अमर शहीद कॉमरेड जयमल सिंह पढा
( ●सतीश छिम्पा)
'गीत मेरे नूं ओहिओ जाणे, जेहड़ा जग दे दर्द पछाणे..'
इंकलाबी कवि होना- सिर्फ कवि होने जितना आम नही है बल्कि अपने आप मे मुक्ति के एक महान विचार जो अपनी उज्ज्वल स्वाभाविक तासीर के साथ बहुत सुंदरता के साथ लोक में, या कहें जन में- जनता के प्रतिबद्ध प्रतिरोधी कवि की जाग्रत चेतना के साथ व्यवहारिक गति के बाद मौलिक, जीवंतता के साथ सदियों सोई रही मेहनतकश आवाम को जगाने का काम करना ही प्राथमिकता है जो जन चेतना को बहुत गहरा, सघन और स्थाई आधार दे कर मुक्ति के स्वर को विजय पताका के साथ आह्वान का नाद करते हुए सत्ता का विध्वंस करने को ललकारता है मज़दूरों और क्रांतिकारियों को । मनुज ना केवल जन जीवन के गीतकार थे, बल्कि रेडिकल महान उभार और हथियारबंद क्रांति के भी पक्षधर थे। उनका मानना बिल्कुल सही था कि इस दिमागी सामंती लूट और घटिया फ़ितरतों और शोषण और अन्याय और गैरबराबरी को नवजात भारतीय पूंजीवाद खत्म नही करेगा बल्कि हित साधेगा, मनुज की शंकाएं सच भी हो गई थी।
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पंजाब की धरती शहीदों और शहीद कवियों की धरती है। जहां बाबा बूझा सिंह, प्रिथीपाल सिंह रंधावा, पाश, अमर सिंह अचरवाल और जयमल पढा आदि के साथ ही साथ अनेक ऐसे कम्युनिस्ट्स जो नक्सल दौर और उसके बाद खलिस्तान उग्रवाद के समय चुन चुन कर निहथे कॉमरेड्स को मारा गया था। जयमल सिंह पढा को खालिस्तानी दहशतगर्दो के 1988 में कत्ल इसलिए कर दिया था क्योंकि वे वहां के आम जन के बीच बहुत ही सकारात्मक रूप से जाना जाने वाला सबसे प्रिय और चहेते क्रान्तिकारी थे। वे जैसी कविताएं लिखते थे, वैसा जीते भी थे। जीवन और कलम में कोई फर्क नहीं था।
"पुत्त पा के शहीदी तेरा अम्मिए नीं अमर हो गया
ओस दा वेख के पहाड़ जिदड्डा जेरा, नीं वेरी वी हैरान हो गया।"
- "हुआ की जो जालिमो ने दित्ता एक पुत्त मार नीं
लक्खा होर पुत्त ने तेरे, वेख किवें जुझार नीं।"
जयमल पढा उन चंद क्रांतिकारी कवियों में से है, जो शहीद हुए और बहुत कम जी पाए मगर जितना कम लिखा, उतना ही बेहतरीन, सँघर्षो को शब्द देना अद्भुत था। पहले नक्सल मूवमेंट में पुलिसिया और सामंती जुल्म और दमन और फिर खालिस्तानी उग्रवादियों से मुठभेड़, ये थे असल यौद्धा। जिन्होंने पंजाब, हरयाणा में ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत में क्रान्ति और प्रतिरोध की अलख जगाई। इनके पास कविता वैसे नहीं आई जैसे प्रोफेसर, अधिकारी या अशोक वाजपेयी या सुरजीत पातर के पास आई।
अमर शहीद जयमल पढा की शहादत पंजाब में कट्टरपंथी अलगाववादियों की बलदेव मान की शहादत के बाद एक और सबसे बड़ी गलती साबित हुई.... इधर पंजाब से जो जो बहुत बुरे हालातो के फिर से उठ खड़ने के समाचार आ रहे हैं, उससे जाहिर है कि पंजाब के फासिस्ट्स किसी बहुत घिनोने काम को अंजाम देने वाले है। दो समुदायों के कट्टर धड़े और दोनों ही बर्बर- इसलिए पंजाब की धरती के महान शहीदों पर लिखे जा रहे लिखतों का एक- एक संक्षिप्त अंश यहाँ देना जरूरी हो जाता है जो यह साबित कर सके कि धर्म नहीं, तुम्हारे या कहें लोगों (लोक) के आशिकों ने इंकलाब के लिए जान वारी थी- पेट, भूख, असमानता, अन्याय और जुल्म (राजसत्ता के साथ ही खाड़कू लहर के आतंक से भी वे जूझे) से लडते हुए जो शहीद हुए- वो शहादत की राह ही है जो तुम्हारी ही नही बल्कि देश की पीढ़ियों तक को सरचानण कर गई है।
जैमल पढा एक प्रतिबद्ध, समर्पित और ईमानदार कम्युनिष्ट क्रांतिकारी थे जो हर एक मोर्चे पर लग्न और हौसले से अथक और निर्बाध रूप से तूफान की तरह उठता और जुटता रहा, जमीन पर जमीनी संघर्ष जो किसी धार्मिक आतंकियों की तरह फिरौती नही लेते थे बल्कि उन सब आतंकी बर्बर चेहरे को सरेआम कर देते थे। बलदेव सिंह मान और दर्शन दुसाँझ की तरह ही वो भी एक उज्ज्वल नाम , एक नाम जो क्रांति के लिए क्रांति में न्योछावर होता हुआ जीवन के गरिमामय गीत गाता हुआ इस महान बदलाव, मुक्ति के महा समर में, इंकलाब के लिए इस इंकलाबी मुहिम में जुटे हुए थे।
वर्ष 1967-69 और 1970-71- 73 (1974 का थोड़ा हिस्सा) इस इंकलाबी लहर का सबसे महान और स्वर्णिम दौर था जब अन्याय और जुल्म करते वर्ग शत्रुओं के बीच भयानक रूप से भय पैठ गया था - उस दौर में जब जब भी और जिस पर भी सेठ, साहूकार, बुर्जुआ किसान, अफसर, व्यापारी और सामंती कुलुक किसान मानवद्रोही और राज- सत्ता जुल्म ढाती, अन्याय या जबरदस्ती करती- तब ये लाल लहर के महान बोल्शेविकों के वंशज उनके उत्तराधिकारी.….. लाल यौद्धा उस अन्याय का मुंहतोड़ जवाब दिया करते थे।
जयमल बहुत अच्छे प्रतिरोधक कवि थे जो जब 1967- 72 तक के ये साल इस महान मुक्ति युद्ध के तड़थल्ली मचा देने वाले गरिमा भरे सबसे सक्रिय वर्ष थे। पढा की कविताएं मुखरित होने लगी थी।
देश के हर हिस्से में संकट आम कामकाजी लोगों के जीवन को दयनीय बना रहा था। देश भर में नक्सली आंदोलन के सरकार के अंधाधुंध अन्याय, दमन और हत्याओं और नक्सली नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नकेल कसने की इसकी नीति के खिलाफ विरोध प्रदर्शन लोगों के मन में नफरत भर रहा था। उसी समय, नक्सली आंदोलन का एक वर्ग जन संगठनों का निर्माण करने और जन संगठनों में क्रांतिचेता विचारो के लिए सक्रिय भी था। आक्रोश के लिए महान वाहक बनने की ओर बढ़ रहा था। सन 1971 ई. में पश्चिमी मोर्चा पाकिस्तान के साथ युद्ध के चलते दहक रहा था। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पाकिस्तान के साथ युद्ध जीत लिया था और अंध राष्ट्रवाद के बवंडर को अपने पक्ष में रखा था, जल्द ही अंध उत्साह का बुलबुला फूटने लगा।।
छात्र युवाओ ने सिर पर कफ़न बांधकर ही घर से निकलने लगे थे। नहीं तो भला कौन सा भलामानस आग में कूदता है। परंतु जवानी को तो इंकलाबी, जुझारू, योद्धा, नक्सलबाड़ी बनने का पागलपन हो गया था । उन्होंने न तो नहरों के किनारों पर पुलिस की गोलियां की परवाह की और न ही वो उत्पीड़न सेंटर के समक्ष डोले ( घबराए)। हुकूमत उन्हें शहीद करती, और नौजवान बसंती गीत गाने के लिए आगे आ जाते। 1967-69 का पहला दौर था। खाते-पीतों (धनाडों) की हजारों एकड़ जमीन पर मजदूरों किसानों के कबज़े करवाने और विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा के लिए सड़कों पर लाना महान मुक्ति समर की जीत थी। जब पंजाब के गांव- गांव और घर- घर से जमीनों पर लाल झंडे गाढ़ने के लिए इंकलाब की आस में मरजीवड़े उठने लगे और मुक्ति गीत महकने लगे और विद्यार्थियों ने हुकूमत को कंपकपी ला दी तब फिर पुलिस का अत्याचार शुरू हुआ ।
क्रांतिकारीयों ने बदले के रूप में वर्गीय दुश्मन के सफाए की लाइन अपना ली। यह सिर लेने और देने का समय था। राजशाही की तरफ से बेहतरीन नौजवान मारे गए और लापता कर दिए गए और बाकियों को तिल तिल कर मरने के बाद जेलों में बंद कर दिया गया । यह नक्सलबाड़ी लहर का हथियारबंद वाला दौर था। इस जुझारू विद्रोही लहर के लिए जंगबाजों का कत्ल और जेलों के नर्क ने एक बार गैप पैदा कर दिया । हुकूमत उनकी कमर तोड़ने में कामयाब हो गई ।
उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानों का संघर्ष छिड़ गया और 1972 में पंजाब के किसानों ने जमींदारा यूनियन के नाम पर अपनी मांगों को लेकर लड़ाई शुरू कर दी। मोगा में छात्र लहू का प्रचण्ड आक्रोश, दावानल सा उबलता गुस्सा जो एक विशाल और हिंसक, महान और ऐतिहासिक संघर्ष में बदल गया था। 1967-69 और 1970-71 नक्सली आंदोलन के सबसे सक्रिय वर्ष थे। देश के हर हिस्से में संकट आम कामकाजी लोगों के जीवन को दयनीय बना रहा था।
देश भर में नक्सली आंदोलन के सरकार के अंधे दमन और नक्सली नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नकेल कसने की इसकी नीति के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन लोगों के मन में नफरत भर रहा था। उसी समय, नक्सली आंदोलन का एक वर्ग सार्वजनिक संगठनों का निर्माण करने और सार्वजनिक आक्रोश के लिए वाहन बनने की ओर बढ़ रहा था। गाँव के बदमाशों, जमाखोरों, ब्लैकमेलरों, मुखबिरों और ठगों की नींद से वंचित दिख रहा है। यह ऐसा था जैसे कोई समुद्र मंथन कर रहा हो और देवता सभी राक्षसों को चुनौती दे रहे हों। नाटककार गुरशरण सिंह के नाटक अपना असर करने लगे थे।
उत्तर भारत मे जहां लोक भाषाओं की कविताओं पर तेलंगाना सशस्त्र किसान उभार का प्रभाव नगण्य रहा वहीं नक्सलबाड़ी इंकलाबी उभार ने इतना गहन प्रभाव डाला था कि पंजाबी में संतराम उदासी, लाल सिंह दिल, अवतार पाश, दर्शन खटकड़, जयमल पढा आदि अनेक कवि नक्सल महान उभार के प्रतीक बनकर आए थे। वर्ष 1967-69 और 1970-71- 73 (1974 का थोड़ा हिस्सा) इस इंकलाबी लहर का सबसे महान और स्वर्णिम दौर था जब अन्याय और जुल्म करते वर्ग शत्रुओं के बीच भयानक रूप से भय पैठ गया था - उस दौर में जब जब भी और जिस पर भी सेठ, साहूकार, बुर्जुआ किसान, अफसर, व्यापारी और सामंती कुलुक किसान मानवद्रोही और राज- सत्ता जुल्म ढाती, अन्याय या जबरदस्ती करती- तब ये लाल लहर के महान बोल्शेविकों के वंशज उनके उत्तराधिकारी.….. लाल यौद्धा उस अन्याय का मुंहतोड़ जवाब दिया करते थे।
तेलंगाना का प्रभाव मराठी और तेलगु पर ज्यादा रहा- उत्तर भारतीय भाषाओं की बात की जाए तो मनुज देपावत के रचाव में यह प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। राजस्थानी समाज जो अपने रियासतकालीन सड़ चुके सामंतवादी संक्रामक रोग को आज भी ढो रहा है जिसके चलते यहां कविता सिर्फ कविता है, इंकलाबी कविता नही- जबकि यहां का इंकलाब विस्फोट की तरह हुआ था।
मैंने अपने पहले के लेख में पंजाबी और राजस्थानी इंकलाबी कविताओं के मूल्यांकन के समय लिखा था कि --" लोक' के कवि कोई तटस्थ कवि नहीं थे बल्कि रेडिकल क्रांतिकारी चेतना से लैस कवि थे। उनका मानना था कि क्रांतिकारी साहित्य जनांदोलनों और जनसंघर्षों की उपज होता है। प्रगतिवादी आंदोलन के बाद दूसरी बार किसान-मजदूर व निम्न वर्ग उनकी कविता में अपनी आशा-निराशा, कुंठा-पराजय, आकांक्षा-सपने और संघर्ष के बहुतेरे रंगों को ले कर प्रकट हुए। यहाँ कुछ अतियाँ भी हुई। जैसे, संघर्ष के लॉजिकल चित्रण का मुख्य स्वर सशस्त्र क्रांति का रहा मगर भटकावों का भी आना जाना लगातार था। जब पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी ताल्लुक के एक गांव नक्सलबाड़ी से भारतीय शोषक राज सत्ता के विरुद्ध विद्रोह, क्रांति की शुरुआत हुई जिसने हर संवेदनशील युवा को प्रभावित किया था। इसी प्रभाव क्षेत्र में आए पंजाबी के महान क्रांतिकारी कवि गीतकार संतराम उदासी। उस दौर में जब पाश जैसा खतरनाक कवि भी मंच पर पसीने से नहा जाता था क्योंकि सारी की सारी भीड़ चिल्ला उठती थी 'संतराम उदासी' जिंदाबाद के नारों से। संतराम जी नक्सल क्रांन्तिकारी थे, उनकी मीटिंग्स और अभियानों के हिस्सा थे। जिसकी वजह से पंजाब पुलिस ने उनको इतना ज्यादा टॉर्चर किया था कि उनकी दोनों आंखे हमेशा के लिए खराब हो गई थी। उनके सर के बालों के ताण लटकाया जाता था। इस जोर जबर और जुल्म के कारण ही उदासी के गीतों में विद्रोह घुला था। पाश, उदासी और लाल सिंह दिल की यह तिकड़ी जबरदस्त थी। वे मजहबी सिख थे, दलित मगर अम्बेडरवादी नहीं थे, मार्क्सवादी थे। मैं खुश नसीब मानता हूँ खुद को कि पाश को पढ़ने की ललक के कारण जो पंजाबी भाषा पढ़नी लिखनी सीखी उसके कारण संतराम उदासी को समग्र रूप में मूल पंजाबी भाषा मे ही पढ़ा- और बाद में जब मनुज को पढा और मनन किया तो सुखद आश्चर्य तो खैर था ही लेकिन झटका भी लगा कि हमारे अग्रजों ने कभी क्यों नही किया तुलनात्मक मूल्यांकन, हम कितनी महान परम्परा से विमुख रहे हैं। खैर अब इस दायित्व को निभाना जरूरी हो गया है।
नक्सल उभार के क्रांतिकारियों को जालिम राज सत्ता की क्रूर मार और व्यवस्थागत सामाजिक और लौकिक पुरातन रोगों जातीयता, धर्म, सामंती सोच और अन्य तमाम पीड़ाओं को सहते हुए वे मेहनतकशों के सम्मान, जीवन, श्रम और संघर्षों की गरिमा जो इस व्यवस्था के हाशिए पर पड़ी ज़िंदगी की तरह के अनेक दुखों, पीड़ाओं, हताशाओं और संघर्ष के उज्ज्वल गीत, गरिमामय भाव, ओजपूर्ण विद्रोह, और माटी, खेत के सबसे कोमल और वात्सल्य पूर्ण अद्वितीय भावनाओं और कल्पनाओ की जगह हकीकत का जीवंत चित्र और संघर्षो से तपकर निकले समय के साक्षी लोक के लोगों के उग्र आक्रोशित मनोभावों और टूटती जा रही आस, हार, हीनताबोध और न जाने कैसे- कैसे महताऊ भावों को साथ रखते हुए हर एक की तरफ बहुत सघन और गहरा हस्तक्षेप करते वे एक प्रचंड क्रांतिकारी कवि रूप में स्थापित हो जाते है- मगर राजस्थान के मध्य मार्गी धड़ों ने साजिशाना तौर इन्हें हाशिए पर रखते हुए मार्क्सवादी अप्रोच को मुख्यधारा से दूर ही रखा, को अब हम सब साथी क्रांति के इस महान गीतकार को ले आने के प्रयास में हैं।
भूख, लाचारी, मजबूरी, बीमारी और हाशिए पर पड़े तड़फ रहे जनजीवन, झुग्गियों में मर खप रहा मेहनतकशों और बाजारू दुनिया मे मर रहे संबंधों और अत्याधुनिक समय की बुर्जुआ फ़ितरतों पर बड़ा निर्मम वार करते हैं । एक और जहाँ आर्थिक वर्ग विभाजक रेखा या खाई का आकार बढ़ते हुए जीवन को लील रहा है- वहीं मानवद्रोही और जीवन को अपमानित करते रहने वाली मौजूदा राजसत्ता जब लोक को हाशिए पर पटक, अभिजात्य वर्ग के कलावादी मानवद्रोही और जीवन से कटे बुद्धिजीवियों को लगातार आगे ही आगे बढ़ाती जा रही है- यह औचक नही कि श्रम, जीवन, लोक, शब्द, भाव, कविता और प्रतिरोध के बजाए - मानवद्रोही बौद्धिकों को समकालीन फासिस्ट बर्बर सत्ता के तमाम लाभ मिलना और एम.एन. रॉय से लगाकर कॉंग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम में मुख्य अज्ञेय तक को महामानव रूप में प्रस्तुत किया जाना- मानसिक विकलांगता से ज्यादा कुछ नहीं। इनके यहां बौद्धिक विलासिता की सीमा अंतहीन है जिसके कारण यहां से दार्शनिक, कवि, चिंतक, शिक्षाविद, रंगकर्मी या कह सकते हैं कलाओं और जीवन के तमाम स्वनामधन्य भरी पूरी पीढ़ी है। इन मानवद्रोहियों ने अनेक मार्क्सवादी कवियों और प्रतिरोधक बैरिकेड्स को छल से हाशिए पर टिका रखा था।
सन 1988 ई में ही पाश की तरह ही इनका कत्ल हो गया था। वो एक आवाज खामोश हो गई जिसने देश को एक नया क्रान्तिकारी आयाम दिया। कविता और नज़्म को विद्रोह के नए स्वरों से साधा। पढा के लेख और चिट्ठियां, जिनका सिर्फ नाम मात्र ही बच्च सका है, न सिर्फ अपने वक़्त के बल्कि बाद के भी नुकसान दिख ही रहे थे। वे उनमे से थे जिन्होंने जुल्म को चुनौती दी। मगर आज पंजाबी के इस योद्धा कवि को खास पंजाब के ही युवा पूरा नहीं जानते। गौर करो जवानों, यह नाम,जी, बिल्कुल यही एक नाम जो गरिमामय है, उज्ज्वल नाम है जयमल पढा.... इसको सहेजना अब तुम्हे है।
अक्टूबर क्रांति, विद्रोहों का दमन और क्रांति को तत्कालीन वस्तुस्थिति के अनेक प्रमुख हानिकारक, धोखेबाज, कला के व्यापारी, राजनीतिक छल-कपट, लोकतंत्र की आड़ में सामंती जोर जबर और अधिकारों का हनन और हिंसा का विस्तार आदि का सामना करते हुए स्थाई मजबूती से स्थापित किया गया था। शोषक वर्गों के साथ जुड़े हुए कलावादी और मध्य मार्गी तबकों में बढ़ती हुई मूल्यहीनता आदि स्पष्ट रूप में उभर कर आते हैं.... जबकि मनुज खुद अपने आप मे एक युग हैं। उनका हर एक गीत का एक महान उज्जवल पक्ष है कि वे जीवन से कटे हुए वर्ग, भाव, शब्द और भाषा का हर भाग का निर्मम आलोचनात्मक निस्तारण के पक्षधर रहे है। घनघोर सामंती समय मे भी विज्ञान की सृजनात्मक विधियों से संचालित चेतन्य पक्ष को स्थाई प्रतिरोधक बनाने के सकारात्मक प्रयास करना ही आने आप मे महानता है।