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Saturday, 10 October 2020

कैथरीन :- डार से भटका हुआ कोई पाखी (भाग-१) :-


  वो जैसे डार से भटका हुआ कोई पाखी (भाग-१)

 (गार्डन पार्टी -- एक कालजयी कहानी थी।)

                                  *सतीश छिम्पा

कैथरीन  मैन्सफील्ड बोशैम्प.... नाम की तरह ही जो व्यक्तित्व या मनसा, सोच या उद्देश्य या जो भी हो, समझना आसान नही था। बहुत कुछ उलझा हुआ था भीतर- भीतर, तिलिस्मी सा। वो सूनी मगर बहुत सुंदर आंखों वाली- प्यारी सी लड़की.... जाने किस तरह के तिलिस्म में नहाई वो जदुई लड़की, उदास, सूनी आंखे जो कामनाओं को जगाती भर नही बल्कि मजबूर कर देती है- अपनी तिलिस्मी गहराई में उतर मादक उजास में नहा लेने को। वो अक्सर बीमार रहा करती थीं- नहीं, नहीं, वो वाला बीमार होना नही, जिस तरह आप होते हैं- यह बीमार होना अपने आप मे एक तलाश जो समझ नही आती कि क्या है, क्यों है ? ठंडक या गर्म या दहकती हुई तपन.... जाने क्या क्या था ।  एनी डायर बहुत ही अजीब  स्वभाव वाली थी जो आत्ममुग्धताओं की सभी हदें कोसो दूर छोड़ चुकी थी। कैथरीन की माँ थी। वो अपने आप में सिमटी रहने वाली महिला थीं, परंतु उन्हीं की पुत्री कैथरीन मैन्सफील्ड अपनी माँ से बहुत अलग   स्वभाव वाली हुई।

      कैथरीन की बाल्यावस्था लगभग 6 वर्ष करोरी नाम के बहुत शांत से गाँव में बीता। बचपन से ही कुछ न कुछ  लिखते रहने की आदत थी जो काफी समय तक अनगढ़ ही रही। बचपन और किशोरावस्था की वयःसंधि में जब कामनाओ का ज्वार उठने को होता है जाने अनजाने स्वप्न संभोग का अजाना सुख चरम से पहले बह जाता है। उस तूफानी उम्र  में ही उसका कुछ प्यार या प्यास जैसा कुछ प्रकाशित भी हुआ था। किशोरावस्था का सोलहवाँ वर्ष जिस तुफानो को लेकर बढ़ा था वो कामुकताओं की तमाम हदें और स्तर लांघ गया था। इसी दौर की उसकी बहुत विद्रोही देन वर्णन का मौलिक तरीका जिसने सम्भोग को किसी साधना की तरह प्रदूषित नही करके बहुत उच्च मूल्यों के साथ वर्णित करके मानव के सबसे महान पक्ष रूप स्थापित करती है। अफसोस कि उनका यह काम भविष्य में प्रायोगिक ही रहा... हकीकतन जो हुआ उसको कागज़ों में बढ़ाया ही नही गया था...  उम्र का पन्द्रहवां बसंत उसके लिए बहुत अलग ही तरह के रंग लेकर आया था। शाम के धुंधलके में जब हल्की गुलाबी सर्द हवा उसको छू रही होती तो कहीं उसके भीतर के जादुई भाग पर जाने किस जादू का असर होता कि वो पूरी तरह ही काल्पनिक सुख को महसूस करते हुए जाने कितनी ही घर जाना भूल जाती। अचानक से प्रार्थना में पहुंचती और रीत गई या खाली का खाली ही महसूस करती । वहां था कुछ, जगह में नही, उसके भीतर- खालिस सूनापन और तिलिस्मी कामुक असर भी... आंखे बंद होती है तो औचक ही होठो पर जैसे भीतर की प्यास उमड़ आई हो और चर्च की तरफ इस तरह देखा, जैसे हाथ हिलाकर विदा किया जा रहा हो। और आजादी के सुख के लिए घनघोर प्यासों को भर लिया था - अपने ही भीतर।

यही वो समय था जिसमें उसने अपने दबंग या कहें विद्रोही स्वभाव का प्रदर्शन करते हुए परिवार की इच्छा के विरुद्ध हठपूर्वक बड़े कॉलेज लंदन में दाखिला ले लिया। क्वींस कॉलेज लड़कियों के वैचारिक पक्ष को उभरकर, विकसित करने की अफवाह तो खैर था ही लेकिन हकीकतन वह लड़कियों के मामले में उदारवादी शिक्षा के लिए प्रसिद्ध था।

            अक्सर अतीत को सोचते समय ही वो नैरेटर बन कर तन जाती। बहुत कम समय में कैथरीन को वापस भेज दिया गया था शायद तीन ही साल बाद । उसकी अपनी इच्छा के नही थी न्यूजीलैंड जाने की मगर उसको लौटना पड़ा। यह जमीन जहां उसको रहना था बहुत समय तक- सुंदर मगर चुप, सूनी उदास और हताशाओं भरे सन्नाटे सी थी- जरा सा सुखद कुछ हुआ कि देह के भीतरी तिलिस्म बहुत सघन मगर मुलायमियत के साथ देह के तिलिस्मी उभारों और मादक गहराइयों को आपस मे गूंथते महसूस करते हुए, जाने कितनी देर बाद वह उस क्षणिक और हल्के, सतही आनंद से बार आ जाती है- क्या कारण है ?

 - "सुना, उदास सा है जैसे सब कुछ....." अक्सर यही सवाल तो आता था मन मे.....

 कोई साथी क्यों नहीं ? सवाल, खुद से खुद का और बाहर शाम का हल्का धुंधलका.... जाने कितने दिन बिताए होंगे अकेले- प्यास की सुलगती आग को ढोते हुए.....

      

          लेखन के शुरुआती समय में कैथरीन को राजनीतिक अर्थशास्त्र, दर्शन और भौतिकी के अध्ययन की जो गहरी रुचि रही उसी का परिणाम था उसकी महान मगर अल्पज्ञात 'भूख, रात, चाँद और..... '' आत्मकथांश, जिसका अधूरा होना ही उसका पूरा होना था..... हालांकि उसका संगीत के साथ काफी गहरा लगाव था और वह पेशेवर चेलो-वादक बन भी सकती थी, ऐसा वो चाहती भी थी। परंतु उसके पिता ने इसकी स्वीकृति नहीं दी। 

      सन 1908 में जाने किस किस तरह के प्रयासों के बाद वो अपनी अंतरंग मित्र इडा बेकर की सहायता से वह पिता को राजीकर इंग्लैंड जाने में सफल हुई और फिर कभी लौटकर न्यूजीलैंड नहीं आयी। लंदन में कैथरीन समूची लेखन को समर्पित होने और स्थाई स्थापित होने के प्रयासों में रुच गयी। अपनी मातृभूमि से हमेशा के लिए दूर हो जाने के बावजूद उसके लेखन में न्यूजीलैंड की उदास झलक आती  रही। विरोधाभासी व्यवहार कैथरीन का स्वभाव था। वह अकसर कहती थी कि उसे इंग्लैंड की हर चीज नापसन्द है। दूसरी और अस्थाई प्रेम संबंधो के कुछ छोड़ दिए लोगो का फ़िजूल बयान भी था।

         इच्छाएं, सेक्स संबंध, प्रेमिल प्रेम, टूटन, विवाह और बीमारी मानसिक सामाजिक घेराबन्दी, उलझन, न्यूजीलैंड  मनहूस खामोशी उसको पागल करने लगी थी जो समय के जोरदार थपेड़ों ने स्वभावतः उसके स्वभाव में कुछ कटुता और तीखा व्यंग्य भर दिया था। इसलिए उस दौर में लिखी उस की ये कहानियाँ सुलगती सी लगती है। ये तमाम रचनाएं उसके 1912-13 ई. में प्रकाशित पहले ही प्रकाशित संग्रह इन ए जर्मन पेंशन में संकलित हुई हैं। 

    यह भी एक कड़वा सच है कि न्यूजीलैंड की मातमी शांति उसको झकझोरे जा रही थी। विद्रोह उसके स्वभाव में जो था इस पत्र में झलकता है :-- " किस कदर चाहती हूँ कि सभी स्त्रियों का एक निश्चित भविष्य हो-- क्या तुम नहीं चाहती? बैठे-बैठे एक अदद पति का इंतजार करने के ख्याल से ही मुझे सख्त नफरत है, लेकिन बहुतेरी लड़कियाँ तो ऐसे ही सोचती हैं। ... तुम्हारी इस ख्वाहिश के बारे में पढ़कर मैं मुस्कुरा उठी कि तुम अपनी तकदीर खुद बनाना चाहती हो-- ओह, कितनी ही बार मैंने खुद भी ऐसा ही महसूस किया है। मेरी ललक है कि मैं परिस्थितियों को अपने वश में कर सकूँ।


 बहुत ही कम, या कहें युवावस्था के शुरुआती सालों की अवस्था में प्रकाशित इस संग्रह की कहानियों में जर्मन, राजनीति, समाज, यौनिक कुंठाओं और मध्यवर्ग के शातिर, कपटी और आडंबरों एवं पाखंड को फ़ंफेड़ा गया है। इन कहानियों क्ष्टके बाद वो अच्छी लेखिका या कहें प्रतिभा के रूप में जानी जाने लगी थी।

     पहला प्यार हमेशा उसका अदीठ रहा जैसे कोई स्वप्न हो, चुंबनों और आलिंगनों का मादक अहसास। बहुत समय बाद गार्नेट ट्रावेल नामक युवा वायलिन वादक से हुआ था, लेकिन कुछ समय उपरांत यह रिश्ता टूट गया और  उसी आवेश में उसने एक संगीत शिक्षक जॉर्ज बाउडन से विवाह कर लिया। यह विवाह एक दिन भी नहीं निभ पाया और कैथरीन अगले ही दिन उसे छोड़ कर चली गयी। कुछ दिनों तक एक ओपेरा मंडली के साथ घूमती रहने के बाद वह पुनः गार्नेट के पास लौट गयी। कुछ समय बाद उसे खुद के गर्भवती होने का पता चला और उसके खराब स्वास्थ्य के कारण उसकी माँ उसे बवेरिया के एक सेनेटोरियम में ले गयी जहाँ उसने असमय एक मृत बच्चे को जन्म दिया। १९१० में ही उसे  हो गया था, जिसके कारण वह जीवन भर अस्वस्थ रही।


         सन 1912 में कैथरीन की मुुलाकात जॉन मिडलटन  से हुई। जल्दी ही दोनों में घनिष्ठता हुई और मरी कैथरीन के ही फ्लैट में रहने लगा। इसी दौरान कैथरीन की गहरी मित्रता डी॰ एच॰ लारेंस तथा उसकी पत्नी फ्रीडा से भी हुई। अपने स्वभाव की अस्थिरता तथा उद्विग्नता के कारण जीवन भर कैथरीन का किसी से लगातार अच्छा संबंध नहीं रहा। संबंधों में उतार चढ़ाव हमेशा लगा रहा।

    कैथरीन को  (टीबी) की बीमारी (जो आज सामान्य है) हो गयी। इसी वर्ष उसने जॉर्ज बाउडन को औपचारिक रूप से तलाक लेकर ओ - मारियो  से  विवाह किया। 1920 में वह फ्रांस के मेन्तो गांव में किराए के मकान में उपन्यास लेेेखन के लिए गई जहां उसने अनेक  सफलतम कहानियाँ लिखीं। इस महान लेखिका का अंत बहुत पीड़ादायक रहा- बीमारी, और प्रेम अंत सन 1922ई.  फोन्तेनब्लो में कैथरीन का देहांत हो गया।



    - "लौते, कहाँ हो तुम ?"

  .….... निःशब्द, मातम सा क्यों पसरा है यहां

        अल्पविराम का भी तो महत्व है ..... उसने सुना

  क्रमशः.......

एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...