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Wednesday, 14 October 2020

क्या आप कैदी नंबर 307 को जानते हैं?

कथेतर गद्य :-

गोवा की यरवदा जेल में बंद कैदी नम्बर 307- सुधीर शर्मा, उन चुनिंदा लोगों में से है, जिन्होंने तमाम कुख्यातियों के बावजूद गुमनाम होते हुए भी बहुत सघन और गहरी चर्चाओं में जगह बनाई और राजेंद्र यादव, भीष्म साहनी और मनोज रूपड़ा जैसे रचनाकारों की जिसमे रुचि जगी, पत्रों का आना जाना शुरू हुआ और बौद्धिक जगत में एक नाम बनकर उभरा :- सुधीर शर्मा जिसने अपनी दमित, अतृप्त इच्छाओं को जेल की कालकोठरी में खतों के बहाने से जी भर के लिखा है...

सुधीर के पास अनेक खत आया करते। जो अब एक किताब की शक्ल में छप भी चुके हैं। 

कैदी नंबर 302 उर्फ सुधीर शर्मा के लिए बौद्धिक छटपटाहट, उकलाहट, बेचैनी और सहानुभूति किस शिद्दत से थी। किस चाहत के वश राजेन्द्र यादव से लेकर भीष्म साहनी तक के दिग्गजों ने सुधीर का साथ दिया। भावनात्मक संबल और- सहयोग दिया वो आपको स्थापित कथाकार मनोज रूपड़ा के इस खत (माफी के साथ कि इसको अभी पूरा नही दूंगा और ना ही यह रचना पूरी पोस्ट करूँगा- छपते समय पूरा होगा, अभी आंशिक ही।) से सहज पता लग जाता है।

"आपका पत्र बहुत लंबा और कसा हुआ था जिससे यह साबित होता है कि आप अच्छे से अपनी समझ को पकाने का प्रयास कर रहे हो मुझे यकीन है साहित्य और समझदार लोगों में आपको सम्मानजनक जगह मिलेगी। आपने जिस गहराई से मेरी कहानी को महसूस किया है और जितनी गंभीरता से उसे परखने की कोशिश की है उसके लिए शुक्रिया अपने दो-तीन बार पत्र में विशेष जोर देकर इस बात को दोहराया कि आप प्रबुद्ध पाठक नहीं है इसलिए कहानी के बारे में कोई पक्की और व्यवस्थित बात नहीं कह पाएंगे लेकिन मैं समझता हूं उसकी जरूरत भी नहीं है ....क्योंकि किसी भी रचना के बारे में कोई ठोस बौद्धिक निष्कर्ष निकालने की बजाए उस रचना के भीतर की संवेदना के साथ अपने आप को रच लेना एक पाठक के लिए ज्यादा जरूरी है।

एक 'रचाव' 'पाठक के भीतर भी होना चाहिए यह लेखक की भी सबसे बड़ी खूबी है कि उसकी रचना पाठक के भीतर क्या-क्या रच सकती है

लेकिन हां एक खतरे से मैं आपको अदा कर दु!

कभी भी किसी कहानी को इतनी बुरी तरह से गले मत लगाओ कि वह आपकी बाहों में दम तोड़ दे कई पाठक होते हैं जो किसी खास कहानी को ही बंदरिया के मरे बच्चे की तरह गले लगाए रहते हैं इससे पाठक की प्रगति भी बाधित होती है और लेखक अभी एक खास तरह के मैनरिज्म में बंध जाता है

आपका जीवन सचमुच विभिन्न और असभविक उबड़ खाबड़पन से गुजरा है और गुजर रहा है इस तरह के अनुभवों का अगर वाजिब इस्तेमाल किया जाए तो यथार्थ को तरासने के सबसे ज्यादा कारगर औजार बन सकते हैं आपने मैक्सिम और द साद के बारे में शायद न पढ़ा हो दोनों लेखकों ने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन जेल में बिताए थे और जिस ब्यानर के यथार्थ का उन्होंने पर्दाफाश किया उससे समुच्चय युग रूह कांप उठी थी वे क्रांतिकारी लेखक नहीं थे ना ही उनमे किसी सामाजिक संकट से टकराने की हिम्मत थी वे भयानक स्नायविक तनाव से ग्रस्त थे उन्हें सेक्स ड्रग्स और यौन अपराधों के अमर्यादित आवेग ने अपने घेरे में घसीट लिया मुझे लगता है कि आपके साथ ही शायद कुछ ऐसा ही हुआ था...."

कैदी सुधीर शर्मा के पत्रों के संकलन में  उसने जो सुशीला टाकभौरे को लिखे एक पत्र का अंश ... '‘खुशी व उत्तेजना से मैंने सीधे अपना बिस्तर पकड़ा और आपके पत्र को खोलकर पढ़ना शुरू किया। जैसे- जैसे पत्र पढ़ता गया, खुद में सिमटता चला गया। मैंने पत्र को बड़ी देर में खत्म किया, क्योंकि पत्र ने हर पंक्ति के साथ इतना उद्वेलित किया कि मैं उसी के भंवर में काफी देर तक डूबता-उतरता रहा. मेरी यह उथल-पुथल इतनी गहरी थी कि लाख रोकने के बाद भी वह चेहरे पर उतर आती. क्या आप यकीन करेंगी कि बीच में तीन जगह मैं इतना भाव विकल हो उठा कि मेरी आंखें नम हो उठीं. एक बार पढ़ने के बाद, मैंने फिर-फिर पत्र को पढ़ा. हर बार पढ़ते हुए मेरी गम्भीरता ऐसी हो गयी कि आसपास का वातावरण उससे प्रभावित हो गया. साथियों की हिम्मत ही न हो पा रही थी कि वे मुझसे इस गम्भीरता के बारे में कुछ पूछें. वे मेरी गम्भीरता से खुद ही गम्भीर हो गये और चोर नजरों से मुझे देखने लगे... फिर हिचकते, सकुचाते हुए बोले - शर्मा भाई, क्या बात है जो इतने उद्वेलित हो गये ?’ मैं हल्के से मुस्कुराया और बोला- ऐसी बात है दोस्तों कि इस पत्र ने मेरी आत्मा में प्रवेश करके इसके बहुत-से दाग-धब्बों को धो-पोंछकर, उसे नये रूप में चमका दिया है ।  आत्मा की धुलाई-पुछाई में ही मैं इस तरह उद्वेलित हो गया.....'’

मध्यम या निम्न मध्यम वर्ग का औसत से कोई लड़का अस्सी के दशक में क्या सपने देखता होगा। नौकरी, पैसा, प्रेमिका या जीवनसाथी या आवारगी, फक्कड़ बेपरवाही या मौज मस्तियाँ या यायावरी- कला- रंगमंच या इसी तरह के ही होते हैं ज्यादातर सपने। मिठास, जो जीवन मे कम हो या हो ही नही तो सपने गुड़ की समूची बोरी में बदल जाते हैं। सभी के नही, कुछ एक उसमे बागी, बगावत और अन्य सपने पालते हैं तो कुछ मिथुन की तरह फिल्मी दादा या गली का गुंडा या भाई का पट्ठा या अंडरवर्ल्ड का डॉन- कातिल, हत्यारा, नशेड़ी, गंजेड़ी, या जुआरी सटोरिया या जिंदगी के कोठे का भड़वा । वो बहुत समय तक या कहें  बरसों बरस तक दादागिरी, हत्या, लूटपाट और नशे की दलदल में फसे रहे। उन पर अनेक मामले थे शायद और कुछ बड़े केस बजी दर्ज हुए। जिसमे मार कुटाई से लेकर अन्य झूठे  मामले भी शामिल थे। अपनी  जिंदगी के कई साल बर्बाद करने के बाद -  एक दिन हैरोइन रखने के जुर्म में

अरेस्ट हुआ और बीस साल तक जेल में बंद रहने के  बदल गया सब कुछ...... लेकिन फिर भी इतना जानना भी जरूरी है...


नाम  सुधीर शर्मा हैं। माफ़िया से निकला यह शख़्स उसी अंडरवर्ल्ड माफिया के बेताज बादशाह करीम लाला का ख़ास था। इसको भाई या दादा के नाम से भी जाना जाता होगा। आप लगभग दो दशक तक गोवा समेत अन्य जेल में भी रहे हैं। सुधीर अंडरवर्ड के डॉन हाजी मस्तान , करीम लाला के खास तो थे ही बल्कि उनके साथ काम भी किया। तमाम बुरे और खराब और गैरकानूनी धंधे जो एक डॉन कर सकता था या करता था - में उसके सभी गुर्गे भी शामिल होते हैं। खतरनाक समय। खतरनाक जगह। ख़तरनाक़ लोग। खतरनाक सड़क। खतरनाक गली..... लाशें... लाशें और बस लाशें ही लाशें।

जो खराबा किसी तुष्टीकरण के चलते बढा था वो जो अब तक एक बर्बरान मिजाज के साथ ही कोमल भाव परोटे हुआ था-  वो समय गुजर गया था और अब दाऊद जो दुबई में था- उसके गुर्गे अबू सलेम या राजन या जो भी हो- आतंक का पर्याय थे- उन सब मे से एक मजदूर जो जमीन से उठकर आया- अरुण गवली था। अरुण गवली, मान्या सुर्वे, लाला, पठान और दाऊद... सरगर्मियां ज्यादा हुई तो पुलिस ने

 खोल दिए बंदूकों के मुंह और अपराधी और गैर अपराधी सब के सब एनकाउंटर जो सच्चे भी और थे झूठे भी- सड़क पर लाशें बनकर बिखरे थे। अंधा- धुंद गोलियों और उनकी दहशत, जीवन जैसे उजड़ गया हो। जवान बेटों की देह लाशें बन पसरी थी। नशा, नशा, नशा और बस नशा-- स्मगलर्स का करोड़ो के इस व्यापार के पसराव के साथ ही बढ़ता गया हथियारों का बाजार। और मौत का नंगा नाच भी।

सुधीर इन सबमे शामिल था या नही था- मालूम नही लेकिन उसके भीतर उजास जो उम्मीद बनकर आया इन सब मे से , आज का वो आधार और नजरिया, सब वहीं से आए थे।  ड्रग्स स्मगलिंग, या बढाते रहने के जुर्म में उसको गोवा कारागृह में डाल दिया गया ।

यहां उसका प्लस पॉइंट जुड़ता है वो है बचपन से ही उसका किताबो व पेपर पत्रिका  व फिल्मो का चाव। जेल में किताबों का साथ नहीं छोड़ा फिर जब जेल से छूटे तो श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय  आजमगढ़ में आ गये।

यहां उनको साहित्यिक आधार मिला। उनके मित्र बताते हैं कि विख्यात पत्रिकाएं जैसे हंस, वर्तमान साहित्य, तहलका, पाखी,आह ज़िन्दगी, इंडिया टुडे, वागर्थ, जनपथ और आउटलुक निरंतर उनकी अध्ययन सामग्री में शामिल थी। जो इनके कारण इनके दोस्त लोग भी सआदत हसन मंटो, हरिशंकर परसाई , कबीर ,मुंशी प्रेमचंद ,मोहन राकेश ,विजय दान देथा, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव के बारे में पता चला। इस बंदे का जेल जाने की कथा भी अपने आप मे बेहतरीन है।



सुधीर शर्मा कॉलेज जाने लगे ही थे। स्नातक शुरू ही किया था और उनको उसी समय मे अंडरवर्ल्ड का डॉन बनने का चाव चढा तो बाम्बे पहुंचे। उस समय वहाँ  डॉन करीम लाला पठान के भतीजे समद ख़ान से दोस्ती हुई। एक दिन समद ख़ान उनको अपने गैंग में शामिल कराने करीम लाला गैंग के अड्डे पर पहुंचा। वहाँ सैकड़ों छह से सात फीट लम्बे और तगड़े पठान बैठकर निहारी खा रहे थे। हथियार रखे हुए थे.करीम लाला पठान एक छोटी सी मेज़ पर निहारी रखकर शौक़ फ़रमा रहे थे। समद ख़ान ने कहा कि ये मेरे दोस्त सुधीर शर्मा हैं और गैंग में शामिल होने आए हैं।

पूरा का पूरा गैंग उन पर हंसने लगा और कहा कि ये जानवर का ख़ून देखकर और जानवर कटते देखकर डर जाने वाली क़ौम है। क्या मज़ाक़ है- एक पठान ने पूछा कि निहारी खाते हो। .पटककर गर्दन भी रेत देते.गोलियाँ भी चलाते.करीम लाला को गिरफ़्तार करना पुलिस के लिए चुनौती थी लेकिन पुलिस हाथ नहीं डालती.कभी हाथ भी डालती तो करीम लाला के दिग्गज वकील चुटकी में छुड़ा लेते।   करीम लाला के भतीजे समद ख़ान को दाऊद ने अहमदाबाद में घेरा। समद ख़ान कार से था और सुधीर शर्मा उसी में बैठे थे। दाऊद ने कार गोलियों से छलनी कर दी। .लेकिन दोनों बच निकले, अब एक दिन अपनी बिल्डिंग की लिफ़्ट से उतरते समय समद ख़ान को दाऊद ने  गोली मार कर हत्या कर दी।


पठान गैंग का खात्मा होते ही करीम किसी होटल को चलाने लगा और सुधीर शर्मा ड्रग्स में पकड़े गए अठारह साल की जेल हुई। गोवा जेल में क़ैद रहे।

यह प्रसिद्धि उनको जेल में मिले साहित्य ल कारण ही मिली थी,  उनको साहित्य पढ़ना अच्छा लगा। किताब लिखी, चिट्ठी द्वारा एक तत्कालीन आइपीएस और विख्यात कथाकार विभूतिनारायण राय  के संपर्क में आर फिर सुधीर शर्मा से आकर मिले और उनके लिए जेल में मनपसंद किताबों का इंतज़ाम करवाया।

सुधीर गोवा जेल में कैदी नंबर तीन सौ सात थे। एक लड़की उनको खत लिखती, स्नेहिल खत, अजीब मजबूत और गरिमामय संबंध था। जब सज़ा काट बाहर आए तो एक अच्छे इंसान बन चुके थे। और विभूतिनारायण राय ने आज़मगढ़ में एक लाइब्रेरी खुलवाई और शर्मा जी को लाइब्रेरियन बना दिया।  उनके पास अनेक खत आया करते। जो अब एक किताब की शक्ल में छप भी चुके हैं।

(२)                                                                                  *****

गोवा की आग्वाद जेल में बंद कैदी नम्बर 307- सुधीर शर्मा, उन चुनिंदा लोगों में से है, जिन्होंने ख्वाहिशों के खतों को जी भर के कागजों पर उतारा है।

इस कहानी को आप जिस नज़र से देखते हो फरक नही पड़ता, -दुखान्तिका सी भीतर उतर यह कहानी समय का चाक बन गई।

सुधीर अचानक गायब हो जाता है. जेल से निकलने के बाद साहित्य से अपने इस जुड़ाव के लिए सुधीर को सम्मानित भी किया जाता है, और वह अपने आत्मकथात्मक संस्मरण भी लिखता है. लेकिन किसी भी जगह सुधीर न तो लेखिका का, न उनके द्वारा की गई आर्थिक मदद का और न ही उनके साथ चले इस बेहद गहरे भावनात्मक पत्राचार का जिक्र करता है. लेखिका इसे एक सवर्ण कैदी को सम्मानित किये जाने और उसके द्वारा एक दलित लेखिका के साथ भावनात्मक धोखाधड़ी की तरह देखती हैं. सुधीर के नाम किताब के अंतिम खत में वे लिखती हैं - और   'युद्धरत्त आदमी'' के एक अंक में छपा भी था ::--


असल में आपसे पत्राचार करने वाले लेखकों-लेखिकाओं की सूची पढ़ते समय, मैं उनमें अपना भी नाम ढू़ंढ़ने लगी थी, मगर हर बार मुझे निराशा ही मिली. क्या आपने कभी किसी को मेरा नाम नहीं ''


मैं फिर से वही बात कहूंगी सुधीर जी, “अपराध की अंधेरी गलियों से गुजरते युवक सुधीर शर्मा ने क्या कुछ झेला सहा, उन तल्ख यादों के मीठे संस्मरण'_' भारतीय लेखक' 2004 और 2005 के अंक में छपे। मगर उस संस्मरण में भी आपने मेरी उन बातों को कोई स्थान नहीं दिया। जबकि हमारे पत्र व्यवहार का इतना लम्बा समय बीता है, कितनी बातें होती रहीं हमारे पत्रों के बीच? मगर कहीं कोई जिक्र नहीं, जैसे वे कभी कही थीं ही नहीं। जबकि आप लिखते हैं- मेरी साढे दस वर्ष की सजा खत्म होने में लगभग दो बरस बाकी रह गएथे। साहित्य व साहित्यकारों से मिले प्यार व सहारे ने मेरी सजा को आसान कर दिया था।''

यद्यपि गोवा की सेन्ट्रल जेल में आपके साथ अन्याय हुआ, आपके साहित्य शौक पर रोक लगाई गई, तब असगर वजाहत स्व.भीष्म साहनी, स्व. राजेन्द्र यादव, मैनेजर पाण्डे लगभग तीस साहित्यकारों के हस्ताक्षर के साथ की गई अपील से आपको न्याय मिला। यह बात आपने अपने पत्रों में लिखी थी। आपकी उस पीड़ा को जानकर मुझे भी दुख हुआ था। आपको पढ़ने-लिखने और पत्र पाने के अधिकार दिलाने में श्री विभूतिनारायण जी और सुमन्त भट्टाचार्य जी का योगदान बहुत बड़ा है। ऐसे सहयोगी यदि सभी कैदी को मिलें, शोषण और अन्याय-अत्याचार से पीड़ित दलितों को भी मिलें, तो क्या उनके जीवन में भी परिवर्तन नहीं हो सकता ''.......... ( बहुत गहरी और सघन है उदासी।..... यह उक्त ख़त का अंश है।)

जाने क्यों हम  लोग खासकर जीवन को प्यार करने और उसकी कामुक तहों से जुड़ाव की हद तक गहरे जुड़कर भावुकता के बेहद बीमार स्तर की तरफ झुकाव हो जाता-  और यही कुछ मेरे साथ भी हुआ- कैदी सुधीर शर्मा से सहानुभूति अचानक ही खत्म हो गई- और घ्रणित तरह की विरक्तियों सूग और हिकारत का घोलमेल सा बन गया था-- मगर हमेशा की तरह जब इस भावुक जंजाल से बाहर निकला तो लगा भाई सतीश-- टिक जाओ, बाज आओ... और बस लिखा हुआ लिखे की तरह ही लेकर निकल लिया... मगर यह भी है कि जब स्कूली दिनों में इस खंड को पढा तो युवतर लड़के की तरह ही- जो स्वाभाविक भी था, बड़ा नाम कमाता रहता अक्सर- जब तक कि ख्यालों की हीरोगिरी को दूसरा कोई पात्र नहीं मिल जाता था। सुशीला जी टाकभौरे के चेहरे मोहरे को याद या कहें की इमेजिनेशन में ढालते हुए. लगातार.... फिर भूल गया...।

                           सतीश छिम्पा

 

एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...