थान में हुई ही नहीं। एक मुहिम जो जीवित युवाओं को मुख्य धारा से जोड़ने का प्रयास है।


   ● सतीश छिम्पा   

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एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...