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Monday, 12 October 2020

इंकलाबी महान परंपरा


जड़ों से परिचय..... (१)
बात जो महज बात नही होती                                                           

इस एक तस्वीर को देख जाने क्या क्या भाव उठे भीतर, सम्मान और प्रतिबद्ध पक्ष को उभारने के लिए..... स्वतः ही जैसे क्रियाशील हो गया हो मन। जैसे मानव जीवन अवमूल्यों से भरे होने के बावजूद जीवन की इच्छाओं और जज़्बों के चलते बहुत गहन और उज्ज्वल मूल्यों के साथ बढ़ता हुआ रचाव को सम्मान की दीठ देता है।

यह तस्वीर किसी भांत के महिमामंडन के लिए नही बल्कि  अग्रज पुरौधा लेखकों की इस तस्वीर को देखकर आए समकालीन युवा रचनाकार के भीतर उठे भाव हैं जो तुलनात्मक या मूल्यांकन के लिए नही बल्कि दो समयों के भीतर के स्पेश को जानते हुए, इनके अवदान का परिचय भर देना चाह रहा है।  जब भी मैं किसी लिखत के या हमारे अग्रजों की तस्वीर के आगे उक्त लिखता हूँ-" हमारे पुरौधा"  तो भीतर की हर तरह की शंकाओं का समाधान पहले ही हो जाता है।

अतीत को जानबूझकर प्रदूषित किया जाना और बीमारू धारणाओं को लाद दिया जाने के विरुद्ध सही बातों को सांस्कृतिक जामा पहनकर आगे लेकर आना- यहां महिमामंडन नही माना जाना चाहिए, अतीत की बिसरा दी गई अग्रज पीढ़ी से हथाई का प्रयास है। यह तस्वीर -- किसी भांत के दिखावे के लिए नही बल्कि दो अग्रज पुरौधा लेखकों की इस तस्वीर को देखकर आए समकालीन युवा रचनाकार के मन के भाव है। 
  
     (० तस्वीर में पंजाबी के चर्चित कथाकार अजमेर सिद्धू है।) 

      भाई अजमेर की इस तस्वीर जिसके पीछे गुरबख्श प्रीतलड़ी है -को देखकर लगा जैसे जो एक महान परम्परा एक महान प्रतिरोधक महासमर के साथ-साथ ही बनी, चली और बढ़ते हुए फली फूली- जीवन की उज्ज्वल गरिमा को कायम रखने के लिए लड़ा जा रहा महान मुक्ति समर-  जैसे मानव जीवन अवमूल्यों से भरे होने के बावजूद जीवन की इच्छाओं और जज़्बों के चलते बहुत गहन और उज्ज्वल मूल्यों के साथ बढ़ता हुआ जो रचाव को जीवन मूल्यों के रचाव और उसी के सम्मान की दीठ देता है। प्रेमचंद को या 'उसने कहा था' जैसी महान रचना देने वाले चन्द्रधर शर्मा गलेरी, या पंत, प्रसाद या भारतेंदु हरिश्चंद्र या फिर वैश्विक स्तर पर टॉलस्टॉय या बाल्ज़ाक या बाई जुई या मार्खेज.... आदि महान शख्सियत अपनी जो छब या छटा या रचनात्मक रूप गुण का प्रभाव रखते हैं वैसा ही असर रखते हैं हमारी लोक भाषाओं के महान मगर हमारी अज्ञानता के चलते अनजान बने रहने और अल्पज्ञात समझे जाने वाले रचनाकार...... भाई वीर सिंह, मोहन सिंह, जसवंत कंवल, गुरदयाल गुरदयाल सिंह,  गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी आदि....... जो कि युग है।

     गुरबख्श सिंह प्रितलड़ी का जन्म 26 अप्रैल 1895 को सियालकोट में हुआ था। उनके पिता का नाम पेशावर सिंह और उनकी माता का नाम मिलणी कौर था। उनके पिता की मृत्यु हो गई जब वह केवल सात वर्ष के थे। गुरबख्श सिंह आदर्शो पर चलने वाले, सत जीवन के और सकारात्मक दीठ के सूझबूझ और उज्ज्वल जीवन के स्वप्नदर्शी ही नही बल्कि उन देखे हुए स्वप्नो को हकीकतन रूप देने वाले व्यक्ति थे।

      पंजाबी साहित्य के लियो टॉलस्टॉय की तरह से दिखने और व्यवहार और लहजा जो उनका मौलिक था। किसी दरवेश की तरह का पाक साफ और काल्पनिक या मिथकीय पत्रों की तरह अलौकिक चमत्कारी भेष और उजास भरे शब्द..... पंजाबी साहित्य के इस टॉलस्टॉय के लिए लोगो का मानना था कि वे दुनिया को बर्ट्रेंड रसेल की तरह एक समुदाय के रूप में देखना चाहते थे, बेशक अव्यवहारिक, मगर मिथ स्वप्नों सा रोचक है।  

मार्क्सवाद के सिंपेथाइज़र थे और इस दीठ से वे अक्सर अक्टूबर क्रांति के महान कारज और उनके तेज गति से विकसित होने की प्रभावशाली स्थापनाओं  और धारणाओं और सिद्धांतों से सहमत और प्रभावित भी थे, वे मार्क्सवाद के आर्थिक और सामाजिक समानता के इस महान सिद्धांतों के समर्थक थे। उन्होंने लोगों से जाति और रंग भेद से ऊपर उठने को कहा। 

    गुरबख्श सिंह मार्क्सवादी विचारधारा और सोवियत मेहनतकश व्यवस्था के बहुत करीब थे। वे पहले ही व्यक्ति थे जिन्होंने मैक्सिम गोर्की के महान रूसी उपन्यास "मदर" का पंजाबी में अनुवाद किया.... और 1971 में, उन्हें सोवियत नेहरू पुरस्कार मिला। 

      गुरबख्श सिंह पंजाबी में एक नई, मानव हित और प्रेमिल, मानव हित विचारधारा को स्थापित भी किया और इस सिद्धांत पर अपने सभी कार्यों को अनुकूलित किया। प्लेटो के प्लेटोनिक प्रेम के नक्शेकदम पर चले सिद्धांतो को हल्का और धुंधला रहे भावों की तरह हटाने के बाजाए उन्नत मानवोचित स्वभावो का ना केवल मूल तत्व बल्कि गांभीर्य भी स्थापित किए जो अन्य  परम्पराओं में भी थापित हुए, गुरबख्श सिंह ने प्यार को कब्जे की भावना के साथ असंगत बताया और सहज प्रेम की अवधारणा को समझाया। प्रीत झरोखा से उनके संपादकीय, लेख और कॉलम के बारे में चर्चा, जो कि प्रीतलड़ी में प्रकाशित हुई थी, पंजाब के पाठकों के बीच आम थी। स्वास्थ्य पर उनके लेख युवा लोगों में नई स्वास्थ्य संबंधित सोच विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने सियालकोट से 10 वीं पास की थी। उन्होंने लाहौर में उच्च अध्ययन के लिए कॉलेज में प्रवेश किया। आर्थिक तंगी के कारण, उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया क्योंकि खेतीबाड़ी बहुत जरूरी थी जिसके बिना घर की तरफ देखा तक नही जा सकता था.... साथ ही आजीविका में रुपये के लिए क्लर्क की नौकरी कर ली। फिर उन्होंने सेना में भर्ती होकर इराक और ईरान का रुख किया। वहाँ उन्होंने एक ईसाई मिशनरी रेवरेंड मिस्टर स्टैंड से मुलाकात की और उनकी सलाह पर आगे पढाई जारी रखी।

         उन्हें इंजीनियरिंग में उच्च अध्ययन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय में दाखिला दिलाया। उन्होंने 1922 में इंजीनियरिंग में अपनी बीएससी की डिग्री प्राप्त की। जब वह लौटा, तो उसे रेलवे में नौकरी मिल गई।

       1932 में इस नौकरी से मुक्त होकर, उन्होंने नौशेरा की जगह पर जमीन ली और खेती, वैज्ञानिक ढंग से और स्थानीयता के भरपूर गहरे अनुभवों और  वैज्ञानिक तरीके की सांझ से खेती शुरू की। 

      एक आदर्श समाज बनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए सितंबर 1933 में एक मासिक पत्रिका प्रितलारी का प्रकाशन शुरू किया। प्रितलारी पंजाबी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक मील का पत्थर था। यह मासिक पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ साथ ही पंजाबी अदब में वैज्ञानिक, या कहें आधुनिक बदलाव बिंदु भी स्थापित किए, प्रयोगों को जमीन जो वैचारिक हो को यहां मुहैया करवाया।
  बाबा बूझासिंंह

   उठापटक अलगावों भरे तीसरे दशक में वे मॉडल टाउन लाहौर चले गए। कुछ साल बाद, 1938 में, उन्होंने 15 एकड़ की जमीन बराबरी से लाहौर और अमृतसर के बीच प्रीत नगर की स्थापना की। 1947 में देश के विभाजन के दौरान,  प्रीत नगर निर्जन हो गया था और वे दिल्ली चले गए लेकिन वहाँ उन्हें यह पसंद नहीं आया। वह 1950 में प्रीत नगर लौट आए और उनका पुनर्वास किया और उनकी मृत्यु तक वहीं रहे। 


                      (२)

जसवंत कंवल और अजमेर सिधु

भारतीय भाषाओं का बाबा बोहड़-

 'जसवंत कंवल और 'लहू दी लो'
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   गुरबख्श सिंह, गुरदयाल सिंह, मोहनसिंह, दिलीप कोर टिवाणा, करतार सिंह दुग्गल और शिव बटालवी जैसे नाम जिन्हें हम राजस्थान पट्टी वाले कालजयी और युग के अलंकार से अलंकृत करते हैं। बहुत से अनजान रह जाने वाले महान लेखकों को हम भूल चुके हैं जिन्हें हम फिर से स्थापित करके पढ़ और जान सकते है। 
      जसवंत कँवल जनता के रचना कार थे और इंकलाबी लहर से भी जुड़े हुए थे। उनका एक एक आखर जन की बात और पीड़ाओं की अभिव्यक्ति बनकर आता है।  भूषण ध्यानपुरी ने अपने एक लेख में लिखा था कि उसकी कहानियों में नायिकाएं लोकगीत की पंक्तियों के साथ आती है। ये ही उनके सरोकारों का सर्वोच्च स्थान है।

- "मैं और पंजाब के मेरे एक मित्र अमन प्रीत सिंह उस समय  उनसे मिलने जाने वाले थे कि कुछ ही समय पहले उनका देहांत हो गय थाा.... 

पंजाब में उठी नक्सल लहर के पॉलिटिकल एक्टिविस्ट और पंजाबी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार जिन्हें  "बाबा बोहड़" के नाम से जाने जाने वाले जसवंत सिंह कंवल का 101 की आयु में निधन हो गया । वह मोगा के गांव ढुढीके के रहने वाले थे । जसवंत सिंह कंवल ने कई प्रसिद्ध नवल लिखे जिनमें से उनके " लहू दी लो " रात बाकी है " "पूर्णमासी" "साडे दोस्त साडे दुश्मन" प्रसिद्ध थे।

    गौरतलब है कि 'जसवंत कंवल' का जब पंजाब में नक्सल लहर की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास 'लहू दी लो' (मेरा प्रिय उपन्यास है।) छपने के साथ ही प्रसिद्ध, चर्चित और विवादास्पद हो गया था। तत्कालीन भारत सरकार ने उपन्यास को प्रतिबंधित कर दिया था। फिर भी यह वाया सिंगापुर ( उस दौर में जब पांच रुपये कीमत भी बहुत ज्यादा मानी जाती थी।).. पंजाब और अन्य इलाकों में उस समय के 700/-- rs. में ब्लैक में बिकती थी। पंजाब में उस समय बच्चा- बच्चा इस उपन्यास को पढ़ने को लालायित था। यह मेरा सबसे पसंदीदा उपन्यास है।
        कोई अगर पूछे कि तुम्हारा पसंदीदा उपन्यास कौनसा है तो शायद नही बता पाऊंगा, पाठक कोई नही बता सकेगा, वो उनकी श्रंखला बताएगा , अगर बहुत ज्यादा भावनात्मक आंतरिक दबाव से बताऊं तो वो एक उपन्यास, जिसका सिरलेख 'लहू दी लौ’ है और जो पंजाबी में ही नही बल्कि अंग्रेजी में भी सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद भी खूब पढ़ा गया।

 जसवंत कंवल पंजाबी के टॉलस्टॉय के नाम से प्रसिद्ध थे। जसवंत सिंह कंवल पंजाब में उठी नक्सलवाड़ी लहर से संबद्ध थे। यह बुजुर्ग जवान क्रांतिकारी लेखक अपने आप मे एक युग है। नक्सलबाड़ी में शामिल थे तो खालिस्तानी खाड़कु लहर से भी कुछेक मुद्दों को छोड़कर सहानुभूति रखते थे। नक्सलवादी आंदोलन का खुला समर्थन करने वाले कँवल ने उपन्यास 'लहू की लो' पँजाबी में इस संघर्ष के दस्तावेजों की तरह लिखा।  पंजाबी के इस बाबा बोहड़ का जन्म सब 1919 को फिरोजपुर (वर्तमान मोगा )  के गांव ढुड्‌डीके में हुआ था। 

       सन 1967 ई में पंजाब में नक्सलबाड़ी लहर ने दस्तक दी थी। उस लहर ने कई गहरे प्रभाव पंजाब के जनजीवन पर छोड़े जो भूले नही जाते और जख्म कायम हैं। जसवंत सिंह कंवल का लिखा उपन्यास ‘लहू दी लौ’ भी इनमें से एक है। इसके अनगिनत संस्करणों की पाँच लाख से ज्यादा प्रतियां पढ़ी गई। 1970 के बाद जसवंत सिंह कंवल ने इसे लिखा था। जब इसकी पांडुलिपि प्रकाशन के लिए तैयार हुई तो पंजाब में इसे किसी ने नहीं छापा। फिर आपातकाल लागू हो गया था तो संभव ही नही रहा।  

     आखिरकार उन्होंने ‘लहू दी लौ’ सिंगापुर से छपवाया और गुप्त रूप से उसे पंजाब लाया गया। प्रतिबंधित हिट हुए भी उस समय मे ये ब्लैक में 700 रूप में बिकने वाला यह संसार का एकमात्र  ही उपन्यास है। पंजाब में तो बहुत बाद में यह आपातकाल हटने के बाद प्रकाशित हुआ, तब भी लोगों ने इसे खूब खरीदा और पढ़ा। लहू दी लो इंकलाबी पराक्रम और दुखांत और पंजाब के किसानों के संघर्ष, उनकी मुश्किलों और उस दौर में नक्सलवाद की बहस तलब प्रासंगिकता का गान था। इन्हें भाषाओ और देशों की सीमाओं में बांधना बहुत घिनोना अपराध है।
        कंवल के इस उपन्यास में वे तमाम क्रांतिकारी और क्रांतिकारी घटनाएं है जो उस समय इंकलाबी लहर में घटी थी। वे भले बंगा के सिख नेशनल कॉलेज के चे- ग्वेरा नाम से प्रसिद्ध दर्शन खटकड़ हो या बाबा बुझासिंह या पंजाब का एक महान कम्युनिष्ट अदम्य साहसी यौद्धा दर्शन दुसांझ या अमर सिंह अचरवाल, सब के सब मौजूद थे।.....

     साठ के दशक के अंतिम बरसों में (सन 1967 ई.) में पश्चिम  बंगाल के सिलीगुड़ी ताल्लुक के छोटे से गांव नक्सलबाड़ी में जो एक स्थानीय और छोटा सा किसान आक्रोश शुरू हुआ, वो किसान साथी बीयुल की हत्या के बाद और ज्यादा आक्रोश के साथ उठा। खेतिहर मज़दूरों ने जमीदार और कुलुक किसानों को अपनी ताकत इस कदर दिखा दी कि जमीदारों के कहने से पुलिस ने बर्बर दमन किया और बस फिर उठ खड़ा हुआ लावा सा प्रचंड खेतिहर और भूमिहीन  किसान महाउभार और आजादी के इस जाबांजो की आवाज़ कब विकराल रूप धर कर छात्र-  मजदूर के इंकलाबी मुहीम में बदल गई.....जो बंगाल से सीधी आंध्रप्रदेश और वहां से पंजाब में पहुंची जहां असंख्य मुक्तिकामी युवा इसमे शामिल हुए और मिशन ले लेकर कार्यवाहियां की.... पंजाब में कानु सान्याल की क्रांतिकारी जन दिशा की मास लाइन को काफी हुंकारा मिला ( जिसको नागरेडी ग्रुप भी कहा जाता है।) लेकिन बहुत सी अन्य बातों और कारणों के चलते इसका आगामी किसी अंश में विस्तार से वर्णन करेंगे। चारु की लालगंज थाना में हिरासत के दौरान मौत के बाद नागरेडी, सत्यनारायण सिंह सान्याल आदि के अलग अलग ग्रुप्स उभर कर आए। यह बहुत खतरनाक सफर था। इंकलाब के दीवानों के रक्त से पश्चिम बंगाल और फिर पंजाब की सड़कें लाल हो चुकी थी। इन्ही क्रांति के क्रांतिकारी बेटों में शामिल थे बाबा बूझा सिंह, दर्शन दुसांझ,  लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़, अमरसिंह अचरवाल, जयमल पढा आदि अनेक युवा कम्युनिष्ट क्रांतिकारी।


     युवा, जी वे तमाम युवा जो थे, उस समय-  इंकलाबी थे.. मनुष्य, कवि, अदबी सख्शियत और उस पर भी एक दूसरे के लिए बहुत भले, हिमायती और निष्पक्ष और बेहतरीन साथी। जब भी जेल में उन इंसाफ पसंद दीवानों से कोई मुलाकात को  आता तो उन सबको वहां तस्सली होती है कि वाकई इंकलाब की यह राह अब आम लोक भी देखने लगा है। गहरी रात जब आम कैदी सो रहे होते तो इंकलाबी इंकलाब के गीत गाया करते थे। 

  एक और महत्वपूर्ण बात है कि  उस समय के उन इंकलाबी  यौद्धाओं ने ना केवल राजसत्ता और लोकल बुर्जुआ धनपशुओं का सामना किया बल्कि आगामी दशक में पंजाब की खाड़कु लहर भी इनको निशाना बनाने की कोशिश करती रही थी,   खाड़कू समर्थक लोग और उनके वे चाहने वाले लोग आज भी किसी ना किसी तरह का दुष्प्रचार करते ही रहते हैं।

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अजमेर सिधु- वैचारिक नींव - (३)

  ● अजमेर सिद्धू ...  विचारों का पुल और जीवन का चितेरा                                    

    ( 25 मई के दिन बंगाल से उठी एक प्रचंड लाल इंकलाबी लहर जिसने ना केवल बंगाली बल्कि आंध्रा और पंजाब को भी रंग दिया इंकलाबी रंग में... और साहित्य को इंकलाबी कविताओं और गीतों का खजाना भी दिया था।)

      .....अजमेर सिद्धू ना होते तो मुमकिन नही था शायद यह खजाना सहेजना अगर मुमकिन था भी तो इस बेहतरीन तरीके से नहीं होता। अजमेर भाऊ मेहनतकश वर्ग के हिमायती रहे हैं। विचार और वर्ग सर्वहारा, के प्रति प्रतिबद्ध। ''गदर से लेकर नक्सली तक'' (शहीद बाबा बूझा सिंह जी की जीवनी), 'लालसिंह दिल, सन्तराम उदासी की जीवनी भी इन्होंने ही लिखी- ''क्रांति लई बळदा कण कण" नाम से उदासी पर गजब काम किया है। मूल रूप से कहानियां  लिखते हैं। अजमेर  के चार कहानी संग्रह छप चुके हैं।

पंजाबी साहित्य पर कम्युनिष्ट किसान उभार का बहुत गहरा और भरपूर प्रभाव पड़ा था जो आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाता है। इस इंकलाबी दौर और उसके बाद के लेखक कवि विस्फोट की तरह निकले थे। लेकिन उन तक या उनकी लिखतों तक पहुंच बनानी भी तो आसान नही थी। भले ही कोई कितना ही झूठ बोले या स्थापित करना चाहे लेकिन  आखिरकार यह स्वीकार करने में कोई मुश्किल नही होनी चाहिए कि अगर पंजाबी के युवा रचनाकार (सौभाग्य से मेरे दोस्त भी हैं।) अजमेर सिधु जी के ही प्रयासों, लग्न और मेहनत का नतीजा है कि आज हम पंजाबी की क्रांतिकारी विरासत के संतराम उदासी, बाबा बूझा सिंह और लाल सिंह दिल जैसे इंकलाबी कवियो से परिचित हैं। जसवंत कंवल ने 'लहू दी लो' उपन्यास लिखा जो इसी पृष्टभूमि पर था- प्रतिबंध लगाने के कारण वाया सिंगापुर, उस समय 600- 1000 रुपये तक के ब्लैक में बिका था, एक ही महीने में इसके सभी कॉपी बिक गई थी।

     25 मई 1967-69 और 1969 से 1970 ई. तक के तीन साल लगातार चलने वाला  महान किसान उभार और संघर्ष जो 1972 ई. में खत्म हुआ अति -आत्मविश्वासी नेतृत्व और स्थितियों को समझे बिना लिए गए निर्णयों के कारण और अन्य हुई गलतियों  के चलते वे युवा कतारें जो शहीद हुए या जो दमन और टॉर्चर के कारण हीन हो गए। या जो आए थे उभर कर कलाओं की राह से या भूमिगत जीवन से जो निकले थे। यह दुखांत था एक ऐसे क्रांतिकारी उभार का जो तेलंगाना से भी आगे जा सकता था। लीडरशिप की नही बल्कि मतभेदों और बीच मे आ घुसे गद्दारों के चलते
जब निर्णय ही गलत समझे जाने लगे और भेदियों के चलते असंख्य युवाओ की शहादत और जुल्म जबर और मौत के बाद तीन साल में ही राजसत्ता के दमन से यह बिल्कुल खत्म हो गया।

        पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी नक्सल लहर में पंजाब के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। मास्टर हरपाल से लेकर जसवंत कंवल और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे, वे भी शामिल हुए थे। बलदेव सिंह मान, सतनाम, अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़ और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।। उनमें से कई तो कालजई कविताओं के रचयिता  भी थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे सब जो उस समय या उसके बाद खालिस्तानी अतिवाद के शिकार हुए वे अद्भुत सर्जक निकले। सन्तराम उदासी, पाश, खटकड़ और लालसिंह दिल जैसे अनेक बेहतरीन क्रांतिकारी कवि थे। राज सत्ता और धार्मिक अतिवादी, लोकल बुर्जुआ किसी भी नक्सल को बख्शना नहीं चाहते थे।      

        भयानक गरीबी, आर्थिक सामाजिक असमानता, अन्याय, शोषण कुपोषण और राज सत्ता के बर्बर दमन और अनदेखी के विरुद्ध उठे प्रचण्ड आक्रोश की लहरों के साथ इंकलाबी लाल परचम उठाए युवा क्रांतिकारियों को उस समय ताजा उठे नक्सलबाड़ी  किसान उभार से आस बंधी और वे सभी युवा जो जीवित थे, क्रांति की महिमा से वाकिफ़ थे, इस लहर में शामिल हुए। यह अलग मुद्दा है कि कुछ तानाशाही और मूर्ख नेतृत्व के कारण एक महान उभार कुछ ही समय मे दमन का शिकार होकर खत्म हो गया।
    
यह लहर पश्चिम बंगाल के बाद आंध्रप्रदेश और फिर पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी  थी। इसमें पंजाब सहित देश के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे।  इस क्रांतिकारी लहर ने जब तक दुःसाहस की लाइन नहीं पकड़ी तब तक यह एक खालिस मानव मुक्ति का युद्ध थी जिसमे अनेक कवि, लेखक, कलाकार, रंगकर्मी आदि खुलकर शरीक हुए और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति भी इसमें शामिल थे। हाकिम के अन्याय और अत्याचार से व्यथित होकर वे भी शामिल हुए थे।  अनेक कवियो की कविता का जन्म भी इसी समर में हुआ। हरभजन सोही, अमर सिंह अचरवाल और दर्शन खटकड़ जैसे और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।

      लाल सिंह दिल जो बेहतरीन क्रांतिकारी के साथ कवि भी थे जिनका घर किसी खंडहर की तरह हो गया था। इस महान क्रांतिकारी कवि को पंजाबी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में हाशिए पर डाल रखा है। इनके अब तक के संग्रह जो मैंने मूल पंजाबी में पढ़े हैं, वे निम्न है,   'सतलज की हवा', 'बहुत सारे सूरज', 'सत्थर', और आत्मकथा 'दास्तान' (दास्तान मैंने नहीं पढ़ी अभी), हालांकि वे चर्चित थे मगर उस तरह से नहीं जिस तरह से उन्हें होना चाहिए था। जबकी पाश की प्रसिद्धि उनकी शहादत के कारण भी हुई थी। यह बाद का मुद्दा है कि किसी ने सार सुध नहीं ली। महान लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत से दोलित होकर ट्राटस्की की तरफ मुड़ जाना या उनके विरोधियों द्वारा यह कुत्सा प्रचार भी एक मुख्य कारण था।         सन 1967-69 और 1970-71 के साल गदर मचाने वाली नक्सल लहर के बहुत ज्यादा सक्रियता और उभार के साल थे। देश के हर एक संकट की मार आम आदमी पर पड़ रही थी । सन 1967 ई में पश्चिम बंगाल से शुरू होने वाली कम्युनिष्ट लहर जो एक महान कम्युनिष्ट क्रांति में बदलने लग गई थी की देन है पंजाबी साहित्य में आमूल चूल बदलाव और जीवन और उसकी गरिमा को स्थापित करने वाली इंकलाबी कविता का उत्स जो किसी उजास की तरह से हुआ था। जबकि इससे पहले जो प्रेम और व्यक्तिगत संघर्षों के महिमा मंडन, प्यार के बीमार पक्ष मतलब निराशा, जुदाई आदि का हावी होना बहुत अश्लील था। यह अमृता प्रीतम और शिव कुमार बटालवी का दौर था।  शिव कुमार बटालवी के गीतों में प्यार के संक्रामक पक्ष, उसकी "बिरह की पीड़ा’ इस कदर सघन थी कि उस दौर में पंजाबी ही नही बल्कि भारतीय भाषाओं में कई बड़ी कवयित्री  अमृता प्रीतम ने उन्हें ‘बिरह का सुल्तान’ नाम दे दिया था। शिव कुमार बटालवी पंजाबी का वह शायर जिसके गीत भाषाओ के बंधनों को तोड़कर आजाद हो चुके थे। पंजाब ही नही बल्कि उसकी ख्याति हर कहीं फैली थी। उसने जो गीत अपनी गुम हुई महबूबा के लिए किसी छुपे प्रेमी की तरह की इबारत की तरह लिखा था वो जब स्टेज पर होते तो अनेक फरमाइशें आती थी इस एक गीत की। 

 साहित्य पर कम्युनिष्ट किसान उभार का बहुत गहरा और भरपूर प्रभाव पड़ा था जो आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाता है। इस इंकलाबी दौर और उसके बाद के लेखक कवि विस्फोट की तरह निकले थे। लेकिन उन तक या उनकी लिखतों तक पहुंच बनानी भी तो आसान नही थी। भले ही कोई कितना ही झूठ बोले या स्थापित करना चाहे लेकिन  आखिरकार यह स्वीकार करने में कोई मुश्किल नही होनी चाहिए कि अगर पंजाबी के युवा रचनाकार (सौभाग्य से मेरे दोस्त भी हैं।) अजमेर सिधु जी के ही प्रयासों, लग्न और मेहनत का नतीजा है कि आज हम पंजाबी की क्रांतिकारी विरासत के संतराम उदासी, बाबा बूझा सिंह और लाल सिंह दिल जैसे इंकलाबी कवियो से परिचित हैं।


     25 मई 1967-69 और 1969 से 1970 ई. तक के तीन साल लगातार चलने वाला  महान किसान उभार और संघर्ष जो 1972 ई. में खत्म हुआ अति -आत्मविश्वासी नेतृत्व और स्थितियों को समझे बिना लिए गए निर्णयों   के कारण और अन्य हुई गलतियों  के चलते वे युवा कतारें जो शहीद हुए या जो दमन और टॉर्चर के कारण हीन हो गए। या जो आए थे उभर कर कलाओं की राह से या भूमिगत जीवन से जो निकले थे। यह दुखांत था एक ऐसे क्रांतिकारी उभार का जो तेलंगाना से भी आगे जा सकता था।  चलते असंख्य युवाओ की शहादत और तसदत्त और मौत के बाद तीन साल में ही राजसत्ता के दमन से यह बिल्कुल खत्म हो 

    पाश और जयमल पढा, संतराम उदासी और दिल भारतीय समाज के थल्लड़े वर्ग के शोषण के विरुद्ध राजसत्ता के प्रतिरोधी तूफान की तरह खड़े हुए तो बाद में उनके संघर्षों के कवि भी थे। 

एक अद्भुत कहानीकार जो पंजाबी का शोलोखोव (अक्सर मैं कहता हूँ भाई साहब को) है, अपनी अद्भुत कहानियों के बावजूद इस महान काम के लिए प्रसिद्ध हर हैं। हिंदी जमात या कहें भारतीय भाषाओं के पाठक अगर इन महान वीरों के अवदान बाबत जो थोड़ा बहुत  जानते हैं - वो सब अजमेर भाई के मार्फ़त या कहें उनकी लिखतों के मार्फ़त सुरक्षित हुआ है हमारा स्वर्णिम अतीत। सुरक्षित से मतलब है कि सत्तापक्ष और फासिस्ट धड़े जिस तरह इन महान बलिदानियों को बुरा या दुष्ट साबित करने में अपना ज़मीर तक मार गया, उनकी हर एक कुकर्मी चाल को असफल किया जाता है तो बस इसी एक मज़बूत आधार के कारण।

राजनीति, साहित्य कला और संस्कृति से जुड़े हर एक पीढ़ी की गर्व होना चाहिए कि हमारे पास महान जीवित मनुष्यों की एक बहुत उच्चादर्शों की परंपरा है।

 ● सतीश छिम्पा

अमर शहीद जयमल पढा



       अमर  शहीद कॉमरेड जयमल सिंह पढा  

                              ( ●सतीश छिम्पा)

 

  'गीत मेरे नूं ओहिओ जाणे, जेहड़ा जग दे दर्द पछाणे..'
         

  इंकलाबी कवि होना- सिर्फ कवि होने जितना आम नही है बल्कि अपने आप मे मुक्ति के एक महान विचार जो अपनी उज्ज्वल स्वाभाविक तासीर के साथ बहुत सुंदरता के साथ लोक में, या कहें जन में-  जनता के प्रतिबद्ध प्रतिरोधी  कवि की जाग्रत चेतना के साथ व्यवहारिक गति के बाद मौलिक, जीवंतता के साथ सदियों सोई रही मेहनतकश आवाम को जगाने का काम करना ही प्राथमिकता है जो जन चेतना को बहुत गहरा, सघन और स्थाई आधार दे कर मुक्ति के स्वर को विजय पताका के साथ आह्वान का नाद करते हुए सत्ता का विध्वंस करने को ललकारता है मज़दूरों और क्रांतिकारियों को ।  मनुज ना केवल जन जीवन के गीतकार थे, बल्कि रेडिकल महान  उभार और हथियारबंद क्रांति के भी पक्षधर थे।  उनका मानना बिल्कुल सही था कि इस दिमागी सामंती लूट और घटिया फ़ितरतों और शोषण और अन्याय और गैरबराबरी को नवजात भारतीय पूंजीवाद खत्म नही करेगा बल्कि हित साधेगा, मनुज की शंकाएं सच भी हो गई थी।

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      पंजाब की धरती शहीदों और शहीद कवियों की धरती है। जहां बाबा बूझा सिंह, प्रिथीपाल सिंह रंधावा, पाश, अमर सिंह अचरवाल और जयमल पढा आदि के साथ ही साथ अनेक ऐसे कम्युनिस्ट्स जो नक्सल दौर और उसके बाद खलिस्तान उग्रवाद के समय चुन चुन कर निहथे कॉमरेड्स को मारा गया था। जयमल सिंह पढा को खालिस्तानी दहशतगर्दो  के 1988 में कत्ल इसलिए कर दिया था क्योंकि वे वहां के आम जन के बीच बहुत ही सकारात्मक रूप से जाना जाने वाला  सबसे प्रिय और चहेते क्रान्तिकारी थे। वे जैसी कविताएं लिखते थे, वैसा जीते भी थे। जीवन और कलम में कोई फर्क नहीं था।

 "पुत्त पा के शहीदी तेरा अम्मिए नीं अमर हो गया
 ओस दा वेख के पहाड़ जिदड्डा जेरा, नीं वेरी वी हैरान हो गया।"

- "हुआ की जो जालिमो ने दित्ता एक पुत्त मार नीं
 लक्खा होर पुत्त ने तेरे, वेख किवें जुझार नीं।"

  जयमल पढा उन चंद क्रांतिकारी कवियों  में से है, जो शहीद हुए और बहुत कम जी पाए मगर जितना कम लिखा, उतना ही बेहतरीन, सँघर्षो को शब्द देना अद्भुत था। पहले नक्सल मूवमेंट में पुलिसिया और सामंती जुल्म और दमन और फिर खालिस्तानी उग्रवादियों से मुठभेड़, ये थे असल यौद्धा। जिन्होंने पंजाब, हरयाणा में ही नहीं बल्कि  सम्पूर्ण भारत में क्रान्ति और प्रतिरोध की अलख जगाई। इनके पास कविता वैसे नहीं आई जैसे  प्रोफेसर, अधिकारी या अशोक वाजपेयी या सुरजीत पातर के पास आई।   

        अमर शहीद जयमल पढा की शहादत पंजाब में कट्टरपंथी अलगाववादियों की बलदेव मान की शहादत के बाद एक और सबसे बड़ी गलती साबित हुई.... इधर पंजाब से जो जो बहुत बुरे हालातो के फिर से उठ खड़ने के समाचार आ रहे हैं, उससे जाहिर है कि पंजाब के फासिस्ट्स किसी बहुत घिनोने काम को अंजाम देने वाले है। दो समुदायों के कट्टर धड़े और दोनों ही बर्बर- इसलिए  पंजाब की धरती के महान शहीदों पर लिखे जा रहे लिखतों का एक- एक संक्षिप्त अंश यहाँ देना जरूरी हो जाता है जो यह साबित कर सके कि धर्म नहीं, तुम्हारे या कहें लोगों (लोक) के आशिकों ने इंकलाब के लिए जान वारी थी- पेट, भूख, असमानता, अन्याय और जुल्म (राजसत्ता के साथ ही खाड़कू लहर के आतंक से भी वे जूझे) से लडते हुए जो शहीद हुए- वो शहादत की राह ही है जो तुम्हारी ही नही बल्कि देश की पीढ़ियों तक को सरचानण कर गई है।

        जैमल पढा एक प्रतिबद्ध, समर्पित और ईमानदार कम्युनिष्ट क्रांतिकारी थे जो हर एक मोर्चे पर लग्न और हौसले से अथक और निर्बाध रूप से तूफान की तरह उठता और जुटता रहा, जमीन पर जमीनी संघर्ष जो किसी धार्मिक आतंकियों की तरह फिरौती नही लेते थे बल्कि उन सब आतंकी बर्बर चेहरे को सरेआम कर देते थे। बलदेव सिंह मान और दर्शन दुसाँझ की तरह ही वो भी एक उज्ज्वल नाम , एक नाम जो क्रांति के लिए क्रांति में न्योछावर होता हुआ जीवन के गरिमामय गीत गाता हुआ इस महान बदलाव, मुक्ति के महा समर में, इंकलाब के लिए इस इंकलाबी मुहिम में जुटे हुए थे।

    वर्ष 1967-69 और 1970-71- 73 (1974 का थोड़ा हिस्सा) इस इंकलाबी लहर का सबसे महान और स्वर्णिम दौर था जब अन्याय और जुल्म करते वर्ग शत्रुओं के बीच भयानक रूप से भय पैठ गया था - उस दौर में जब जब भी और जिस पर भी सेठ, साहूकार, बुर्जुआ किसान, अफसर, व्यापारी और सामंती कुलुक किसान मानवद्रोही और राज- सत्ता जुल्म ढाती, अन्याय या जबरदस्ती करती- तब ये लाल लहर के महान बोल्शेविकों के वंशज उनके उत्तराधिकारी.….. लाल यौद्धा उस अन्याय का मुंहतोड़ जवाब दिया करते थे।

  जयमल बहुत अच्छे प्रतिरोधक कवि थे जो जब 1967- 72 तक के ये साल इस महान मुक्ति युद्ध के तड़थल्ली  मचा देने वाले गरिमा भरे  सबसे सक्रिय वर्ष थे। पढा की कविताएं मुखरित होने लगी थी।

         देश के हर हिस्से में संकट आम कामकाजी लोगों के जीवन को दयनीय बना रहा था। देश भर में नक्सली आंदोलन के सरकार के अंधाधुंध अन्याय, दमन और हत्याओं और नक्सली नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नकेल कसने की इसकी नीति के खिलाफ  विरोध प्रदर्शन लोगों के मन में नफरत भर रहा था। उसी समय, नक्सली आंदोलन का एक वर्ग जन संगठनों का निर्माण करने और जन संगठनों में क्रांतिचेता विचारो के लिए सक्रिय भी था। आक्रोश के लिए महान वाहक बनने की ओर बढ़ रहा था। सन 1971 ई. में पश्चिमी मोर्चा पाकिस्तान के साथ युद्ध के चलते दहक रहा था।  इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पाकिस्तान के साथ युद्ध जीत लिया था और अंध राष्ट्रवाद के बवंडर को अपने पक्ष में रखा था, जल्द ही अंध उत्साह का बुलबुला फूटने लगा।। 

     छात्र युवाओ ने सिर पर कफ़न बांधकर ही घर से निकलने लगे थे। नहीं तो भला कौन सा भलामानस आग में कूदता है। परंतु जवानी को तो इंकलाबी, जुझारू, योद्धा, नक्सलबाड़ी बनने का पागलपन हो गया था । उन्होंने न तो नहरों के किनारों पर पुलिस की गोलियां की परवाह की और न ही वो उत्पीड़न  सेंटर के समक्ष डोले ( घबराए)। हुकूमत उन्हें शहीद करती, और नौजवान बसंती गीत गाने के लिए  आगे आ जाते। 1967-69 का पहला दौर था। खाते-पीतों (धनाडों) की हजारों एकड़ जमीन पर मजदूरों किसानों के कबज़े करवाने और विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा के लिए सड़कों पर लाना महान मुक्ति समर की जीत थी। जब पंजाब के गांव- गांव और घर- घर से जमीनों पर लाल झंडे गाढ़ने के लिए इंकलाब की आस में मरजीवड़े उठने लगे और मुक्ति गीत महकने लगे और विद्यार्थियों ने हुकूमत को कंपकपी ला दी तब फिर पुलिस का अत्याचार शुरू हुआ ।
     
         क्रांतिकारीयों ने बदले के रूप में वर्गीय दुश्मन के सफाए की लाइन अपना ली। यह सिर लेने और देने का समय था। राजशाही की तरफ से बेहतरीन नौजवान मारे गए और लापता कर दिए गए और बाकियों  को तिल तिल कर मरने के बाद जेलों में बंद कर दिया गया । यह नक्सलबाड़ी लहर का हथियारबंद वाला दौर था। इस जुझारू विद्रोही लहर के लिए जंगबाजों का कत्ल और  जेलों के नर्क ने एक बार गैप पैदा कर दिया । हुकूमत उनकी कमर तोड़ने में कामयाब हो गई ।

  
     उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानों का संघर्ष छिड़ गया और 1972 में पंजाब के किसानों ने जमींदारा यूनियन के नाम पर अपनी मांगों को लेकर लड़ाई शुरू कर दी। मोगा में छात्र लहू का प्रचण्ड आक्रोश, दावानल सा उबलता गुस्सा जो एक विशाल और हिंसक, महान और ऐतिहासिक संघर्ष में बदल गया था। 1967-69 और 1970-71 नक्सली आंदोलन के सबसे सक्रिय वर्ष थे। देश के हर हिस्से में संकट आम कामकाजी लोगों के जीवन को दयनीय बना रहा था। 

      देश भर में नक्सली आंदोलन के सरकार के अंधे दमन और नक्सली नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नकेल कसने की इसकी नीति के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन लोगों के मन में नफरत भर रहा था। उसी समय, नक्सली आंदोलन का एक वर्ग सार्वजनिक संगठनों का निर्माण करने और सार्वजनिक आक्रोश के लिए वाहन बनने की ओर बढ़ रहा था। गाँव के बदमाशों, जमाखोरों, ब्लैकमेलरों, मुखबिरों और ठगों की नींद से वंचित दिख रहा है। यह ऐसा था जैसे कोई समुद्र मंथन कर रहा हो और देवता सभी राक्षसों को चुनौती दे रहे हों। नाटककार गुरशरण सिंह के नाटक अपना असर करने लगे थे। 
    
   
       उत्तर भारत मे जहां लोक भाषाओं की कविताओं पर तेलंगाना सशस्त्र किसान उभार का प्रभाव नगण्य रहा वहीं नक्सलबाड़ी इंकलाबी उभार ने इतना गहन प्रभाव डाला था कि पंजाबी में संतराम उदासी, लाल सिंह दिल, अवतार पाश, दर्शन खटकड़, जयमल पढा आदि अनेक कवि नक्सल महान उभार के प्रतीक बनकर आए थे। वर्ष 1967-69 और 1970-71- 73 (1974 का थोड़ा हिस्सा) इस इंकलाबी लहर का सबसे महान और स्वर्णिम दौर था जब अन्याय और जुल्म करते वर्ग शत्रुओं के बीच भयानक रूप से भय पैठ गया था - उस दौर में जब जब भी और जिस पर भी सेठ, साहूकार, बुर्जुआ किसान, अफसर, व्यापारी और सामंती कुलुक किसान मानवद्रोही और राज- सत्ता जुल्म ढाती, अन्याय या जबरदस्ती करती- तब ये लाल लहर के महान बोल्शेविकों के वंशज उनके उत्तराधिकारी.….. लाल यौद्धा उस अन्याय का मुंहतोड़ जवाब दिया करते थे। 

   तेलंगाना का प्रभाव मराठी और तेलगु पर ज्यादा रहा- उत्तर भारतीय भाषाओं की बात की जाए तो मनुज देपावत के रचाव में यह  प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। राजस्थानी समाज जो अपने रियासतकालीन सड़ चुके सामंतवादी संक्रामक रोग को आज भी ढो रहा है जिसके चलते यहां कविता सिर्फ कविता है, इंकलाबी कविता नही- जबकि यहां का इंकलाब विस्फोट की तरह हुआ था।
       मैंने अपने पहले के लेख में पंजाबी और राजस्थानी इंकलाबी कविताओं के मूल्यांकन के समय लिखा था कि --" लोक' के कवि कोई तटस्थ कवि नहीं थे बल्कि रेडिकल क्रांतिकारी चेतना से लैस कवि थे। उनका मानना था कि क्रांतिकारी साहित्य जनांदोलनों और जनसंघर्षों की उपज होता है।  प्रगतिवादी आंदोलन के बाद दूसरी बार किसान-मजदूर व निम्न वर्ग उनकी कविता में अपनी आशा-निराशा, कुंठा-पराजय, आकांक्षा-सपने और संघर्ष के बहुतेरे रंगों को ले कर प्रकट हुए। यहाँ कुछ अतियाँ भी हुई। जैसे, संघर्ष के लॉजिकल चित्रण का मुख्य स्वर सशस्त्र क्रांति का रहा मगर भटकावों का भी आना जाना लगातार था।  जब पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी ताल्लुक के एक गांव नक्सलबाड़ी से भारतीय शोषक राज सत्ता के विरुद्ध विद्रोह, क्रांति की शुरुआत हुई जिसने हर संवेदनशील युवा को प्रभावित किया था। इसी प्रभाव क्षेत्र में आए पंजाबी के महान क्रांतिकारी कवि गीतकार संतराम उदासी। उस दौर में जब पाश जैसा खतरनाक कवि भी मंच पर पसीने से नहा जाता था क्योंकि सारी की सारी भीड़ चिल्ला उठती थी 'संतराम उदासी' जिंदाबाद के नारों से। संतराम जी नक्सल क्रांन्तिकारी थे, उनकी मीटिंग्स और अभियानों के हिस्सा थे। जिसकी वजह से पंजाब पुलिस ने उनको इतना ज्यादा टॉर्चर किया था कि उनकी दोनों आंखे हमेशा के लिए खराब हो गई थी। उनके सर के बालों के ताण लटकाया जाता था। इस जोर जबर और जुल्म के कारण ही उदासी के गीतों में विद्रोह घुला था। पाश, उदासी और लाल सिंह दिल की यह तिकड़ी जबरदस्त थी। वे मजहबी सिख थे, दलित मगर अम्बेडरवादी नहीं थे, मार्क्सवादी थे। मैं खुश नसीब मानता हूँ खुद को कि पाश को पढ़ने की ललक के कारण जो पंजाबी भाषा पढ़नी लिखनी सीखी उसके कारण संतराम उदासी को समग्र रूप में मूल पंजाबी भाषा मे ही पढ़ा- और बाद में जब मनुज को पढा और मनन किया तो सुखद आश्चर्य तो खैर था ही लेकिन झटका भी लगा कि हमारे अग्रजों ने कभी क्यों नही किया तुलनात्मक मूल्यांकन, हम कितनी महान परम्परा से विमुख रहे हैं।   खैर अब इस दायित्व को निभाना जरूरी हो गया है।

              
       नक्सल उभार के क्रांतिकारियों को जालिम राज सत्ता की क्रूर मार और व्यवस्थागत सामाजिक और लौकिक पुरातन रोगों जातीयता, धर्म, सामंती सोच और अन्य तमाम पीड़ाओं को सहते हुए वे मेहनतकशों के सम्मान, जीवन, श्रम और संघर्षों की गरिमा जो इस व्यवस्था के हाशिए पर पड़ी ज़िंदगी की तरह के अनेक  दुखों, पीड़ाओं, हताशाओं और संघर्ष के उज्ज्वल गीत, गरिमामय भाव, ओजपूर्ण विद्रोह, और माटी, खेत के सबसे कोमल और वात्सल्य पूर्ण अद्वितीय भावनाओं और कल्पनाओ की जगह हकीकत का जीवंत चित्र और संघर्षो से तपकर निकले समय के साक्षी लोक के लोगों के  उग्र आक्रोशित मनोभावों और टूटती जा रही आस, हार, हीनताबोध और न जाने कैसे- कैसे महताऊ भावों को साथ रखते हुए हर एक की तरफ बहुत सघन और गहरा हस्तक्षेप करते वे एक प्रचंड क्रांतिकारी कवि रूप में स्थापित हो जाते है- मगर राजस्थान के मध्य मार्गी धड़ों ने साजिशाना तौर इन्हें हाशिए पर रखते हुए मार्क्सवादी अप्रोच को मुख्यधारा से दूर ही रखा, को अब हम सब साथी क्रांति के इस महान गीतकार को ले आने के प्रयास में हैं।

       भूख, लाचारी, मजबूरी, बीमारी और हाशिए पर पड़े तड़फ रहे जनजीवन, झुग्गियों में मर खप रहा मेहनतकशों और बाजारू दुनिया मे मर रहे संबंधों और अत्याधुनिक समय की बुर्जुआ फ़ितरतों पर बड़ा निर्मम वार करते हैं ।  एक और जहाँ आर्थिक वर्ग विभाजक रेखा या खाई का आकार बढ़ते हुए जीवन को लील रहा है- वहीं मानवद्रोही और जीवन को अपमानित करते रहने वाली मौजूदा राजसत्ता जब लोक को हाशिए पर पटक, अभिजात्य वर्ग के  कलावादी मानवद्रोही और जीवन से कटे बुद्धिजीवियों को लगातार आगे ही आगे बढ़ाती जा रही है- यह औचक नही कि श्रम, जीवन, लोक, शब्द, भाव, कविता और प्रतिरोध के बजाए - मानवद्रोही बौद्धिकों को समकालीन फासिस्ट बर्बर सत्ता के तमाम लाभ मिलना और एम.एन. रॉय से लगाकर कॉंग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम में मुख्य अज्ञेय तक को महामानव रूप में प्रस्तुत किया जाना- मानसिक विकलांगता से ज्यादा कुछ नहीं। इनके यहां बौद्धिक विलासिता की  सीमा अंतहीन है जिसके कारण यहां से दार्शनिक, कवि, चिंतक, शिक्षाविद, रंगकर्मी या कह सकते हैं कलाओं और जीवन के तमाम स्वनामधन्य भरी पूरी पीढ़ी है। इन मानवद्रोहियों ने अनेक मार्क्सवादी कवियों और प्रतिरोधक बैरिकेड्स को छल से हाशिए पर टिका रखा था।

     सन 1988 ई में ही पाश की तरह ही इनका कत्ल हो गया था। वो एक आवाज खामोश हो गई जिसने देश को एक नया क्रान्तिकारी आयाम दिया। कविता और नज़्म को विद्रोह के नए स्वरों से साधा। पढा  के लेख और चिट्ठियां, जिनका सिर्फ  नाम मात्र ही बच्च सका है, न सिर्फ अपने वक़्त के बल्कि बाद के भी नुकसान दिख ही रहे थे। वे उनमे से थे जिन्होंने जुल्म को चुनौती दी। मगर आज पंजाबी के इस योद्धा कवि को खास पंजाब के ही युवा पूरा नहीं जानते।  गौर करो जवानों, यह नाम,जी, बिल्कुल यही एक नाम जो गरिमामय है,  उज्ज्वल नाम है जयमल पढा.... इसको सहेजना अब तुम्हे है।

           अक्टूबर क्रांति, विद्रोहों का दमन और क्रांति  को तत्कालीन वस्तुस्थिति के अनेक प्रमुख हानिकारक, धोखेबाज, कला के व्यापारी, राजनीतिक छल-कपट, लोकतंत्र की आड़ में सामंती जोर जबर और अधिकारों का हनन और हिंसा का विस्तार आदि का सामना करते हुए स्थाई मजबूती से स्थापित किया गया था। शोषक वर्गों के साथ जुड़े हुए कलावादी और मध्य मार्गी तबकों में बढ़ती हुई मूल्यहीनता आदि स्पष्ट रूप में उभर कर आते हैं.... जबकि   मनुज खुद अपने आप मे एक युग हैं। उनका हर एक गीत का एक महान उज्जवल पक्ष है कि वे जीवन से कटे हुए वर्ग, भाव, शब्द और भाषा का हर भाग का निर्मम आलोचनात्मक निस्तारण के पक्षधर रहे है। घनघोर सामंती समय मे भी  विज्ञान की सृजनात्मक विधियों से संचालित चेतन्य पक्ष को  स्थाई प्रतिरोधक बनाने के सकारात्मक प्रयास करना ही आने आप मे महानता है।

एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...