सड़क पर चलते हुए, ठप ठप, टप-टप की आवाज़ें, आगे जाकर बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा,... जैसे सदियों पहले ही मर चुके हों शब्द, भाषा अलोप हो गई हो जैसे... दरख्तों, पौधों और पशु पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक लोप हो गयी हो। जैसे मर गया हो सब कुछ यहां, कुदरत का शब्दकोष जल गया लगता था। ज़बान बस बोझ थी। भाव सब अभाव में लौट लगाकर ठस गए थे।
-" प्यार...."कौन था जो बोल गया इस वर्जित शब्द को जोर से...जानता हूँ, कभी भी किसी को भी यह पता नही लगेगा।
यही कुछ चलता ही रहने वाला था मगर अचानक नज़रों ने आंखों को धोखा दे दिया, निःशब्द बात हुई, इकरार और इनकार के बीच का स्पेस भरने का काम अब नए बने शब्द करेंगे, जब कभी वे बन गए तब.... वे दो बड़ी बड़ी काजल लगी आंखें, जो घनघोर उदासियों में भी उदास होना नही जानती थी। एक शरारत, प्यार करने को ललचाई और नश्याई आंखों में निमन्त्रण भरी मुस्कुराहट का तिलिस्म, नीचे के होंठ की शेप जो बाद में पता चलता है कि ये सब उसकी कुदरतन खूबसूरती है।
बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा टूट गया, कल...कल...कलकल बह निकला,... शब्द जो लगता था कि मर गए, जीवन के गीत गा रहा हैं, अलोप हो गई भाषा मुखरित होकर अखर रच रही है .. दरख्तों, पौधों और पशु -- पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक हवाओं के शीतल वेग के साथ लौट रही हो। भाषा जो हर कहीं खत्म होने और लोप होने के खतरों से जूझ रही थी, उसकी हंसती आंखों के शब्दों को उधार लेकर बचा लिया है भाषा ने अपना अस्तित्व।
शब्दकोष सीने से लगाकर, जीभ को बोझ मुक्त करके एक गहरे और सघन चुंबन के साथ बाइज्जत बरी कर दिया गया है। वो गहरे समन्दरों से मुट्ठी भर मोती ले आती थी। वो एक जो इस धरती की मिट्टी की पैदाइश नही लगती थी..... प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। जिसकी एक छब देखने को इच्छाओं की भी इच्छाएं तरस जाती है। कामनाएं, धारणाएं, इच्छाएं सब की सब भटक कर निरर्थक हो जाती है।
वो अब कहाँ है..... कहाँ हैं अब वो लड़की.....?
● सतीश छिम्पा

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