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Monday, 12 October 2020

अमर शहीद जयमल पढा



       अमर  शहीद कॉमरेड जयमल सिंह पढा  

                              ( ●सतीश छिम्पा)

 

  'गीत मेरे नूं ओहिओ जाणे, जेहड़ा जग दे दर्द पछाणे..'
         

  इंकलाबी कवि होना- सिर्फ कवि होने जितना आम नही है बल्कि अपने आप मे मुक्ति के एक महान विचार जो अपनी उज्ज्वल स्वाभाविक तासीर के साथ बहुत सुंदरता के साथ लोक में, या कहें जन में-  जनता के प्रतिबद्ध प्रतिरोधी  कवि की जाग्रत चेतना के साथ व्यवहारिक गति के बाद मौलिक, जीवंतता के साथ सदियों सोई रही मेहनतकश आवाम को जगाने का काम करना ही प्राथमिकता है जो जन चेतना को बहुत गहरा, सघन और स्थाई आधार दे कर मुक्ति के स्वर को विजय पताका के साथ आह्वान का नाद करते हुए सत्ता का विध्वंस करने को ललकारता है मज़दूरों और क्रांतिकारियों को ।  मनुज ना केवल जन जीवन के गीतकार थे, बल्कि रेडिकल महान  उभार और हथियारबंद क्रांति के भी पक्षधर थे।  उनका मानना बिल्कुल सही था कि इस दिमागी सामंती लूट और घटिया फ़ितरतों और शोषण और अन्याय और गैरबराबरी को नवजात भारतीय पूंजीवाद खत्म नही करेगा बल्कि हित साधेगा, मनुज की शंकाएं सच भी हो गई थी।

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      पंजाब की धरती शहीदों और शहीद कवियों की धरती है। जहां बाबा बूझा सिंह, प्रिथीपाल सिंह रंधावा, पाश, अमर सिंह अचरवाल और जयमल पढा आदि के साथ ही साथ अनेक ऐसे कम्युनिस्ट्स जो नक्सल दौर और उसके बाद खलिस्तान उग्रवाद के समय चुन चुन कर निहथे कॉमरेड्स को मारा गया था। जयमल सिंह पढा को खालिस्तानी दहशतगर्दो  के 1988 में कत्ल इसलिए कर दिया था क्योंकि वे वहां के आम जन के बीच बहुत ही सकारात्मक रूप से जाना जाने वाला  सबसे प्रिय और चहेते क्रान्तिकारी थे। वे जैसी कविताएं लिखते थे, वैसा जीते भी थे। जीवन और कलम में कोई फर्क नहीं था।

 "पुत्त पा के शहीदी तेरा अम्मिए नीं अमर हो गया
 ओस दा वेख के पहाड़ जिदड्डा जेरा, नीं वेरी वी हैरान हो गया।"

- "हुआ की जो जालिमो ने दित्ता एक पुत्त मार नीं
 लक्खा होर पुत्त ने तेरे, वेख किवें जुझार नीं।"

  जयमल पढा उन चंद क्रांतिकारी कवियों  में से है, जो शहीद हुए और बहुत कम जी पाए मगर जितना कम लिखा, उतना ही बेहतरीन, सँघर्षो को शब्द देना अद्भुत था। पहले नक्सल मूवमेंट में पुलिसिया और सामंती जुल्म और दमन और फिर खालिस्तानी उग्रवादियों से मुठभेड़, ये थे असल यौद्धा। जिन्होंने पंजाब, हरयाणा में ही नहीं बल्कि  सम्पूर्ण भारत में क्रान्ति और प्रतिरोध की अलख जगाई। इनके पास कविता वैसे नहीं आई जैसे  प्रोफेसर, अधिकारी या अशोक वाजपेयी या सुरजीत पातर के पास आई।   

        अमर शहीद जयमल पढा की शहादत पंजाब में कट्टरपंथी अलगाववादियों की बलदेव मान की शहादत के बाद एक और सबसे बड़ी गलती साबित हुई.... इधर पंजाब से जो जो बहुत बुरे हालातो के फिर से उठ खड़ने के समाचार आ रहे हैं, उससे जाहिर है कि पंजाब के फासिस्ट्स किसी बहुत घिनोने काम को अंजाम देने वाले है। दो समुदायों के कट्टर धड़े और दोनों ही बर्बर- इसलिए  पंजाब की धरती के महान शहीदों पर लिखे जा रहे लिखतों का एक- एक संक्षिप्त अंश यहाँ देना जरूरी हो जाता है जो यह साबित कर सके कि धर्म नहीं, तुम्हारे या कहें लोगों (लोक) के आशिकों ने इंकलाब के लिए जान वारी थी- पेट, भूख, असमानता, अन्याय और जुल्म (राजसत्ता के साथ ही खाड़कू लहर के आतंक से भी वे जूझे) से लडते हुए जो शहीद हुए- वो शहादत की राह ही है जो तुम्हारी ही नही बल्कि देश की पीढ़ियों तक को सरचानण कर गई है।

        जैमल पढा एक प्रतिबद्ध, समर्पित और ईमानदार कम्युनिष्ट क्रांतिकारी थे जो हर एक मोर्चे पर लग्न और हौसले से अथक और निर्बाध रूप से तूफान की तरह उठता और जुटता रहा, जमीन पर जमीनी संघर्ष जो किसी धार्मिक आतंकियों की तरह फिरौती नही लेते थे बल्कि उन सब आतंकी बर्बर चेहरे को सरेआम कर देते थे। बलदेव सिंह मान और दर्शन दुसाँझ की तरह ही वो भी एक उज्ज्वल नाम , एक नाम जो क्रांति के लिए क्रांति में न्योछावर होता हुआ जीवन के गरिमामय गीत गाता हुआ इस महान बदलाव, मुक्ति के महा समर में, इंकलाब के लिए इस इंकलाबी मुहिम में जुटे हुए थे।

    वर्ष 1967-69 और 1970-71- 73 (1974 का थोड़ा हिस्सा) इस इंकलाबी लहर का सबसे महान और स्वर्णिम दौर था जब अन्याय और जुल्म करते वर्ग शत्रुओं के बीच भयानक रूप से भय पैठ गया था - उस दौर में जब जब भी और जिस पर भी सेठ, साहूकार, बुर्जुआ किसान, अफसर, व्यापारी और सामंती कुलुक किसान मानवद्रोही और राज- सत्ता जुल्म ढाती, अन्याय या जबरदस्ती करती- तब ये लाल लहर के महान बोल्शेविकों के वंशज उनके उत्तराधिकारी.….. लाल यौद्धा उस अन्याय का मुंहतोड़ जवाब दिया करते थे।

  जयमल बहुत अच्छे प्रतिरोधक कवि थे जो जब 1967- 72 तक के ये साल इस महान मुक्ति युद्ध के तड़थल्ली  मचा देने वाले गरिमा भरे  सबसे सक्रिय वर्ष थे। पढा की कविताएं मुखरित होने लगी थी।

         देश के हर हिस्से में संकट आम कामकाजी लोगों के जीवन को दयनीय बना रहा था। देश भर में नक्सली आंदोलन के सरकार के अंधाधुंध अन्याय, दमन और हत्याओं और नक्सली नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नकेल कसने की इसकी नीति के खिलाफ  विरोध प्रदर्शन लोगों के मन में नफरत भर रहा था। उसी समय, नक्सली आंदोलन का एक वर्ग जन संगठनों का निर्माण करने और जन संगठनों में क्रांतिचेता विचारो के लिए सक्रिय भी था। आक्रोश के लिए महान वाहक बनने की ओर बढ़ रहा था। सन 1971 ई. में पश्चिमी मोर्चा पाकिस्तान के साथ युद्ध के चलते दहक रहा था।  इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने पाकिस्तान के साथ युद्ध जीत लिया था और अंध राष्ट्रवाद के बवंडर को अपने पक्ष में रखा था, जल्द ही अंध उत्साह का बुलबुला फूटने लगा।। 

     छात्र युवाओ ने सिर पर कफ़न बांधकर ही घर से निकलने लगे थे। नहीं तो भला कौन सा भलामानस आग में कूदता है। परंतु जवानी को तो इंकलाबी, जुझारू, योद्धा, नक्सलबाड़ी बनने का पागलपन हो गया था । उन्होंने न तो नहरों के किनारों पर पुलिस की गोलियां की परवाह की और न ही वो उत्पीड़न  सेंटर के समक्ष डोले ( घबराए)। हुकूमत उन्हें शहीद करती, और नौजवान बसंती गीत गाने के लिए  आगे आ जाते। 1967-69 का पहला दौर था। खाते-पीतों (धनाडों) की हजारों एकड़ जमीन पर मजदूरों किसानों के कबज़े करवाने और विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा के लिए सड़कों पर लाना महान मुक्ति समर की जीत थी। जब पंजाब के गांव- गांव और घर- घर से जमीनों पर लाल झंडे गाढ़ने के लिए इंकलाब की आस में मरजीवड़े उठने लगे और मुक्ति गीत महकने लगे और विद्यार्थियों ने हुकूमत को कंपकपी ला दी तब फिर पुलिस का अत्याचार शुरू हुआ ।
     
         क्रांतिकारीयों ने बदले के रूप में वर्गीय दुश्मन के सफाए की लाइन अपना ली। यह सिर लेने और देने का समय था। राजशाही की तरफ से बेहतरीन नौजवान मारे गए और लापता कर दिए गए और बाकियों  को तिल तिल कर मरने के बाद जेलों में बंद कर दिया गया । यह नक्सलबाड़ी लहर का हथियारबंद वाला दौर था। इस जुझारू विद्रोही लहर के लिए जंगबाजों का कत्ल और  जेलों के नर्क ने एक बार गैप पैदा कर दिया । हुकूमत उनकी कमर तोड़ने में कामयाब हो गई ।

  
     उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानों का संघर्ष छिड़ गया और 1972 में पंजाब के किसानों ने जमींदारा यूनियन के नाम पर अपनी मांगों को लेकर लड़ाई शुरू कर दी। मोगा में छात्र लहू का प्रचण्ड आक्रोश, दावानल सा उबलता गुस्सा जो एक विशाल और हिंसक, महान और ऐतिहासिक संघर्ष में बदल गया था। 1967-69 और 1970-71 नक्सली आंदोलन के सबसे सक्रिय वर्ष थे। देश के हर हिस्से में संकट आम कामकाजी लोगों के जीवन को दयनीय बना रहा था। 

      देश भर में नक्सली आंदोलन के सरकार के अंधे दमन और नक्सली नेताओं और कार्यकर्ताओं पर नकेल कसने की इसकी नीति के खिलाफ एक विरोध प्रदर्शन लोगों के मन में नफरत भर रहा था। उसी समय, नक्सली आंदोलन का एक वर्ग सार्वजनिक संगठनों का निर्माण करने और सार्वजनिक आक्रोश के लिए वाहन बनने की ओर बढ़ रहा था। गाँव के बदमाशों, जमाखोरों, ब्लैकमेलरों, मुखबिरों और ठगों की नींद से वंचित दिख रहा है। यह ऐसा था जैसे कोई समुद्र मंथन कर रहा हो और देवता सभी राक्षसों को चुनौती दे रहे हों। नाटककार गुरशरण सिंह के नाटक अपना असर करने लगे थे। 
    
   
       उत्तर भारत मे जहां लोक भाषाओं की कविताओं पर तेलंगाना सशस्त्र किसान उभार का प्रभाव नगण्य रहा वहीं नक्सलबाड़ी इंकलाबी उभार ने इतना गहन प्रभाव डाला था कि पंजाबी में संतराम उदासी, लाल सिंह दिल, अवतार पाश, दर्शन खटकड़, जयमल पढा आदि अनेक कवि नक्सल महान उभार के प्रतीक बनकर आए थे। वर्ष 1967-69 और 1970-71- 73 (1974 का थोड़ा हिस्सा) इस इंकलाबी लहर का सबसे महान और स्वर्णिम दौर था जब अन्याय और जुल्म करते वर्ग शत्रुओं के बीच भयानक रूप से भय पैठ गया था - उस दौर में जब जब भी और जिस पर भी सेठ, साहूकार, बुर्जुआ किसान, अफसर, व्यापारी और सामंती कुलुक किसान मानवद्रोही और राज- सत्ता जुल्म ढाती, अन्याय या जबरदस्ती करती- तब ये लाल लहर के महान बोल्शेविकों के वंशज उनके उत्तराधिकारी.….. लाल यौद्धा उस अन्याय का मुंहतोड़ जवाब दिया करते थे। 

   तेलंगाना का प्रभाव मराठी और तेलगु पर ज्यादा रहा- उत्तर भारतीय भाषाओं की बात की जाए तो मनुज देपावत के रचाव में यह  प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। राजस्थानी समाज जो अपने रियासतकालीन सड़ चुके सामंतवादी संक्रामक रोग को आज भी ढो रहा है जिसके चलते यहां कविता सिर्फ कविता है, इंकलाबी कविता नही- जबकि यहां का इंकलाब विस्फोट की तरह हुआ था।
       मैंने अपने पहले के लेख में पंजाबी और राजस्थानी इंकलाबी कविताओं के मूल्यांकन के समय लिखा था कि --" लोक' के कवि कोई तटस्थ कवि नहीं थे बल्कि रेडिकल क्रांतिकारी चेतना से लैस कवि थे। उनका मानना था कि क्रांतिकारी साहित्य जनांदोलनों और जनसंघर्षों की उपज होता है।  प्रगतिवादी आंदोलन के बाद दूसरी बार किसान-मजदूर व निम्न वर्ग उनकी कविता में अपनी आशा-निराशा, कुंठा-पराजय, आकांक्षा-सपने और संघर्ष के बहुतेरे रंगों को ले कर प्रकट हुए। यहाँ कुछ अतियाँ भी हुई। जैसे, संघर्ष के लॉजिकल चित्रण का मुख्य स्वर सशस्त्र क्रांति का रहा मगर भटकावों का भी आना जाना लगातार था।  जब पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी ताल्लुक के एक गांव नक्सलबाड़ी से भारतीय शोषक राज सत्ता के विरुद्ध विद्रोह, क्रांति की शुरुआत हुई जिसने हर संवेदनशील युवा को प्रभावित किया था। इसी प्रभाव क्षेत्र में आए पंजाबी के महान क्रांतिकारी कवि गीतकार संतराम उदासी। उस दौर में जब पाश जैसा खतरनाक कवि भी मंच पर पसीने से नहा जाता था क्योंकि सारी की सारी भीड़ चिल्ला उठती थी 'संतराम उदासी' जिंदाबाद के नारों से। संतराम जी नक्सल क्रांन्तिकारी थे, उनकी मीटिंग्स और अभियानों के हिस्सा थे। जिसकी वजह से पंजाब पुलिस ने उनको इतना ज्यादा टॉर्चर किया था कि उनकी दोनों आंखे हमेशा के लिए खराब हो गई थी। उनके सर के बालों के ताण लटकाया जाता था। इस जोर जबर और जुल्म के कारण ही उदासी के गीतों में विद्रोह घुला था। पाश, उदासी और लाल सिंह दिल की यह तिकड़ी जबरदस्त थी। वे मजहबी सिख थे, दलित मगर अम्बेडरवादी नहीं थे, मार्क्सवादी थे। मैं खुश नसीब मानता हूँ खुद को कि पाश को पढ़ने की ललक के कारण जो पंजाबी भाषा पढ़नी लिखनी सीखी उसके कारण संतराम उदासी को समग्र रूप में मूल पंजाबी भाषा मे ही पढ़ा- और बाद में जब मनुज को पढा और मनन किया तो सुखद आश्चर्य तो खैर था ही लेकिन झटका भी लगा कि हमारे अग्रजों ने कभी क्यों नही किया तुलनात्मक मूल्यांकन, हम कितनी महान परम्परा से विमुख रहे हैं।   खैर अब इस दायित्व को निभाना जरूरी हो गया है।

              
       नक्सल उभार के क्रांतिकारियों को जालिम राज सत्ता की क्रूर मार और व्यवस्थागत सामाजिक और लौकिक पुरातन रोगों जातीयता, धर्म, सामंती सोच और अन्य तमाम पीड़ाओं को सहते हुए वे मेहनतकशों के सम्मान, जीवन, श्रम और संघर्षों की गरिमा जो इस व्यवस्था के हाशिए पर पड़ी ज़िंदगी की तरह के अनेक  दुखों, पीड़ाओं, हताशाओं और संघर्ष के उज्ज्वल गीत, गरिमामय भाव, ओजपूर्ण विद्रोह, और माटी, खेत के सबसे कोमल और वात्सल्य पूर्ण अद्वितीय भावनाओं और कल्पनाओ की जगह हकीकत का जीवंत चित्र और संघर्षो से तपकर निकले समय के साक्षी लोक के लोगों के  उग्र आक्रोशित मनोभावों और टूटती जा रही आस, हार, हीनताबोध और न जाने कैसे- कैसे महताऊ भावों को साथ रखते हुए हर एक की तरफ बहुत सघन और गहरा हस्तक्षेप करते वे एक प्रचंड क्रांतिकारी कवि रूप में स्थापित हो जाते है- मगर राजस्थान के मध्य मार्गी धड़ों ने साजिशाना तौर इन्हें हाशिए पर रखते हुए मार्क्सवादी अप्रोच को मुख्यधारा से दूर ही रखा, को अब हम सब साथी क्रांति के इस महान गीतकार को ले आने के प्रयास में हैं।

       भूख, लाचारी, मजबूरी, बीमारी और हाशिए पर पड़े तड़फ रहे जनजीवन, झुग्गियों में मर खप रहा मेहनतकशों और बाजारू दुनिया मे मर रहे संबंधों और अत्याधुनिक समय की बुर्जुआ फ़ितरतों पर बड़ा निर्मम वार करते हैं ।  एक और जहाँ आर्थिक वर्ग विभाजक रेखा या खाई का आकार बढ़ते हुए जीवन को लील रहा है- वहीं मानवद्रोही और जीवन को अपमानित करते रहने वाली मौजूदा राजसत्ता जब लोक को हाशिए पर पटक, अभिजात्य वर्ग के  कलावादी मानवद्रोही और जीवन से कटे बुद्धिजीवियों को लगातार आगे ही आगे बढ़ाती जा रही है- यह औचक नही कि श्रम, जीवन, लोक, शब्द, भाव, कविता और प्रतिरोध के बजाए - मानवद्रोही बौद्धिकों को समकालीन फासिस्ट बर्बर सत्ता के तमाम लाभ मिलना और एम.एन. रॉय से लगाकर कॉंग्रेस फ़ॉर कल्चरल फ्रीडम में मुख्य अज्ञेय तक को महामानव रूप में प्रस्तुत किया जाना- मानसिक विकलांगता से ज्यादा कुछ नहीं। इनके यहां बौद्धिक विलासिता की  सीमा अंतहीन है जिसके कारण यहां से दार्शनिक, कवि, चिंतक, शिक्षाविद, रंगकर्मी या कह सकते हैं कलाओं और जीवन के तमाम स्वनामधन्य भरी पूरी पीढ़ी है। इन मानवद्रोहियों ने अनेक मार्क्सवादी कवियों और प्रतिरोधक बैरिकेड्स को छल से हाशिए पर टिका रखा था।

     सन 1988 ई में ही पाश की तरह ही इनका कत्ल हो गया था। वो एक आवाज खामोश हो गई जिसने देश को एक नया क्रान्तिकारी आयाम दिया। कविता और नज़्म को विद्रोह के नए स्वरों से साधा। पढा  के लेख और चिट्ठियां, जिनका सिर्फ  नाम मात्र ही बच्च सका है, न सिर्फ अपने वक़्त के बल्कि बाद के भी नुकसान दिख ही रहे थे। वे उनमे से थे जिन्होंने जुल्म को चुनौती दी। मगर आज पंजाबी के इस योद्धा कवि को खास पंजाब के ही युवा पूरा नहीं जानते।  गौर करो जवानों, यह नाम,जी, बिल्कुल यही एक नाम जो गरिमामय है,  उज्ज्वल नाम है जयमल पढा.... इसको सहेजना अब तुम्हे है।

           अक्टूबर क्रांति, विद्रोहों का दमन और क्रांति  को तत्कालीन वस्तुस्थिति के अनेक प्रमुख हानिकारक, धोखेबाज, कला के व्यापारी, राजनीतिक छल-कपट, लोकतंत्र की आड़ में सामंती जोर जबर और अधिकारों का हनन और हिंसा का विस्तार आदि का सामना करते हुए स्थाई मजबूती से स्थापित किया गया था। शोषक वर्गों के साथ जुड़े हुए कलावादी और मध्य मार्गी तबकों में बढ़ती हुई मूल्यहीनता आदि स्पष्ट रूप में उभर कर आते हैं.... जबकि   मनुज खुद अपने आप मे एक युग हैं। उनका हर एक गीत का एक महान उज्जवल पक्ष है कि वे जीवन से कटे हुए वर्ग, भाव, शब्द और भाषा का हर भाग का निर्मम आलोचनात्मक निस्तारण के पक्षधर रहे है। घनघोर सामंती समय मे भी  विज्ञान की सृजनात्मक विधियों से संचालित चेतन्य पक्ष को  स्थाई प्रतिरोधक बनाने के सकारात्मक प्रयास करना ही आने आप मे महानता है।

Saturday, 10 October 2020

राजस्थानी की मार्क्सवादी कविता बौद्धिक कपट की शिकार है...


बौद्धिक कपट की शिकार राजस्थानी मार्क्सवादी कविता

(तेलंगाना सशस्त्र किसान महाउभार- और मनुज देपावत)

षड्यंत्र के तहत घनघोर अन्याय हुआ है राजस्थानी कविता के साथ।अलोचकों के इस अक्षम्य अपराध के लिए समय उन्हें कभी बख्शेगा नहीं। राजस्थानी कविता के मार्क्सवादी इंकलाबी स्वर को चबा गया यह वर्ग.....

बात केवल महाकवि मनुज देपावत की ही नही है बल्कि उन तमाम प्रतिबद्ध और महान रचनाकारों की हैं जिन्हें सामंतवादी लेखक समूह ने अपने ओछे हितों के लिए या तो मुख्यधारा की साहित्यिक गतिविधियों में शामिल नही होने दिया या फिर भयभीत हो रहे उनके भीतर कुंठाओं और सामंती सांस्कृतिक प्रदूषकों के सेफ होम की तरह के स्लीपर सेल्स (फ़ासीवादी ताकतों के साथ ही वे जो आतंकवाद के अवशेष किन्ही किरचों में बदल कर आगामी  अराजक्ताओं या हमलों या घुसपैठ के आदेशों के लिए प्रतीक्षारत- सामाजिक रूप से अच्छी छवि वाले समाज सुधारक टाइप या दार्शनिक लुक में संस्कृतिककर्मी रूप जब छवि गढ़ता है- समझ लीजिए कि उनका मूवमेंट या टारगेट बहुत बड़ा और  नुकसानदेह भी है।

सन 1967 ई. में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी ताल्लुक के नक्सलवाड़ी गांव से आज़ादी का प्रचंड दहकता दवानल उठा। पूर्वी उत्तर प्रदेशउत्तरी आंध्रा से पंजाब और फिर पंजाब से राजस्थान.... यह जीवन का संग्राम था जो आज़ादी के लिए जूझ रहा था। खेती किसानी की बात करें तो देखेंगे कि किस तरह बर्बर जुल्म और जो जबर था बड़े किसानों (कुलुक किसान नरोदवादी) का मेहनतकशों के विरुद्ध। सीरी हो या हिस्सेदार या अन्य मेहनतकशबहुत भारी अन्याय को झेलते हुए वे बढ़ते रहे आगे और आगे..... यहां तक कि जब तक बच्चों की भूख से दम तोड़ चुकी बेजान देह को नही देख लियावे मातम में डूबे शांत रहे। चोटें बढ़ती गई और महान दवानल का रूप ले लिया जो मनुज के मार्फ़त तात्कालिक देसी रियासतों के हत्यारे राजाओं को उनके कुकर्म तक याद करवाते हुए महान मानव जीवन की गरिमा कायम रखी।

अगर मनुज की कविताओं का हम द्वंद्ववादी विश्लेषण करें तो यह एक नई परम्परा का उत्स तो चलो होगा ही लेकिन इसके साथ ही राजस्थानी की महान इंकलाबी काव्य परम्परा और उन प्रतिरोधी महान लोकपक्षधर कवियों के साथ भी न्याय होगा और आज तक पैठ चुके कलावादी संस्कृतिक आतंकवाद से जूझ सकने के मौके बार बार आएंगे।

मुक्तिकामी शब्द की एक अंकग और महान परम्परा है जिनको शहादतें दे दे कर कायम रखा गया है। अक्सर यूं ही किसी स्पीड ब्रेकर को गलती से प्रतिरोध मान लेने की भूल के चलते ही तो कलावादी जनद्रोही गिरोह आज हावी है।

मार्क्सवादी विचारधारा में किसी रचना को समझने के लिए वस्तु तथा रूप के संबंध को समझना आवश्यक माना जाता है। इसके अंतर्गत लेखक क्या कहता है तथा कैसे कहता है- पर नही बल्कि पदार्थ की चेतनासामाजिक मग्रर साथ ही आर्थिक व्यवहार पर भी बल दिया जाता है-- जिसमे एक तटस्थ तीसरा पक्ष भी होता है लेकिन यहां मनुज की कविता में या कहें दर्शन में जो महान संकेत हैं वे इंकलाबी है।  अब जब ये पंक्ति सामने है इसलिए उन्होंने धोरों की जनता को जागने का आह्वान किया - धोरां आळा देस जाग रैऊंठा आळा देस जाग। राजस्थानी भाषा साहित्य की पहली और अद्भुत शुद्ध इंकलाबी या मार्क्सवादी कवि को आलोचकों ने वैचारिक स्तर पर क्यों नही मूल्यांकित किया ?

 (- "राजस्थानी जुझारू कविता के पहले ही कवि थे मनुज देपावत)


इंकलाबी कवियों  में से एक है क्रांति का कवि- मनुज देपावत

मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे जब स्टेट का ढांचागत बदलाव बहुत गहरी उथल पुथल ले रहा था- ब्यूरोक्रेट्सनेतापुलिस आदि तमाम झमेले एक साथ मचे हुए थे। आप इस अफरा तफरी को सामंतवाद और पूंजीवाद के अंतिम द्वंद्व के रूप में भी देख सकते हैं। व्यवस्थागत बदलाव और नीतिगत ढांचा ध्वस्त या कहीं खत्म होने के बाद जब नवजात भारतीय पूंजीवाद और उसके आपसांस्कृतिक अवमूल्यों के विरुद्ध लोकयुद्ध की कविता गीतों के साथ  - प्रतिरोध का पहला आधार जो बने उन्हें ना मार्क्सवादी माना या स्थापित किया गया और  जिसे मुख्य धारा से अलग भी अलग रखा गया था। आप देखिए कि मानव समूहसमाज या वर्ग में आर्थिकजातीय और वर्गीय और शोषण और  कुपोषणजबर जुल्मअन्याय के विरुद्ध जन का आह्वान करने वाली कविता जिसमे वर्ग विभेदपक्षधरता और इंकलाब या मुक्ति का दर्शन हो वो मार्क्सवादी या इंकलाबी सृजन है।  वे कविताएं जो मध्यम मार्गीय समाजवादी या नवजनवादी कविताओ का आवरण लेकर रचाव करते हैंकमजोर लिबर्ल्स स्थापित हो ही रहे होते हैं।

एक जरुरी बात यह भी है कि किसी मूवमेंट के दौरान उसी के तत्वों को कविता में ढाला जाता है तो जाहिर है वे उसी विचारधारा या बिरादराना संगठन के होंगे-- लेकिन इसी तरह के मूवमेंट से प्रभावित होकर मध्यममार्गी लोग कविता रचे तो उस कविता को उसी धारा के साथ ही जोड़ा जाता हैकवि यहां गौण है।  भारतीय भाषाओं में सबसे पहले जिस इंकलाबी दौर ने सब कुछ का अमूल चूल बदल दिया था वो था सन 1939- 1952-53 का कालजब तेलंगाना सशस्त्र किसान महान उभार दक्षिण  में साहित्य कलाओं आदि का मूल स्वर ही बदल गया था। उत्तर में पेप्सू मुजारा किसान आंदोलन भी था। बाद क समय मे तो सन 1967 का नक्सलवादी  (इसका अगली किश्त में वर्णन किया जाएगा ) कम्युनिष्ट उभार ने पूरे देश की हर एक नीति बदल डालीवो जो उठा था एक दवानल। छठा और सातवां दशक इंकलाबी- क्रांतिकारी कविताओं का दौर था- और अस्सी के दशक विद्रोही मगर दिशाहीन विध्वंसात्मक दृष्टिकोण को स्थापित करते हुए अंत मे बदलाव के मार्फ़त कविता को नया और श्रेष्ठ वैचारिक और द्वंद्ववादी रूप देते हैं। अगर हम वैचारिक धरातल पर ही खड़कर देखें तो जिस कविता को जनवादी कविता के मुलम्मे में गढ़कर रखा है वो हकीकतन मार्क्सवादी/ इंकलाबी कविता है। यह विडंबना ही है यहां की ज्यादातर लोग जनवाद को मार्क्सवाद समझे बैठे हैं। मार्क्सवादी अवधारणा जिस महान परिवर्तन के समांतर है जिससे इसका फलक वैश्विक होता है- जबकि जनवादडेमोक्रेसी- इसी की वजह से अनेक कवियों का मूल्यांकन ही गड़बड़ झाला है। यह ना ही अतिशयोक्ति है और ना ही आत्ममुग्ध बयानबाजी है कि कविताओ के सही और सटीक मूल्यांकन के लिए वैज्ञानिक तर्कणा विकसित करना बहुत जरूरी है जो वाक्यों के भीतर जमी विचारधारा को पकड़ जान सके यह बहुत सूक्ष्म और गहराई मांगता है- मगर अभी समय लगेगा आलोचनाओ में वैज्ञानिक दीठ को स्थापित करने में।

इसी एक छोटी मगर बहुत बड़ी और गंभीर कमी या साजिश या कपटपूर्ण मूल्यांकन या जो भी कारण रहा हो के चलते भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के तेलंगाना सशस्त्र  महान  किसान उभार के दौरान या उसके थोड़ा बाद में आए बदलाव या प्रभाव जो लोक भाषाओं और कविताओं में स्पष्ट दिखता है को नकारा नही जा सकतायहां उदाहरण देखिए:-

रै उठो किसानां मज़दूरां

थे उंटा कस ल्यो आज जीन

इं नफा खोर अन्याय नै

कर दयो कोडी रा तीन तीन

मनुज  मार्क्सवाद के गहन अध्येता तो नही थे मगर समर्पित एक्टिविस्ट थे। शेखावाटी क्षेत्र के कम्युनिष्ट गतिविधियों से परिचित भी थे और पार्टी के सिद्धांतों  विचार के साथ प्रतिबद्ध थे। कविताओं में ही साबित हो जाता है कि डेमोक्रेटिक या मध्यमार्ग आदि में नहीं बल्कि उनका रुझान- मार्क्सवाद की तरफ ही रहा। सामंती और नव पूंजीवादी सत्ताओ का मुखर विरोध लेकिन इनकी रचनाओं में गहन चिंतन का बीज भी इसी आक्रोश और नकार के साथ आया है - इसलिए अब इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नही कि मनुज देपावत राजस्थानी साहित्य के पहले प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कवि थे- और यही से उस एक बेहतरीन श्रंखला का राह बनता है जो मार्क्सवादी इंकलाबी कविता का उत्स और पसराव दोनों ही है। भले ही यह कुछ जगह  गहन लोक रंजकताओं का बीमार सामंती रूढ़ हुए किसी शब्द को ले आते हैं मगर स्थापित नही करते हैं।

भारतीय इतिहास में राजस्थान का वर्णन अवश्यम्भावी है। इतिहास की हर एक बड़ी घटना के साथ राजस्थान का गहरा संबन्ध रहा है। मुगलों की गुलामी से लेकर अंग्रेजो की झूठी बोटी खाने वाला यहां का सामंतवादी तबका अनेक  वर्षों तक यहां की मेहनतकश जनता  के टुकड़ो पर पलता रहा था। हालांकि थोथा घमंडजातीय  उच्चता का भाव और बहादुरी के मनगढ़ंत किस्से ही बस उनके हिस्से थे।  और इसी सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त तत्कालीन चारण कवियों का काव्य था। कुछेक को छोड़करजबकि मनुज देपावत राजस्थनी कविता की घोरअमानवीयबर्बरझूठी सामंतशाही दरबारों की कविता परम्परा से आने के बाद भी वे एस्थेटिक सेंस का कल्चरल लेवल पर प्रयोग करते थे। कह सकते हैं कि उनका संबंध राजस्थनी सामंतवादी कविता की बीमार धारा का मुखररेडिकल विरोध करके खत्म करने से था। लेकिन इनकी रचनाओं में जातीय चिंतन का अभाव है इसलिए खलिस मार्क्सवादी इंकलाबी कविता का उत्स है।  सामाजिक उत्पीड़न के प्रति अदम्य विद्रोहलोकमानस से अथाह रागशोषणपरक सामाजिक व्यवस्था को आमूल-चूल बदलकर समतामूलक समाज निर्माण और वक नया और महान महामानव की मुक्ति गान है। क्रांति के ज़ज़्बे से ओत-प्रोत थे। उसने  साहित्य और विशेषकर लोकपखी कविता के सौंदर्यशास्त्र को गहरे से प्रभावित किया।


एक बात यह भी गौरतलब है कि कुछ कवि राज दरबार और सामंतों के प्रभाव या छाया में नहीं थेइसलिए उनकी कविता में जीवन की धड़कन स्पष्ट सुनी जा सकती है। मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे प्रतिरोध की मार्क्सवादी अवधारणा को को कविता में ढाल कर मुक्ति के गीत गाया करते थे।

उनके मन मे इस सामंती व्यवस्था का विध्वंस करके एक नया राज्यमेहनतकशों का स्टेट सृजन की बातें यूँ ही नही आई बल्कि '1925 ई. में एम.एम. रॉय और दूजे साथियों ने मिल कर भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का गठन कर लिया था जो सदी के तीसरे दशक के आसपास शेखावाटी के किसान समूहों को काफी प्रभावित कर ही थी। और उधर मनुज के मन मे प्रचंड प्रलंयकारी आग धधक रही थी जो सिर्फ सृजनधर्मिता ही नहीं बल्कि आक्रोश की भी उत्प्रेरक थी।

अगर मनुज की कविताओं का द्वंद्ववादी विश्लेषण करें तो यह एक नई परम्परा का उत्स होगा लेकिन समस्याएं बहुत है जैसे मार्क्सवादी विचारधारा में किसी रचना को समझने के लिए वस्तु तथा रूप के संबंध को समझना आवश्यक माना जाता है। इसके अंतर्गत लेखक क्या कहता है तथा कैसे कहता है- पर जोर दिया जाता है-- जिसमे एक तटस्थ तीसरा पक्ष भी होता है लेकिन यहां मनुज की कविता में या कहें दर्शन में ऐसा नही मिल पाया अब जब ये पंक्ति सामने है इसलिए उन्होंने धोरों की जनता को जागने का आह्वान किया -

धोरां आळा देस जाग रैऊंठा आळा देस जाग।

छाती पर पैणां पड़्या नाग रैधोरां आळा देस जाग।।

बड़ा कारण सामाजिक विषमता और मानव की परतंत्रता थी।

इन सभी स्थितियों से दुःखी होकर मनुज ने अपने काव्य में विद्रोह का स्वर गुंजाया।

मानव को कायरता से जगा कर नए युग निर्माण की प्रेरणा देने का काम मनुज की कविताएं करती हैं। उनकी दृष्टि में वे सब परम्पराएं मृतप्राय हो गयी हैं और अब उनके मोह में फंसे रहने की आवश्यकता नहीं है। शोषकों एवं उत्पीड़कों के प्रति

जीवन बोध की अनुपस्थिति के यासंवेदनहीनता और शुष्कता के  यातना-शिविर में  उम्मीदों और स्वप्नों को बचाकर अपने वक्त की तमाम सरगर्मियों और जोखिम के साथ ढलना भूलते नहीं है। मंगाए सामाजिकराजनीतिक अपरिपक्व सोच और अराजक जीवन शैली इन्हें पेशेवरों की श्रवणी में जाने नहीं देती। भूमि हीनसीमांत किसान और सर्वहारा मुक्ति के गीत एक अस्मितासंघर्षशील मूल्यों  और समझौता विहीन प्रतिबद्धता सबसे जरुरी है।

मानव खुद अपना ईश्वर है,

साहस उसका भाग्य विधाता।

प्राणों में प्रतिशोध जगाकर,

वह परिवर्तन का युग लाता।

स्वतंत्रता की लगन उनकी अन्तरात्मा की जोरदार लगन थी। इसी आवाज को बुलन्द करते हुए वे कठपुतली शासकों को सम्बोधित करते हैं-

वां कायर कीट कपूतां की,

कवि कथा सुणावण नै जावै

अम्बर री आंख्यां लाज मरै,

धरती लचकाणी पड़ जावै

जद झुकै शीशनीचां व्है नैण,

धरती रो कण-कण सरमावै।

इसी तरह उन्होंने सामंतशाही  की नीतियों की भयानकता का पर्दाफाश किया तथा शोषण और अन्याय के खिलाफ मजदूर-किसानों को संघर्ष का संदेश दिया। यह संदेश आज भी जन-आंदोलनों में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। व्यवस्थागत असमानता के लिए-

रै देख मिनख मुरझाय रह्योमरणै सूं मुसकल है जीणो

ऐ खड़ी हवेल्यां हंसै आजपण झूंपड़ल्यां रो दुःख दूणो

ऐ धनआळा थारी काया राभक्षक बणता जावै है

रै जाग खेत रा रखवाळाआ बाड़ खेत नै खावै है

ऐ जका उजाड़ै झूंपड़ल्यांउण महलां रै लगा आग।

यही प्रबल भावना उनके सामाजिक एवं साहित्यिक कार्यों से फूट-फूटकर निकल पड़ती दिखाई देती है। उनकी लेखनी समाज के शोषित जीवन को चित्रित करना अपना उद्देश्य घोषित करती है।

सभी स्थितियों से दुःखी होकर मनुज ने अपने काव्य में विद्रोह का स्वर गुंजाया।

मानव को कायरता से जगा कर नए युग निर्माण की प्रेरणा देने का काम मनुज की कविताएं करती हैं। उनकी दृष्टि में वे सब परम्पराएं मृतप्राय हो गयी हैं और अब उनके मोह में फंसे रहने की आवश्यकता नहीं है। शोषकों एवं उत्पीड़कों के प्रति । बहुत बुरा है कि एक महान इंकलाबी कविता और कवि को मार्क्सवाद के तौर पर नोटिस ही नही किया गया..... जबकि वे वाम राजनीति में इतने पारंगत थे कि सामंतशाही की हर उस मानवद्रोही शय को पकड़ लेते थे जो हुक्काम की नफरत का कारण बना है।  उनकी रचना भावनात्मक अंधी में उठते हर एक भाव का उपयोग करती है। हालांकि उस समय हिंदी में   नई कविता का दौर आया नहीं था मगर मनुज की भाषा और शैली नई कविता की परछाई का आभास देती थो। उनकी भाषा कलवाद और छायावाद की बीमार शाश्वत मगर अनैतिक सॉफ्ट फ़ासिस्ट वैल्यूज़ और उसके  अमूल्य के अलौकिक स्वरूप का विरोध करती है। यह कितनी बड़ी और समृद्ध राजनीतिक समझ का नतीजा है कि जन विरोध वहां हिमायत में उपस्थित रहता है। यथा :-

वह राग बेबसी का उठतामहफ़िल के मधुर निनादों में ! हे गाँवतुझे मैं छोड़ चलालाचार भरे इस भादों में ।


तभी तो समाजराजनीति और लोक की स्थितियों को पकड़नेे में सफल रहें। उस कला विरोधी दौर में भी वे जिस ठोस जमीन पर खड़े होकर विप्लव के गौरव गान थे उस कविता विरोधी मानव द्रोही दौर में एक विद्रोही स्वर और मुक्त आवाज के नाते एक मुक्तिकामी युवा रूप में इनकी पहचान रही हैं। इनकी कविताओं में प्रतिबद्धता के मूल्यों का सभजसरल समावेश होता है।

दरअसल जब काव्य भाषा का प्रश्न आता है तब।  साहित्यिक भाषा नामक शब्द मुखरित होता जाता है। केवल व्यंजना ही नहीं बल्कि रंजकीय गुणों के साथ लौकिक भाषा पक्ष। सहजजायज प्रतिरोध उच्च स्तरीय भाषा अभिज्ञान के कारण ही टिकत है।

आम  बोलचाल में राजस्थान का सामंती परिवेश बाहरो बाहरी ही फलत चलत है बाकी पोलिटिकल प्रतिबद्धता को कभी समझा ही नहीं गया है। वह अलौकिक साधन बन चुके भावों का नकार बन कर जन स्वीकार रुपक बन गया है।

 "फिर भी वे अपनी सत्ता काकुछ सार जमाने वाले हैं !

कंगलों के झूठे टुकड़ों परअधिकार जमाने वाले हैं !

यह मानव की दुनिया कठोरयह मानव का संसार विषम !

दुर्बल के निर्बल कन्धों परदुस्साह जीवन का भार विषम !"

इंकलाबी कवियों  में से एक है क्रांति का कवि- मनुज देपावत जो आलोचकों का कपट की भेंट चढ़ गया।

मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे जब पूंजीवाद और सामंतवाद का अंतिम युद्ध (युद्ध ही माना जाएव्यवस्थागत बदलाव और नीतिगत ढांचा ध्वस्त) खत्म होने के बाद जब नवजात भारतीय पूंजीवाद और उसके आपसांस्कृतिक अवमूल्यों के विरुद्ध लोकयुद्ध की कविता गीत लिखे - प्रतिरोध का पहला आधार जो बने उन्हें ना मार्क्सवादी माना या स्थापित किया गया और  जिसे मुख्य धारा से अलग भी अलग रखा गया था। आप देखिए कि मानव समूहसमाज या वर्ग में आर्थिकजातीय और वर्गीय और शोषण और  कुपोषणजबर जुल्मअन्याय के विरुद्ध जन का आह्वान करने वाली कविता जिसमे वर्ग विभेदपक्षधरता और इंकलाब या मुक्ति का दर्शन हो वो मार्क्सवादी या इंकलाबी सृजन है।  वे कविताएं जो मध्यम मार्गीय समाजवादी या नवजनवादी कविताओ का आवरण लेकर रचाव करते हैंकमजोर लिबर्ल्स स्थापित हो ही रहे होते हैं।

एक जरुरी बात यह भी है कि किसी मूवमेंट के दौरान उसी के तत्वों को कविता में ढाला जाता है तो जाहिर है वे उसी विचारधारा या बिरादराना संगठन के होंगे-- लेकिन इसी तरह के मूवमेंट से प्रभावित होकर मध्यममार्गी लोग कविता रचे तो उस कविता को उसी धारा के साथ ही जोड़ा जाता हैकवि यहां गौण है।

भारतीय भाषाओं में छठे और सातवां दशक इंकलाबी- क्रांतिकारी कविताओं का दौर था- और अस्सी के दशक विद्रोही मगर दिशाहीन विध्वंसात्मक दृष्टिकोण को स्थापित करते हुए अंत मे बदलाव के मार्फ़त कविता को नया और श्रेष्ठ वैचारिक और द्वंद्ववादी रूप देते हैं। अगर हम वैचारिक धरातल पर ही खड़कर देखें तो जिस कविता को जनवादी कविता के मुलम्मे में गढ़कर रखा है वो हकीकतन मार्क्सवादी/ इंकलाबी कविता है। यह विडंबना ही है यहां की ज्यादातर लोग जनवाद को मार्क्सवाद समझे बैठे हैं। मार्क्सवादी अवधारणा जिस महान परिवर्तन के समांतर है जिससे इसका फलक वैश्विक होता है- जबकि जनवादडेमोक्रेसी- इसी की वजह से अनेक कवियों का मूल्यांकन ही गड़बड़ झाला है। यह ना ही अतिशयोक्ति है और ना ही आत्ममुग्ध बयानबाजी है कि कविताओ के सही और सटीक मूल्यांकन के लिए वैज्ञानिक तर्कणा विकसित करना बहुत जरूरी है जो वाक्यों के भीतर जमी विचारधारा को पकड़ जान सके यह बहुत सूक्ष्म और गहराई मांगता है- मगर अभी समय लगेगा आलोचनाओ में वैज्ञानिक दीठ को स्थापित करने में


एक बात जो मुझे बहुत बाद में आदरणीय और चर्चित आलोचक राजाराम भादू से बात चीत के दौरान ध्यान में आई और फिर थोड़ी पड़ताल और सब जच गया। कवि भपी दक्षिणपंथी हो या मध्यम मार्गी या लिबरल या न्यूटलकुछ फर्क नही पड़ताहाँ अगर वो एक ऐसे समय मे है जहाँ एक मुक्ति का महासंग्राम छिड़ा हुआ है और वो उस पर उसी तरह की द्वंद्वात्मक रचना लिखता है तो उस कविता को इंकलाबी कविता ही कहा जाएगा ना कि कवि को। और इसी संदर्भ में आगे बढ़ें तो पाएंगे कि सत्तर के दशक में नक्सल किसान महाउभार के दौरान रेवंतदान चारण, 'इंकलाब री आंधी'', तो बिल्कुल स्पष्ट मार्क्सवादी कविता हैइसके अलावा 'घण मूंघा मोती मत ढळका रोयां रुजगार मिलै कोनी'',, में भी वर्ग संघर्ष की धारणाओं का स्पष्ट पता लग रहा है।  क्या यह आलोचकों की चार सौ बीसी है कि जिस तरह से कालविभाजन या प्रवृत्तिमूलक दर्शन का संयुक्त आधार रूप में मार्क्सवादी कविता का मौजूदा कोई विवरण है तो बताएं कि कहां है- या वत्सलनिधि के बजट की पाण अभी उतरी नही है।

इसी एक छोटी मगर बहुत बड़ी और गंभीर कमी या साजिश या कपटपूर्ण मूल्यांकन या जो भी कारण रहा हो के चलते भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (भाकपातब जब संशोधनवादी नही थी) तेलंगाना सशस्त्र  महान  किसान उभार के दौरान या उसके थोड़ा बाद में आए बदलाव या प्रभाव जो लोक भाषाओं और कविताओं में स्पष्ट दिखता है को नकारा नही जा सकतायहां उदाहरण देखिए:-

रै उठो किसानां मज़दूरां

थे उंटा कस ल्यो आज जीन

इं नफा खोर अन्याय नै

कर दयो कोडी रा तीन तीन

मनुज को हम किसी पार्टी या संसद गामी विचार के साथ नही जोड़ सकते हैं- यह तो उनकी कविताओं में ही साबित हो जाता है कि डेमोक्रेटिक या सोशलिज़्म या सर्वहारा अधिनायकत्व आदि में नहीं बल्कि उनका रुझान- मार्क्सवाद की तरफ ही रहा। सामंती और नव पूंजीवादी सत्ताओ का मुखर विरोध लेकिन इनकी रचनाओं में गहन चिंतन का बीज भी इसी आक्रोश और नकार के साथ आया है - इसलिए अब इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नही कि मनुज देपावत राजस्थानी साहित्य के पहले प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कवि थे- और यही से उस एक बेहतरीन श्रंखला का राह बनता है जो मार्क्सवादी इंकलाबी कविता का उत्स और पसराव दोनों ही है। भले ही यह कुछ जगह  गहन लोक रंजकताओं का बीमार सामंती रूढ़ हुए किसी शब्द को ले आते हैं मगर स्थापित नही करते हैं।

भारतीय इतिहास में राजस्थान का वर्णन अवश्यम्भावी है। इतिहास की हर एक बड़ी घटना के साथ राजस्थान का गहरा संबन्ध रहा है। और उसमें में मानवद्रोही दैत्य प्रवृतियों का बहुतायत में आंकड़ा है। मुगलों की गुलामी से लेकर अंग्रेजो की झूठी बोटी खाने वाला यहां का सामंतवादी तबका अनेक  वर्षों तक यहां की मेहनतकश जनता  के टुकड़ो पर पलता रहा था। हालांकि थोथा घमंडजातीय  उच्चता का भाव और बहादुरी के मनगढ़ंत किस्से ही बस उनके हिस्से थे।  और इसी सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त तत्कालीन चारण कवियों का काव्य था। कुछेक को छोड़करजबकि मनुज देपावत राजस्थनी कविता की घोरअमानवीयबर्बरझूठी सामंतशाही दरबारों की कविता परम्परा से आने के बाद भी वे एस्थेटिक सेंस का कल्चरल लेवल पर प्रयोग करते थे। कह सकते हैं कि उनका संबंध राजस्थनी सामंतवादी कविता की बीमार धारा का मुखररेडिकल विरोध करके खत्म करने से था। लेकिन इनकी रचनाओं में जातीय चिंतन का अभाव है इसलिए खलिस मार्क्सवादी इंकलाबी कविता का उत्स है।  सामाजिक उत्पीड़न के प्रति अदम्य विद्रोहलोकमानस से अथाह रागशोषणपरक सामाजिक व्यवस्था को आमूल-चूल बदलकर समतामूलक समाज निर्माण और वक नया और महान महामानव की मुक्ति गान है। क्रांति के ज़ज़्बे से ओत-प्रोत थे। उसने  साहित्य और विशेषकर लोकपखी कविता के सौंदर्यशास्त्र को गहरे से प्रभावित किया।

एक बात यह भी गौरतलब है कि कुछ कवि राज दरबार और सामंतों के प्रभाव या छाया में नहीं थेइसलिए उनकी कविता में जीवन की धड़कन स्पष्ट सुनी जा सकती है। मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे प्रतिरोध की मार्क्सवादी अवधारणा को कविता में ढाल कर मुक्ति के गीत गाया करते थे। उनके मन मे इस सामंती व्यवस्था का विध्वंस करके एक नया राज्यमेहनतकशों का स्टेट सृजन की बातें यूँ ही नही आई बल्कि '1925 ई. में एम.एम. रॉय और दूजे साथियों ने मिल कर भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का गठन कर लिया था जो सदी के तीसरे दशक के आसपास शेखावाटी के किसान समूहों को काफी प्रभावित कर ही थी।


और उधर मनुज के मन मे प्रचंड प्रलंयकारी आग धधक रही थी जो सिर्फ सृजनधर्मिता ही नहीं बल्कि आक्रोश की भी उत्प्रेरक थी। यही बात हम आगे बढ़ेंगे तब रेवंतदान चारणऔर सत्तर के दशक के मुख्य कवि तेजसिंह जोधा और पारस अरोड़ा की कविता ध्वनि में देखेंगेउसी बात के साथ कि इनकी विचारधारा यहां महत्व नही रखती बल्कि कविता का सुर बहुत महत्वपूर्ण होता है।

 

अगर मनुज की कविताओं का द्वंद्ववादी विश्लेषण करें तो यह एक नई परम्परा का उत्स होगा लेकिन समस्याएं बहुत है जैसे मार्क्सवादी विचारधारा में किसी रचना को समझने के लिए वस्तु तथा रूप के संबंध को समझना आवश्यक माना जाता है। इसके अंतर्गत लेखक क्या कहता है तथा कैसे कहता है- पर जोर दिया जाता है-- जिसमे एक तटस्थ तीसरा पक्ष भी होता है लेकिन यहां मनुज की कविता में या कहें दर्शन में ऐसा नही मिल पाया।  अब जब ये पंक्ति सामने है इसलिए उन्होंने धोरों की जनता को जागने का आह्वान किया -

धोरां आळा देस जाग रैऊंठा आळा देस जाग।

छाती पर पैणां पड़्या नाग रैधोरां आळा देस जाग।।

बड़ा कारण सामाजिक विषमता और मानव की परतंत्रता थी।

इन सभी स्थितियों से दुःखी होकर मनुज ने अपने काव्य में विद्रोह का स्वर गुंजाया।

मानव को कायरता से जगा कर नए युग निर्माण की प्रेरणा देने का काम मनुज की कविताएं करती हैं। उनकी दृष्टि में वे सब परम्पराएं मृतप्राय हो गयी हैं और अब उनके मोह में फंसे रहने की आवश्यकता नहीं है। शोषकों एवं उत्पीड़कों के प्रति

जीवन बोध की अनुपस्थिति के यासंवेदनहीनता और शुष्कता के  यातना-शिविर में  उम्मीदों और स्वप्नों को बचाकर अपने वक्त की तमाम सरगर्मियों और जोखिम के साथ ढलना भूलते नहीं है। मंगाए सामाजिकराजनीतिक अपरिपक्व सोच और अराजक जीवन शैली इन्हें पेशेवरों की श्रवणी में जाने नहीं देती। भूमि हीनसीमांत किसान और सर्वहारा मुक्ति के गीत एक अस्मितासंघर्षशील मूल्यों  और समझौता विहीन प्रतिबद्धता सबसे जरुरी है।

मानव खुद अपना ईश्वर है,

साहस उसका भाग्य विधाता।

प्राणों में प्रतिशोध जगाकर,

वह परिवर्तन का युग लाता।

स्वतंत्रता की लगन उनकी अन्तरात्मा की जोरदार लगन थी। इसी आवाज को बुलन्द करते हुए वे कठपुतली शासकों को सम्बोधित करते हैं-

वां कायर कीट कपूतां की,

कवि कथा सुणावण नै जावै

अम्बर री आंख्यां लाज मरै,

धरती लचकाणी पड़ जावै

जद झुकै शीशनीचां व्है नैण,

धरती रो कण-कण सरमावै।

इसी तरह उन्होंने सामंतशाही  की नीतियों की भयानकता का पर्दाफाश किया तथा शोषण और अन्याय के खिलाफ मजदूर-किसानों को संघर्ष का संदेश दिया। यह संदेश आज भी जन-आंदोलनों में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। व्यवस्थागत असमानता के लिए-

रै देख मिनख मुरझाय रह्योमरणै सूं मुसकल है जीणो

ऐ खड़ी हवेल्यां हंसै आजपण झूंपड़ल्यां रो दुःख दूणो

ऐ धनआळा थारी काया राभक्षक बणता जावै है

रै जाग खेत रा रखवाळाआ बाड़ खेत नै खावै है

ऐ जका उजाड़ै झूंपड़ल्यांउण महलां रै लगा आग।

यही प्रबल भावना उनके सामाजिक एवं साहित्यिक कार्यों से फूट-फूटकर निकल पड़ती दिखाई देती है। उनकी लेखनी समाज के शोषित जीवन को चित्रित करना अपना उद्देश्य घोषित करती है।

सभी स्थितियों से दुःखी होकर मनुज ने अपने काव्य में विद्रोह का स्वर गुंजाया।


मानव को कायरता से जगा कर नए युग निर्माण की प्रेरणा देने का काम मनुज की कविताएं करती हैं। उनकी दृष्टि में वे सब परम्पराएं मृतप्राय हो गयी हैं और अब उनके मोह में फंसे रहने की आवश्यकता नहीं है। शोषकों एवं उत्पीड़कों के प्रति । बहुत बुरा है कि एक महान इंकलाबी कविता और कवि को मार्क्सवाद के तौर पर नोटिस ही नही किया गया..... जबकि वे वाम राजनीति में इतने पारंगत थे कि सामंतशाही की हर उस मानवद्रोही शय को पकड़ लेते थे जो हुक्काम की नफरत का कारण बना है।  उनकी रचना भावनात्मक अंधी में उठते हर एक भाव का उपयोग करती है। हालांकि उस समय हिंदी में   नई कविता का दौर आया नहीं था मगर मनुज की भाषा और शैली नई कविता की परछाई का आभास देती थो। उनकी भाषा कलवाद और छायावाद की बीमार शाश्वत मगर अनैतिक सॉफ्ट फ़ासिस्ट वैल्यूज़ और उसके  अमूल्य के अलौकिक स्वरूप का विरोध करती है। यह कितनी बड़ी और समृद्ध राजनीतिक समझ का नतीजा है कि जन विरोध वहां हिमायत में उपस्थित रहता है। यथा :-

वह राग बेबसी का उठतामहफ़िल के मधुर निनादों में ! हे गाँवतुझे मैं छोड़ चलालाचार भरे इस भादों में ।

तभी तो समाजराजनीति और लोक की स्थितियों को पकड़नेे में सफल रहें। उस कला विरोधी दौर में भी वे जिस ठोस जमीन पर खड़े होकर विप्लव के गौरव गान थे उस कविता विरोधी मानव द्रोही दौर में एक विद्रोही स्वर और मुक्त आवाज के नाते एक मुक्तिकामी युवा रूप में इनकी पहचान रही हैं। इनकी कविताओं में प्रतिबद्धता के मूल्यों का सभजसरल समावेश होता है।

दरअसल जब काव्य भाषा का प्रश्न आता है तब।  साहित्यिक भाषा नामक शब्द मुखरित होता जाता है। केवल व्यंजना ही नहीं बल्कि रंजकीय गुणों के साथ लौकिक भाषा पक्ष। सहजजायज प्रतिरोध उच्च स्तरीय भाषा अभिज्ञान के कारण ही टिकत है।

आम  बोलचाल में राजस्थान का सामंती परिवेश बाहरो बाहरी ही फलत चलत है बाकी पोलिटिकल प्रतिबद्धता को कभी समझा ही नहीं गया है। वह अलौकिक साधन बन चुके भावों का नकार बन कर जन स्वीकार रुपक बन गया है।

"फिर भी वे अपनी सत्ता काकुछ सार जमाने वाले हैं !

कंगलों के झूठे टुकड़ों परअधिकार जमाने वाले हैं !

यह मानव की दुनिया कठोरयह मानव का संसार

राजस्थान की समकालीन युवा कविता दशा और दिशा

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राजस्थान की कविता हिंदी और राजस्थानी की खासियत रही है कि आप जिस जिस काल के कवि को पढ़ रहे हैं या जिस प्रवृति या विचार या आधार की कविताओ या कवि डायरी या उपलब्ध जो भी विषयवस्तु हो या विधा हो- हर एक का कोई ना कोई आधार गांवों से जुड़ा मिलेगा। यह बुरा नही हैशायद जड़ों की तरफ लौटने की प्रक्रिया है- जरूरी भी है मगर एक हद तकलेकिन हम इस आत्ममुग्धता से नक्को नक्क भरे हुए- भूल जाते हैं कि कविता का पहला सकारात्मक असर मानव द्रोही या जीवन को अपमानित करने वाले प्रदूषकों के इलाज से शुरू होता है। जबकि द्वंद्ववात्मक या वैज्ञानिक तर्कणा के अभावनासमझी या आत्मालोचना की कमी के चलते हमने कविताओं में गांवों का वो सत्यानाश किया है कि इन कविताओ को पढ़ने का मन ही नही करता है।

किसान (सामंतवादी कुलुक) के शोषण और जनद्रोही व्यवहार को जाने बिनास्त्री विरोधीश्रमिक या जीवन के द्रोही उसके वर्ग को महिमामंडित करके जिस तरह से पेश करते हैं वहां हमे सोचना पड़ेगा कि क्या हकीकतन गांव का आदमी कठोर जीवन शैली या मेहनती है- झुग्गियों में तो जीवन और संघर्ष शायद है कि नही- नरोदवाद मानवद्रोहियों के कुकर्मो से विश्व इतिहास के जनांदोलनों में कुलुक किसानी दुष्कर्मोपाप कर्मों और गद्दारी से हर्फ डर हर्फ भरे हुए मिलते हैं। हम श्रम विभाजन के नियम जानने होंगे और फिर मूल्यांकन के माध्यम से पुनःविचार भी करना होगा कि यह कढ़ी जो घोली हैइसका समाधान कैसे करें????

अब साहित्य में नरोदवादी अमानवीय अवमूल्यों के साथ आने लगा है।   क्या सच मे हमारा जुड़ाव जन से इसी भांत है क्या सच मे हम गावों के अतिशय महिमामंडन की धूप में उसके जीवंत रूप को मार रहे हैं ???

इसमे कोई दो राय नही कि इस विषयक कुछेक कविताएं बेहतरीन होती हैमगर एक हद तक। इनका नजरिया भी बेहतरीन हैमगर रचाव के समय जो समस्या ज्यादा उभरकर आती है- वो विचारों और स्थितियों और दीठ के साथ न्याय नही कर पाने की कमजोरी और बौद्धिक चालाकीअक्सर हम बौद्धिक धूर्तता को कलाओं के साथ रखते हुए प्रतिबद्धता के दृष्टिकोण का गलत अंदाजा लगाकरअमानवीय अपसंस्कृतिक अवमूल्यों को नैतिक मूल्यों के रूप में स्थापित करने के मानवद्रोही काम को जो अक्सर वैचारिक कमजोरी के चलते अनजाने में हो जाता हैऔर जानबूझकर भी... स्थापित करने जैसा काम कर देते हैं।

यहां बात अपरंच में छपी ओम नागर की कविताओं को पढ़कर जरूर हरियल हुई हैमगर वे इस विचार के बीच नही हैं-   यहां तो पूरे समकालीन राजस्थानी युवा रचाव का बहाव ही लोक और जीवन के उज्ज्वल पक्ष के सर्वाधिक विरोधी या कहें जीवन के विपक्षी इस संक्रामक बौद्धिक कपट के शिकंजे की तरफ है- जहां नरोदवादी कुलुक किसानी सामंतवादी अवमूल्यों और प्रवृति को या किसान को सुनामी सा तेज और विध्वंसक दिखाया जाता रहा है।

वैचारिक कपट के इतिहास में यह एक झूठ जो इस सामंती वर्ग के 'मेहनती किसान या अन्नदाताके झूठे किस्सों से हम लगाते है-- संसार का अब तक का सबसे घ्रणित और हास्यास्पद है(कभी भी किसानी जमातजिससे आपमैं और हम ज्यादातर संबंधित है - को उसके हकीकतन रूप और शब्दों के साथ मज़दूर या सिरी या भूमि हीन या सीमांत के ध्वन्यार्थ विहीन शब्दो के साथ क्यों लिया जाता हैक्या इसका कारण पता है ?? कैसे अभी भी कुछ तथाकथित मार्क्सवादी धड़ों का एजेंडा सामंतवाद को सत्ता का अंग या सामंतवादी व्यवस्था को स्वीकारते हुए पूंजीवादी व्यवस्था या पूंजीवाद की उपस्थिती से ना केवल इनकार बल्कि इसको स्थापित तक करने के प्रयासों में निरंतर लगे हैंजो पूंजीवाद के अस्तित्व को नकारने के लिए सामंतवादी शब्द पर चढ़े हुए हैं। यह अच्छा हुआ कि कुछ जिंदा लोगों ने जनसंगठनों के माध्यम से इसको साहित्यिक वैचारिक रूप खारिज किया है.... क्योंकी लोक चेतना ने इसका नकार करके श्रम की गरिमा को स्थापित किया है।) अन्नदाता के झूठ का मतलब है कि वही श्रम साधक खेतिहर। सिरी है अन्नदाताअन्नदाता सीमांत है।

 8 इसका सकारत्मक पक्ष आधार रूप स्थापित करना बेहतरीन ईमानदार रचाव के लिए जरूरी हो जाता हैजबकि कुलुक नरोदीज्म के शिकार ज्यादातर युवा इस वर्गीय आपराधिक जमात की स्थापनाओं के तमगे के साथ इसको स्थापित करने के लगातार प्रयासो के साथ आ रहे हैंआत्मघाती है यह.... और इसके साथ वे मनुष्य के सबसे बीमारू और सड़ चुके भावबोध को लेकर आते और उसको स्थापित तक कर देते हैंउस दयनीयता जिसको सिमपेथीजेनर अपनी कामयाब सृजना समझते हुए प्रतिक्रियाओं में सकारात्मक फीडबैक हासिल करके और भी तेज गति से लिखते हुए इस सड़ चुके अमानवीय अवमूल्य को स्थापित कर देते हैं। यह सचमुच बड़ा खतरा हैंदयनीयता काहम सिमपेथी मिलने को रचाव की सार्थकता मान बैठते हैं- दयनीयगरीबउजड़ासूखा हुआ आदि आदि-  और दोगलापन से भी ग्रस्त हो जाते हैं। हम आधुनिकता या अत्याधुनिकता के साथ गांव की तुलनात्मक मगर बड़ी ही बुरीभारी और बेमेल चीज़ों को अतीत के मोहपाश में बंधकर कब तक स्थापित करते रहेंगे। सीधी सी बात है कि ओम नागर गांव को याद करने की कोशिश में उसको बीमारअधमरा या संक्रामक सी सोच के चलते जाने किस तरह का अवसाद जनित माहौल बना देते हैं। आपको रोजगार में तरक्की चाहिएट्रांसफर या व्यापार या साहित्यिक ताम झामटिपटॉप बंदे का सेलेब्रेटी रूप भी रखना हैशहर को गरियाना भी है और गांवगांव का तो जाने अब किस तरह का लेखकीय जुल्म सहना होगा।

इस बात को हवा हवाई भी समझ सकते हैं यह आपकी स्वतंत्रता है- लेकिन इसके साथ ही एक और बात की अभी भारतीय इतिहास का जो सबसे बड़ा मजदूर पलायन हुआ सड़को परएक साथएक समय मेवे मजदूर जिनको रोजगार मिलावे सब के सब खेतिहरसिरीसीमांत और भूमिहीन थे जो भारतीय अर्थव्यवस्था के कींसीयन ट्रिकल डाउन थ्योरी के शिकार बनकर सीमांत  से भूमिहीन और फिर पलायन कर गए मज़दूर में बदले. जो रोटी के टुकड़े के लिए तरसता हो उस वर्ग की अनदेखी या उसको घ्रणित समझ हाशिए से बाहर रखकर कुलुक संस्कृति के बारे में लिखनामानवद्रोही हैजो साहित्यजगत में आपको स्थापित कर देगा मगरविचार ..???? .... 


इस सिद्धांत के बिना या विचार बिंदु विहीन होकर या उसको गलत स्थापित करके हम तालियांवाह वाहशाबासी तो ले सकते हैं मगर..... रचाव अंतर्मन से भी तो जुड़ा होता है।

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विषम !

दुर्बल के निर्बल कन्धों परदुस्साह जीवन का भार विषम !"

 

                             सतीश छिम्पा

 

 

 



एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...