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Tuesday, 13 October 2020

हमारे पूरोधा - (१)

 

लोक भाषाओं में हमारे पुरोधा...                                   

प्रेमचंद को या 'उसने कहा था' जैसी महान रचना देने वाले चन्द्रधर शर्मा गलेरी, या पंत, प्रसाद या भारतेंदु हरिश्चंद्र या फिर वैश्विक स्तर पर टॉलस्टॉय या बाल्ज़ाक या बाई जुई या मार्खेज.... आदि महान शख्सियत अपनी जो छब या छटा या रचनात्मक रूप गुण का प्रभाव रखते हैं वैसा ही असर रखते हैं हमारी लोक भाषाओं के महान मगर हमारी अज्ञानता के चलते अनजान बने रहने और अल्पज्ञात समझे  जाने वाले रचनाकार...... भाई वीर सिंह, मोहन सिंह, जसवंत कंवल,  गुरदयाल सिंह,  गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी आदि....... और अजमेर सिधु भाई एक अद्भुत कहानीकार जिनको  अगर मैं समकालीन पंजाबी कहानी का लीजेंड कहूँ तो भी अतिश्योक्ति नही होगी, अपनी अद्भुत कहानियों के बावजूद इस महान काम के लिए प्रसिद्ध  हैं। हिंदी जमात या कहें भारतीय भाषाओं के पाठक अगर इन महान वीरों के अवदान बाबत जो थोड़ा बहुत  जानते हैं - वो सब अजमेर भाई के मार्फ़त या कहें उनकी लिखतों के मार्फ़त अमर हुआ है हमारा स्वर्णिम अतीत।

यह तस्वीर किसी भांत के महिमामंडन के लिए नही बल्कि दो अग्रज पुरौधा लेखकों की इस तस्वीर को देखकर आए समकालीन युवा रचनाकार के भीतर उठे भाव हैं जो तुलनात्मक या मूल्यांकन के लिए नही बल्कि दो समयों के भीतर के स्पेश को जानते हुए, इनके अवदान का परिचय भर देना चाह रहा है।



हमारे पुरौधा... (१)

गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी

गुरबख्श सिंह प्रितलड़ी का जन्म 26 अप्रैल 1895 को सियालकोट में हुआ था। उनके पिता का नाम पेशावर सिंह और उनकी माता का नाम मिलणी कौर था। उनके पिता की मृत्यु हो गई जब वह केवल सात वर्ष के थे। गुरबख्श सिंह आदर्शो पर चलने वाले, सत जीवन के और सकारात्मक दीठ के सूझबूझ और उज्ज्वल जीवन के स्वप्नदर्शी ही नही बल्कि उन देखे हुए स्वप्नो को हकीकतन रूप देने वाले व्यक्ति थे।

पंजाबी साहित्य के लियो टॉलस्टॉय की तरह से दिखने और व्यवहार और लहजा जो उनका मौलिक था। किसी दरवेश की तरह का पाक साफ और काल्पनिक या मिथकीय पत्रों की तरह अलौकिक चमत्कारी भेष और उजास भरे शब्द..... पंजाबी साहित्य के इस टॉलस्टॉय के लिए लोगो का मानना था कि वे दुनिया को बर्ट्रेंड रसेल की तरह एक समुदाय के रूप में देखना चाहते थे, बेशक अव्यवहारिक, मगर मिथ स्वप्नों सा रोचक है।

मार्क्सवाद के सिंपेथाइज़र थे और इस दीठ से वे अक्सर अक्टूबर क्रांति के महान कारज और उनके तेज गति से विकसित होने की प्रभावशाली स्थापनाओं  और धारणाओं और सिद्धांतों से सहमत और प्रभावित भी थे, वे मार्क्सवाद के आर्थिक और सामाजिक समानता के इस महान सिद्धांतों के समर्थक थे। उन्होंने लोगों से जाति और रंग भेद से ऊपर उठने को कहा।

गुरबख्श सिंह मार्क्सवादी विचारधारा और सोवियत मेहनतकश व्यवस्था के बहुत करीब थे। वे पहले ही व्यक्ति थे जिन्होंने मैक्सिम गोर्की के महान रूसी उपन्यास "मदर" का पंजाबी में अनुवाद किया.... और 1971 में, उन्हें सोवियत नेहरू पुरस्कार मिला।

गुरबख्श सिंह पंजाबी में एक नई, मानव हित और प्रेमिल, मानवजनित विचारधारा को स्थापित भी किया और इस सिद्धांत पर अपने सभी कार्यों को अनुकूलित किया। प्लेटो के प्लेटोनिक प्रेम के नक्शेकदम पर चले सिद्धांतो को हल्का और धुंधला रहे भावों की तरह हटाने के बाजाए उन्नत मानवोचित स्वभावो का गांभीर्य भी स्थापित किए और परम्पराओं में थापित हुए, गुरबख्श सिंह ने प्यार को कब्जे की भावना के साथ असंगत बताया और सहज प्रेम की अवधारणा को समझाया। प्रीत झरोखा से उनके संपादकीय, लेख और कॉलम के बारे में चर्चा, जो कि प्रिटाल्डी में प्रकाशित हुई थी, पंजाब के पाठकों के बीच आम थी। स्वास्थ्य पर उनके लेख युवा लोगों में नई स्वस्थ सोच विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने सियालकोट से 10 वीं पास की थी। उन्होंने लाहौर में उच्च अध्ययन के लिए कॉलेज में प्रवेश किया। आर्थिक तंगी के कारण, उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया क्योंकि खेतीबाड़ी बहुत जरूरी थी जिसके बिना घर की तरफ देखा तक नही जा सकता था.... साथ ही आजीविका में रुपये के लिए क्लर्क की नौकरी कर ली। फिर उन्होंने सेना में भर्ती होकर इराक और ईरान का रुख किया। वहाँ उन्होंने एक ईसाई मिशनरी रेवरेंड मिस्टर स्टैंड से मुलाकात की और उनकी सलाह पर आगे पढाई जारी रखी।

उन्हें इंजीनियरिंग में उच्च अध्ययन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय में दाखिला दिलाया। उन्होंने 1922 में इंजीनियरिंग में अपनी बीएससी की डिग्री प्राप्त की। जब वह लौटा, तो उसे रेलवे में नौकरी मिल गई।

1932 में इस नौकरी से मुक्त होकर, उन्होंने नौशेरा की जगह पर जमीन ली और खेती, वैज्ञानिक ढंग से और स्थानीयता के भरपूर गहरे अनुभवों और  वैज्ञानिक तरीके की सांझ से खेती शुरू की।

एक आदर्श समाज बनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए सितंबर 1933 में एक मासिक पत्रिका प्रितलारी का प्रकाशन शुरू किया। प्रितलारी पंजाबी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक मील का पत्थर था। यह मासिक पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ साथ ही पंजाबी अदब में वैज्ञानिक, या कहें आधुनिक बदलाव बिंदु भी स्थापित किए, प्रयोगों को जमीन जो वैचारिक हो को यहां मुहैया करवाया।

उठापटक अलगावों भरे तीसरे दशक में वे मॉडल टाउन लाहौर चले गए। कुछ साल बाद, 1938 में, उन्होंने 15 एकड़ की जमीन बराबरी से लाहौर और अमृतसर के बीच प्रीत नगर की स्थापना की। 1947 में देश के विभाजन के दौरान,  प्रीत नगर निर्जन हो गया था और वे दिल्ली चले गए लेकिन वहाँ उन्हें यह पसंद नहीं आया। वह 1950 में प्रीत नगर लौट आए और उनका पुनर्वास किया और उनकी मृत्यु तक वहीं रहे।

जसवंत कंवल  (२)

भारतीय भाषाओं का बाबा बोहड़- कंवल

इधर भारतीय भाषाओं के कुछ महान लेखक जिनसे हिंदी के पाठक अभी तक भी परिचित नही है- में से एक जरुरी नाम है जसवंत कंवल। उनका चर्चित उपन्यास  - "लहू दी लौपंजाबी में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है।

सन 1967 ई में पंजाब में नक्सलबाड़ी लहर ने दस्तक दी थी। उस लहर ने कई गहरे प्रभाव पंजाब के जनजीवन पर छोड़े जो भूले नही जाते और जख्म कायम हैं। जसवंत सिंह कंवल का लिखा उपन्यास लहू दी लौभी इनमें से एक है। इसके अनगिनत संस्करणों की पाँच लाख से ज्यादा प्रतियां पढ़ी गई। 1970 के बाद जसवंत सिंह कंवल ने इसे लिखा था। जब इसकी पांडुलिपि प्रकाशन के लिए तैयार हुई तो पंजाब में इसे किसी ने नहीं छापा। फिर आपातकाल लागू हो गया था तो संभव ही नही रहा। 

नक्सलवादी आंदोलन का खुला समर्थन करने वाले कँवल ने उपन्यास 'लहू की लो' पँजाबी में इस संघर्ष के   ऐतिहासिक दस्तावेजों की तरह लिखा। इसकी पांडुलिपि को प्रतिबंधित कर दिया गया था। आखिरकार उन्होंने लहू दी लौसिंगापुर से छपवाया और गुप्त रूप से उसे पंजाब लाया गया। प्रतिबंधित होते हुए भी उस समय  ब्लैक में 700 रूप में बिकने वाला यह संसार का एकमात्र  ही उपन्यास है। पंजाब में तो बहुत बाद में यह आपातकाल हटने के बाद प्रकाशित हुआ, तब भी लोगों ने इसे खूब खरीदा और पढ़ा। लहू दी लो इंकलाबी पराक्रम और दुखांत और पंजाब के किसानों (खेतिहर मज़दूरों) के संघर्ष, उनकी मुश्किलों और उस दौर में नक्सलवाद की बहस तलब प्रासंगिकता का गान था।

'"लहू दी लौपंजाबी में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद भी खूब पढ़ा गया। बहुत सघन कृषि क्षेत्र में आर्थिक असमानता और समाज में जमीनी स्तर पर विचर कर वह उसका सूक्ष्म अध्ययन किया करते थे, इसीलिए उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज की ऐसी छवियां और परछाइयां और पहलू मिलेंगे जो कहीं नहीं हैं। लोक  की नब्ज़ पकड़ने वाला यह रचनाकार  पंजाब का रसूल हमजातोव कहलाता है। उनकी रचनाओं पर लेव टॉलस्टॉय की छाप बिल्कुल भी नही है लेकिन शायद डीलडौल और जीवन शैली के चलते उन्हें टॉल्स्टोय कहा जाता रहा है। वे सत्ता के खिलाफ जाते हुए सिख अलगाववादी आंदोलन से भी खुली सहानुभूति रखते थे ।

उनको महत्वपूर्ण रचनाओं में मुख्य है - "सत्य को फांसी, पूर्णिमा, पाली, रात बाकी है, मित्र प्यारे को, साथी, बर्फ की आग, लहू, की लौ, जिंदगी दूर नहीं चर्चित रचनाएं रहीं। उन्हें मरना है कि जीना, लहू की लौ, कहानी पुस्तक मुक्ति मार्ग, रूपधारा, मानवता, मोड़, सिविल लाइंस, जंगल के शेर, रात बाकी है, पूर्णिमा, मित्र प्यारे को, गोरा मुख्य सज्जनों का, सत्य को फांसी, देवदास, रूह का साथी, कीचड़ के कमल, जिदगी दूर नहीं, सिदूर, कांटे, हाल मुरीदों का, अपना राष्ट्रीय घर, जित्तनामा, उठो सूरमा, नए सुरमे, हाउका और मुस्कान, आराधना, भावना, जीवन आदि पुस्तकें रखकर पंजाबी साहित्य को समृद्ध किया।

कंवल की अपनी दिनचर्या किताबों, लेखन, खेतों और गांव की हथाई और चर्चाओं और लिखने की मेज पर ही शुरू और खत्म होती थी। जसवंत सिंह कंवल ने आपात काल के समय और उससे पहले नक्सलवाद व बाद में पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ अपनी कलाम चलाई। उन्होंने लहू की लौ उपन्यास में नक्सलवाड़ी महान उभार को ओजस्वी स्वर दिए थे। उस समय देश में इमरजेंसी लगी होने के कारण कोई भी पब्लिशर जसवंत सिंह कंवल की इस पुस्तक को छापने के लिए तैयार नहीं था-  ऊपर जो बताया कि विदेश में छपने के बाद जब यह पंजाब आया- तो पाठकों का रैला सा उमड़ पड़ा इसको खरीदने पढ़ने के लिए।

जसवंत कंवल एक ऐसा नाम जिसने अपनी सो साला ज़िंदगी मे  अनवरत अस्सी साल तक लिखा। और जिसको पंजाब का रसूल हमजातोव तक कहा जाता है। जो मार्क्सवादी रचनाधर्मी होने के साथ ही- लगातार निर्विरोध चुना जाने वाला शरीफ ग्रामीण सरपंच के तौर पर भी प्रसिद्ध था- यह गजब का तथ्य है कि जसवंत कंवल अनेक बार गाव के निर्विरोध सरपंच चुने गए। वे  पंजाब, पंजाबी सभ्याचार और समाज के हर उतार-चढ़ाव से बखूबी वाकिफ थे, यहीं कारण है कि उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज की ऐसी छविया और परछाइया और पहलू मिलेंगे जो अन्यत्र कहीं नहीं हैं। लोक रंग की उनकी समझ बहुत सूक्ष्म थी जो उनके किसी दूसरे साथी में  नहीं पाई गई, इसीलिए जब लोग उनको पंजाब का रसूल हमजातोव'  कहते है तो आश्चर्य नही होता।

अजमेर सिधु- वैचारिक नींव (३)

अजमेर सिद्धू ... बेमिशाल कथाकार और जीवन का चितेरा

(25 मई के दिन बंगाल से उठी एक प्रचंड लाल इंकलाबी लहर जिसने ना केवल बंगाली बल्कि आंध्रा और पंजाब को भी रंग दिया इंकलाबी रंग में... और साहित्य को इंकलाबी कविताओं और गीतों का खजाना भी दिया था।)

.....अजमेर सिद्धू ना होते तो मुमकिन नही था शायद यह खजाना सहेजना अगर मुमकिन था भी तो इस बेहतरीन तरीके से नहीं होता। अजमेर भाऊ मेहनतकश वर्ग के हिमायती रहे हैं। विचार और वर्ग सर्वहारा, के प्रति प्रतिबद्ध। ''गदर से लेकर नक्सली तक'' (शहीद बाबा बूझा सिंह जी की जीवनी), 'लालसिंह दिल, सन्तराम उदासी की जीवनी भी इन्होंने ही लिखी- ''क्रांति लई बळदा कण कण" नाम से उदासी पर गजब काम किया है। मूल रूप से कहानियां  लिखते हैं। अजमेर  के चार कहानी संग्रह छप चुके हैं।

पंजाबी साहित्य पर कम्युनिष्ट किसान उभार का बहुत गहरा और भरपूर प्रभाव पड़ा था जो आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाता है। इस इंकलाबी दौर और उसके बाद के लेखक कवि विस्फोट की तरह निकले थे। लेकिन उन तक या उनकी लिखतों तक पहुंच बनानी भी तो आसान नही थी। भले ही कोई कितना ही झूठ बोले या स्थापित करना चाहे लेकिन  आखिरकार यह स्वीकार करने में कोई मुश्किल नही होनी चाहिए कि अगर पंजाबी के युवा रचनाकार (सौभाग्य से मेरे दोस्त भी हैं।) अजमेर सिधु जी के ही प्रयासों, लग्न और मेहनत का नतीजा है कि आज हम पंजाबी की क्रांतिकारी विरासत के संतराम उदासी, बाबा बूझा सिंह और लाल सिंह दिल जैसे इंकलाबी कवियो से परिचित हैं। जसवंत कंवल ने 'लहू दी लो' उपन्यास लिखा जो इसी पृष्टभूमि पर था- प्रतिबंध लगाने के कारण वाया सिंगापुर, उस समय 600- 1000 रुपये तक के ब्लैक में बिका था, एक ही महीने में इसके सभी कॉपी बिक गई थी।

25 मई 1967-69 और 1969 से 1970 ई. तक के तीन साल लगातार चलने वाला  महान किसान उभार और संघर्ष जो 1972 ई. में खत्म हुआ अति -आत्मविश्वासी नेतृत्व और स्थितियों को समझे बिना लिए गए निर्णयों   के कारण और अन्य हुई गलतियों  के चलते वे युवा कतारें जो शहीद हुए या जो दमन और टॉर्चर के कारण हीन हो गए। या जो आए थे उभर कर कलाओं की राह से या भूमिगत जीवन से जो निकले थे। यह दुखांत था एक ऐसे क्रांतिकारी उभार का जो तेलंगाना से भी आगे जा सकता था। लीडरशिप की मूर्खताओं और  निर्णयों के चलते असंख्य युवाओ की शहादत और तसदत्त और मौत के बाद तीन साल में ही राजसत्ता के दमन से यह बिल्कुल खत्म हो गया।

पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी नक्सल लहर में पंजाब के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। मास्टर हरपाल से लेकर जसवंत कंवल और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे, वे भी शामिल हुए थे। बलदेव सिंह मान, सतनाम, अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़ और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।। उनमें से कई तो कालजई कविताओं के रचयिता  भी थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे सब जो उस समय या उसके बाद खालिस्तानी अतिवाद के शिकार हुए वे अद्भुत सर्जक निकले। सन्तराम उदासी, पाश, खटकड़ और लालसिंह दिल जैसे अनेक बेहतरीन क्रांतिकारी कवि थे। राज सत्ता और धार्मिक अतिवादी, लोकल बुर्जुआ किसी भी नक्सल को बख्शना नहीं चाहते थे।    

भयानक गरीबी, आर्थिक सामाजिक असमानता, अन्याय, शोषण कुपोषण और राज सत्ता के बर्बर दमन और अनदेखी के विरुद्ध उठे प्रचण्ड आक्रोश की लहरों के साथ इंकलाबी लाल परचम उठाए युवा क्रांतिकारियों को उस समय ताजा उठे नक्सलबाड़ी  किसान उभार से आस बंधी और वे सभी युवा जो जीवित थे, क्रांति की महिमा से वाकिफ़ थे, इस लहर में शामिल हुए। यह अलग मुद्दा है कि कुछ तानाशाही और मूर्ख नेतृत्व के कारण एक महान उभार कुछ ही समय मे दमन का शिकार होकर खत्म हो गया।

यह लहर पश्चिम बंगाल के बाद आंध्रप्रदेश और फिर पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी  थी। इसमें पंजाब सहित देश के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे।  इस क्रांतिकारी लहर ने जब तक दुःसाहस की लाइन नहीं पकड़ी तब तक यह एक खालिस मानव मुक्ति का युद्ध थी जिसमे अनेक कवि, लेखक, कलाकार, रंगकर्मी आदि खुलकर शरीक हुए और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति भी इसमें शामिल थे। हाकिम के अन्याय और अत्याचार से व्यथित होकर वे भी शामिल हुए थे।  अनेक कवियो की कविता का जन्म भी इसी समर में हुआ। हरभजन सोही, अमर सिंह अचरवाल और दर्शन खटकड़ जैसे और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।

लाल सिंह दिल जो बेहतरीन क्रांतिकारी के साथ कवि भी थे जिनका घर किसी खंडहर की तरह हो गया था। इस महान क्रांतिकारी कवि को पंजाबी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में हाशिए पर डाल रखा है। इनके अब तक के संग्रह जो मैंने मूल पंजाबी में पढ़े हैं, वे निम्न है,   'सतलज की हवा', 'बहुत सारे सूरज', 'सत्थर', और आत्मकथा 'दास्तान' (दास्तान मैंने नहीं पढ़ी अभी), हालांकि वे चर्चित थे मगर उस तरह से नहीं जिस तरह से उन्हें होना चाहिए था। जबकी पाश की प्रसिद्धि उनकी शहादत के कारण भी हुई थी। यह बाद का मुद्दा है कि किसी ने सार सुध नहीं ली। महान लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत से दोलित होकर ट्राटस्की की तरफ मुड़ जाना या उनके विरोधियों द्वारा यह कुत्सा प्रचार भी एक मुख्य कारण था।     

सन 1967-69 और 1970-71 के साल गदर मचाने वाली नक्सल लहर के बहुत ज्यादा सक्रियता और उभार के साल थे। देश के हर एक संकट की मार आम आदमी पर पड़ रही थी । सन 1967 ई में पश्चिम बंगाल से शुरू होने वाली कम्युनिष्ट लहर जो एक महान कम्युनिष्ट क्रांति में बदलने लग गई थी की देन है पंजाबी साहित्य में आमूल चूल बदलाव और जीवन और उसकी गरिमा को स्थापित करने वाली इंकलाबी कविता का उत्स जो किसी उजास की तरह से हुआ था। जबकि इससे पहले जो प्रेम और व्यक्तिगत संघर्षों के महिमा मंडन, प्यार के बीमार पक्ष मतलब निराशा, जुदाई आदि का हावी होना बहुत अश्लील था। यह अमृता प्रीतम और शिव कुमार बटालवी का दौर था।  शिव कुमार बटालवी के गीतों में प्यार के संक्रामक पक्ष, उसकी "बिरह की पीड़ाइस कदर सघन थी कि उस दौर में पंजाबी ही नही बल्कि भारतीय भाषाओं में कई बड़ी कवयित्री  अमृता प्रीतम ने उन्हें बिरह का सुल्ताननाम दे दिया था। शिव कुमार बटालवी पंजाबी का वह शायर जिसके गीत भाषाओ के बंधनों को तोड़कर आजाद हो चुके थे। पंजाब ही नही बल्कि उसकी ख्याति हर कहीं फैली थी। उसने जो गीत अपनी गुम हुई महबूबा के लिए किसी छुपे प्रेमी की तरह की इबारत की तरह लिखा था वो जब स्टेज पर होते तो अनेक फरमाइशें आती थी इस एक गीत की।

साहित्य पर कम्युनिष्ट किसान उभार का बहुत गहरा और भरपूर प्रभाव पड़ा था जो आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाता है। इस इंकलाबी दौर और उसके बाद के लेखक कवि विस्फोट की तरह निकले थे। लेकिन उन तक या उनकी लिखतों तक पहुंच बनानी भी तो आसान नही थी। भले ही कोई कितना ही झूठ बोले या स्थापित करना चाहे लेकिन  आखिरकार यह स्वीकार करने में कोई मुश्किल नही होनी चाहिए कि अगर पंजाबी के युवा रचनाकार (सौभाग्य से मेरे दोस्त भी हैं।) अजमेर सिधु जी के ही प्रयासों, लग्न और मेहनत का नतीजा है कि आज हम पंजाबी की क्रांतिकारी विरासत के संतराम उदासी, बाबा बूझा सिंह और लाल सिंह दिल जैसे इंकलाबी कवियो से परिचित हैं।

25 मई 1967-69 और 1969 से 1970 ई. तक के तीन साल लगातार चलने वाला  महान किसान उभार और संघर्ष जो 1972 ई. में खत्म हुआ अति -आत्मविश्वासी नेतृत्व और स्थितियों को समझे बिना लिए गए निर्णयों   के कारण और अन्य हुई गलतियों  के चलते वे युवा कतारें जो शहीद हुए या जो दमन और टॉर्चर के कारण हीन हो गए। या जो आए थे उभर कर कलाओं की राह से या भूमिगत जीवन से जो निकले थे। यह दुखांत था एक ऐसे क्रांतिकारी उभार का जो तेलंगाना से भी आगे जा सकता था।  चलते असंख्य युवाओ की शहादत और तसदत्त और मौत के बाद तीन साल में ही राजसत्ता के दमन से यह बिल्कुल खत्म हो गया था।



पाश और जयमल पढा, संतराम उदासी और दिल भारतीय समाज के थल्लड़े वर्ग के शोषण के विरुद्ध राजसत्ता के प्रतिरोधी तूफान की तरह खड़े हुए तो बाद में उनके संघर्षों के कवि भी थे।

एक अद्भुत कहानीकार जो पंजाबी का शोलोखोव (अक्सर मैं कहता हूँ भाई साहब को) है, अपनी अद्भुत कहानियों के बावजूद इस महान काम के लिए प्रसिद्ध हर हैं। हिंदी जमात या कहें भारतीय भाषाओं के पाठक अगर इन महान वीरों के अवदान बाबत जो थोड़ा बहुत  जानते हैं - वो सब अजमेर भाई के मार्फ़त या कहें उनकी लिखतों के मार्फ़त अमर हुआ है हमारा स्वर्णिम अतीत।

 

  सतीश छिम्पा...


एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...