मुक्तिकमी लोक

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Wardha, Maharashtra, India

Sunday, 18 October 2020

आवारा की विदर्भ डायरी

आवारा की विदर्भ डायरी -
                           ● सतीश छिम्पा

पाप मुक्ति  का पन्ना  :- ना कहानी, ना किस्सा बस अवसाद ही अवसाद.....
          
 सड़क पर मिले एक पोस्ट कार्ड पर लिखी ये कुछ पंक्तियां, महज़ पंक्तियां नहीं है ।
और तुम्हारी मौत, इस पूरे शहर की मौत होगी

हॉवर्ड फ़ास्ट के उपन्यास शहीदनामा के उस पात्र द्वारा कही गयी ये बात इन दिनों मुझे बहुत याद आ रही है जिसको अगले दिन फांसी दी जानी थी कि "मैंने पाप किये हैं मगर मैं अपराधी नहीं हूँ", अपराध के लिए सजा कानून देता है मगर पाप के लिए व्यक्ति का भीतर, उसका जमीर, उसकी अंतरात्मा सजा देते हैं। पाप मुक्ति के लिए मुझे किसी पंडित, मौलवी या पादरी की जरूरत नहीं है और ना ही किसी भंते की जरूरत है क्योंकि जो पाप मैंने तुम्हारी भावनाओं के खिलते हुए फूलों से खिलवाड़ करके किया है उसके लिए मेरा भीतर कळप रहा है, तुम्हे ही आवाज़ दे रहा है कि आओ और आकर मेरी प्रीस्ट बनो, या शायद नहीं, आओ और आकर मुझे इस बेचैनी से मुक्त कर दो, इस पाप से मुक्त कर दो, और हंसते हुए कहो कि अब फिर से ऐसा मत करना, और देखना फिर कभी मैं वैसा नहीं करूंगा। 
   
                                                 तुम्हारा शेखर

      शेखर जब एक शाम घूमने निकला तो कॉलेज ग्राउंड में उसकी मुलाक़ात अन्ना कारेनिना से हो गयी थी, वो एक साधारण मुलाक़ात थी, जिसका इतिहास में कोई जिक्र नहीं होना था, या एक ऐसी मुलाकात जो रूटीन में किसी से भी हो सकती थी, मगर उस मुलाकात में एक ख़ास बात थी, बहुत ही ख़ास, और ये ख़ास तब हुई, जब  अन्ना ने शेखर से कहा, "तुम्हारी काली आँखों में लाल सा कुछ है। ऐसा लाल जो जल्द ही तुम्हारे समूचे व्यक्तित्व को ढक लेगा।"

            शेखर आजकल अन्ना को खोज रहा है।

       ये गुलाबी से दिन थे जब शेखर पर लाल रंग का सुरूर चढ़ रहा था। उन्हीं दिनों एक बार बीकानेर रोड़ पर के एक चाय के ढाबे पर उसकी मुलाक़ात एक ऑवरकोट पहने दढ़ियल से मेले कुचैले शख्स से हुई थी, जिसकी ठहरी हुई सी गम्भीर आवाज़ में दुनियां भर का विद्रोह दबा हुआ था, समूची दुनिया की पीड़ाओं का घोल बनाकर पी गया हो जैसे, यह एक ऐतिहासिक मुलाक़ात थी, इतिहास के पन्नों में जिसका जिक्र ख़ुद भविष्य करेगा, क्योंकि उस शख्स ने कहा था, "शेखर, तुम्हारी तमाम ज़िन्दगी बेचैनी में गुजरेगी, सुकून कुछ एक पलों का होगा.. और तुम्हारी मौत, इस पूरे शहर की मौत होगी......."
       -"वो लड़की जो दरख्तों, पौधों और पशु पक्षियों की भाषा जानती थी, जो उछल कर एक छलांग में आसमान से मुट्ठी भर तारे तोड़ लाती थी। वो एक लड़की जो हाड़ मांस से नहीं बल्कि  प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। वो जो असंख्य गौरैया के संगीत से इस समाज, वर्ग और देश को सजा देना चाहती थी। कहाँ है अब वो लड़की जो जिसकी आंखों में मचलते थे नये समाज और मनुष्य के सपने।""
           दिल की, भीतर के कहीं गहरे भावनाओं के संसार की तड़फ, हर कोई नहीं जान पाता है । कहाँ जानता है ये जमाना कि उस एक लड़की के नाक के बिल्कुल ऊपर जो छोटा सा तिल है, उसमे बहुत गहरा और सघन तिलिस्म है। वो जब भी नीली जीन पर फिट-न-फिट डार्क मूंगिया या धारीदार चेक की बुशर्ट पहन कर आती तो मेरे भीतर भावुकता किसी सुनामी की तरह उठने लग जाती। वो औसत कद की दोलड़े हाडों वाली और गौरा- गुलाबी रंग वाली, तीखी नाक जो सिरे पर एक कट के कारण बेहद ख़ूबसूरत बन गया था। आंखे जैसे किसी शांत झील में उतरते चाँद की प्रतिमूर्ति हो। आवाज़, मन करता कि बस वो ही वो बोले, हम सुनते रहे लगातार और वो चुप ना हो, शब्द वहां अर्थों की सन्धि के मोहताज नहीं रहते हैं। वो लटूम जाते हैं उसके अस्तित्व और बिना बात की बात से। जब भी वह हंसती तो ऊपर का होंठ जो बहुत प्यारी शेप में था- ऊपर जाकर सिमटकर पतला सा हो जाता। वो इतना प्यारा था कि जो भी उसको देखता, अपना सब कुछ उसी पर वारने को तैयार हो जाता।  ठेठ ग्रामीण किसान परिवार में जन्मी संस्कृति चौधरी (नाम बदला हुआ है) को हिंदी बहुत अच्छी नहीं आती थी। जब भी वो हिंदी बोलती तो मायड़ भाषा राजस्थानी से शब्दो को उधार ळे लेती और हिंदी राजस्थानी मिक्स भाषा बोलते हुए, भाषा का कचरा कर देती थी मगर बोलते समय इतनी खूबसूरत लगती कि उसकी इस कमी की तरफ कोई ध्यान ही नहीं देता था।

मैं  राजस्थान लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी उसी बैच में जाकर करता था, जिसमे वो थी। जब वो पहले पहल क्लास में आई तब हम सभी दस मिनिट बाद होने वाले टेस्ट की तैयारी के जुटे थे। कमरे में बड़ते ही मेरी नज़र उस पर पड़ी और बस पड़ ही गई थी। जैसे जम गई हो उसके चेहरे पर मेरी नज़र। मैं एकटक, एक पलक उसको देखता रहा, टेस्ट देना भूल ही गया था। हालांकि मेरे पचास में से सैंतालीस नम्बर आए थे। उस दिन पहली ही बार क्लास में मेरा पहला नम्बर आया था और जब सर ने मुझे संबोधित करते हुए तारीफ पर तारीफ की, जिसे सुनकर फूल कर कुप्पा हो गया था।

अब मैं निश्चिंत था कि एक तो इस लड़की को मेरा नाम पता लग गया और दूसरी उसकी नज़रों में मैं एक साऊ, शरीफ़ और पढ़ाकू लड़का बन गया था।

अब हम अक्सर ही कोचिंग क्लास में एक दूसरे के सामने बैठेते थे। हमारी नज़रे एक दूसरी से हाथ मिलाती और इशारों में हाल चाल पूछती।  संस्कृति चौधरी के पिता किसी कॉलेज में  एसोसिएट प्रोफेसर थे। जाहिर है कि उनके जीन का असर संस्कृति की आदतों और पसंद नापसंद पर भी पड़ा ही था।

करीब महीने भर तक हम दोनों एक दूसरे को आंखों ही आंखों में नज़रों से चूमते, सहलाते रहे। एक भावुक दृश्य जब भीतर पैठ जाता है तो अपने आस पास का उजाड़ भी हरियल चमन की तरह लगने लगता है। 

उस दिन मैं किसी कारण से  कोचिंग में जा नहीं सका। मुझे मालूम था कि वो एन सही शाम के पांच बजे पुराने हाउसिंग बोर्ड कॉलोनो के पानी की टँकी के पास खड़ी अपने बड़े भाई का इंतज़ार करेगी। बस फिर क्या था। मैं पहुंच गया उस मायावी हुस्न के महासागर के पास।"

मुझे नही पता था कि वो भी मुझे पसंद करती थी (बिल्कुल देसी लुक था मेरा, इसलिए शंका हुई) इसिलिए तो मेरे कहने केे साथ ही फ्रेंडशिप का प्रपोजल स्वीकार लिया और 'मैं भी यही कहना चाहती थी', कहने के बाद, " सिर्फ अच्छे दोस्त ही बने रहेंगे, इसके आगे का सोचना भी मत।'

 हमने एक दूसरे के नम्बर लिए और हो गया हमारा संवाद स्थापित हो गया। हम अक्सर रात को एक या दो बजे तक मोबाइल से बात करते रहे। एक दूसरे के सानिध्य के इतने ज्यादा निर्भर हो गए कि जिस भी दिन शहर में नेट या मोबाइल सिम बंद होती थी तो उस दिन हमारी बातों का उतरता नशा तोड़ में बदल जाता औऱ हम किसी समेक एडिक्ट की तरह व्यवहार करने लगते। ये वे नशीले और खुशबूदार प्यारे दिन थे जब हम लोग हर रोज शाम को खेजड़ी मन्दिर के पास वाले धोरों पर जाते और घण्टों वहां बैठे रहते। बहुत बार ऐसा भी होता कि जब वो मुझे याद कर रही होती यो उसी वक्त मैं भी उसकी नश्याई आँखों की शराब पीने के जुटा होता था।

शहर में बदल रहे इस कस्बे की कोई ऐसी गली नही बचो थी कि जो हमे पहचानती ना हो। हर गली, हर दीवार पर हमारे रिश्ते की घोषणा छपी होती थी।

एक बार दिसम्बर की एक भयंकर सर्द रात को एक बजे उसका मैसेज आया, "हमारे घर की पिछली दीवार के पास आकर मैसेज करना, अर्जेंट, अभी आओ, 

मैंने आव देखा ना ताव, जैकेट पहनकर निकल पड़ा। पांच  या दस मिनिट बाद उसको सूचना दी तो वो दीवार पर आ गई और मैं कुछ कहता इससे पहले ही उसने एक डोलू मुझे पकड़ा दिया, 'इसमें खीर है,मैंने बनाई है।", और जल्दबाजी में वहां से जाने को मुड़ी ही थी कि मैंने अपनी दोनों हथेलियों के बीच उसका चेहरा लेकर होठों का बहुत गहरा, सघन और संपूर्ण चुम्बन ले लिया और फटाफट घर की और चल दिया। रास्ते मे उसका मैसेज आया, "साले हरामजादे कुत्ते नीच, मैंने भाइयों से कहकर तेरी ऐसी तैसी ना करवा दी तो जाट की जाई ना कहना।", मैं भयभीत था। डरते डरते उसको 'सॉरी', रिप्लाई किया।

- "कोई सॉरी सूरी नहीं है भोसड़ी के हरामी ठरकी, चल दफा हो चूतिए।"
 उस रात बाकी की तमाम रात मेरी जाग कर इस फिक्र में कटी कि सुबह उसके भाई कहीं घर आकर ही ना लड़ाई कर ले, हालांकि लड़ाई लुडुई की बात पर मैं विचलित नहीं था, ये तो हम अक्सर ही कॉलेज या ग्राउंड में करते झेलते ही थे। दिक्कत उससे ब्रेकप और बात को घर में किसी को बताने के बाद जो मेरी बेइज्जती होनी थी और इज्जत का जो बलात्कार होना था, उसका ख्याल प्रचण्ड रूप से मुझे झकझोर रहा था।

  भय और अकेलेपन से जूझता मैं दो दिनों तक हर रोज रात को बहुत देरी से घर में घुसता था। जाने कब क्या कांड करवा दे, गुस्सेल और स्वाभिमानी लड़की जो ठहरी।

      एक ऐसी ही सुनसान रात में जब मैं दो बजे घर मे घुसने ही वाला था कि मोबाइल मैसेज आ गया।, '"अभी, इसी वक्त पिछली दीवार पर आ, जल्दी।''

मैं कुछ बोलता मगर बोल नहीं पाया, और भाजकर दीवार के पास अंधेरे की ओट में खड़ा हो गया, जहां दूसरी तरफ से एक बहुत फैले हुए दरखत की छाया उस अंधेरे को और ज्यादा गहरा और गहन बना रही थी। वो आ गई। अब हम दोनों दीवार पर आमने सामने खड़े थे। चुप चाप, निःशब्द, किसी मरघट की सी उदास इस कंटीली चुप्पी मेरा काळजा धड़...धड़ाधड़... धड़ की तरह ही भय का भूकम्प उठा रहा था। मैं बोलना चाह रहा था मगर मेरी जीभ सूखकर जैसे ताळवे से जा चिपकी हो। शब्द भीतर ही भीतर भ्यां कर रहे थे कि अचानक उसने मेरा चेहरा पकड़ा और उसी तरह का बहुत गहरा मादक चुंबन मेरे सिगरेट से काले हुए होठों को बहुत बारीकी और कोमलता से चूम लिया। जा
"सॉरी शेखर, तुमने किस ही तो किया था और मैं मूर्ख तुम पर गुस्सा गई थी।" उसने कहा तो मेरे भीतर का भय प्यार और स्नेह की चाशनी में डूबकर मधुमय बन गया था। उस जादुई अहसास को मैं अपने दिल के भीतर भावों की तिजोरी में सजाकर रख लिया था।

अब हम लोग हर रोज उसी दीवार पर लटक के एक दूसरे को घण्टों चूमते रहते, तब तक जब तक कि हमारे होंठ रूखे और सूखे होकर जलने ना लग जाए।

एक दिन जब मोहल्ले में जागरण था और उसके घर के सभी लोग उसमे शामिल होने चले गए, तो उसने मुझे उसी तरीके से बुलाया और फिर अपनी तरफ नीचे उतरने को कहा। मैं डरते हुए उतर गया, मगर फिर सहज हो गया देखकर की वहां पिछवाड़े पशुओं के लिए बने गेराज टाइप कोठे में हम मिलन सुख ले सकते हैं। हम सुबह 5 बजे तक उसी गैराज में एक दूसरे के भीतर के तिलिस्म को पढ़ और छूते रहे।

अब हम रोज दीवार पर मिलने की बजाए उस कोठे में मिलते जहां एक बुरी तरह टूटी चारपाई हमारे लिए सुख सेज बनकर आराम  देती थी।

करीब साल भर चली इस प्रेम की प्रेमिल कहानी का अंत भी इसकी शुरुआत की तरह दोगाचिंति में ही हुआ।
हम दोनों को ही नहीं पता था कि हो क्या रहा है। हमे इससे कुछ मतलब ही नहीं था मगर मतलब होना चाहिए जरूर था। अराजकता और जल्दबाजी में मैं कुछ विशेष नहीं सोच पाया था। वैसे भी होनी को कौन टाल सकता है। यह दिसम्बर के अंतिम सप्ताह का कोई बहुत ही सर्द दिन था जब मैं अपनी शैलिनी वूडली या कभी कभी नताली पोर्टमैन भी कहता था, मिलने, एक सम्पूर्ण मुलाकात की उम्मीद में गया। हम दोनों अभी एक दुसरे की बाहों के गर्म लावे से गर्मा ही रहे थे कि आहट सुनकर उसने उसी वक्त मुझे धक्का देकर फटाफट भागने के लिए कहा, मैं दिवार पर एक ही छलांग में चढ़ गया और एक भयंकर सरसराहट के साथ बहुत ही तेज गति से मारा गया लट्ठ, निशाना चूक कर दीवार पर लगा, इतना तेज की पक्के रद्दे की ईंट भी हिल गई। कूद कर घर की विपरीत दिशा में दौड़ता हुआ मैं पसीने पसीन हो गया था, मगर कदमो में जैसे बिजली आ गई हो और मैं दस मिनिट बाद एक टूटे खण्डकर के अंधेरे में जा दुबका था। बड़ी मुश्किल से सुबह हुई और घर जाकर लेट गया, भय था कि उन लोगो ने मुझे पहचान ना लिया हो, वे घर तक ना आ जाए। इसी सोच के साथ मुझे नींद आ गई और जब जगा तो संस्कृति का ही मेसेज था। 

- "फिक्र मत करना, तुम्हे उन्हेंने नहीं पहचाना और हॉकी स्टिक से मार खाकर भी मैंने तेरा नाम  नही बताया।
    मैं दुख, ग्लानि, पीड़ा और अकेलेपन का एक साथ ही शिकार हो गया, बेहद शर्मिंदगी भी। तीन दिन बाद सीधे उसके घर की गली में पहुंच गया।
       मैं उस दुख, तकलीफ और पीड़ा से एकदम हिल सा उठा था जब उसी गली के एक मित्र जोगिंदर रंधावा ने बताया कि उसकी तो कल शादी कर दी, तुम तो जानते हो कि किसान वर्ग में लड़कियां मिलती ही नहीं है, इसलिए लपक लिया रिश्ता प्रोफेसर साहब ने।  ज्यादा खर्चा नहीं किया बस चुन्नी चढा कर व्हीर कर दी गई है। हाथों हाथ ही रिश्ता पकड़ लिया और भेज दी गई। 
    मैं जैसे किसी बहुत ऊंची पहाड़ी से नीचे खाई में धकेल दिया गया हूँ। गश खाकर गिरने ही वाला था कि खंबे को पकड़कर कुछ देर रिलैक्स हुआ और टूटे दिल के साथ घर की तरफ चल दिया।
   एक बहुत पवित्र और महत्वपूर्ण रिश्ते का यूँ बिखर जाना मेरे लिए बहुत पीड़ादायक था।
  अभी मैं उसको भूल कर उबरने ही वाला था कि उसका मैसेज आ गया, हाउसिंग बोर्ड कालोनी की तरफ आओ अभी के अभी। मैं चला गया, मगर वहां अफसोस के अलावा कुछ था ही नहीं । सब ठीक है के अंदाज में मैं जाने ही वाला था कि उसने कहा, "शादी हो गई तो क्या हुआ, हम अब भी पहले की तरह आसानी से रातें बिता सकते हैं।।"
   हालांकि मैं इतना भी ईमानदार नहीं हूँ जितना तब हो गया था। मैंने उसकी तरफ देखा और मुस्कुरा दिया, "नहीं यार, किसी को धोखे में रखकर मुझसे प्यार का निभाव नहीं हो सकेगा।", और फिर घर की तरफ निकल गया। हम दोनों के बीच लम्बा मोन पसरा और फैलता ही रह गया। वो जैसे परिदृश्य से गायब ही हो गई हो। 
  पर फिर एक दिन अगस्त की बीस तारीख को वो मेरे घर आई और एक नाजुक मायावी तासीर के तिलिस्मी  चुंबन से मुझे उस अंधेरे से बाहर निकाल लाई। वो लड़की नहीं, जादुई हूर थी कोई।
   संस्कृति आज भी उसी तरह दिखती है, मगर मेरी नज़र वैसी नहीं रही, इनमे बुराइयों का टीर आ गया है। 
       अब वो कहाँ है, मुझे नहीं पता।
 
      ● सतीश छिम्पा
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Thursday, 15 October 2020

किसान उभारों का कविताओं पर प्रभाव




   तेलंगाना लोकयुद्ध और मनुज देपावत....

(सशस्त्र कम्युनिष्ट किसान उभारों का लोकभाषाओं  पर प्रभाव, भाग- १, राजस्थानी)

                                    ● सतीश छिम्पा

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इंकलाबी कवियों  में से एक है क्रांति का कवि- मनुज देपावत जो आलोचकों का कपट की भेंट चढ़ गया। मनुज के साथ  भेदभाव के कारण घनघोर अन्याय हुआ है, इसके ही नही बल्कि राजस्थानी कविता के साथ। अलोचकों के इस अक्षम्य अपराध के लिए समय उन्हें कभी बख्शेगा नहीं। राजस्थानी कविता के मार्क्सवादी इंकलाबी स्वर को चबा गया यह वर्ग.....
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      राजस्थानी जुझारू कविता के पहले ही कवि थे मनुज, जो :- तेलंगाना सशस्त्र किसान कम्युनिष्ट उभार से प्रभावित कुछेक कवियों में से एक है जो रेडिकल मूवमेंट को उस समय अत्यंत जरूरी मानते थे।

मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे जब पूंजीवाद और सामंतवाद का अंतिम युद्ध (युद्ध ही माना जाए, व्यवस्थागत बदलाव और नीतिगत ढांचा ध्वस्त) खत्म होने के बाद जब नवजात भारतीय पूंजीवाद और उसके आपसांस्कृतिक अवमूल्यों के विरुद्ध लोकयुद्ध की कविता गीत लिखे - प्रतिरोध का पहला आधार जो बने उन्हें ना मार्क्सवादी माना या स्थापित किया गया और  जिसे मुख्य धारा से अलग भी अलग रखा गया था। आप देखिए कि मानव समूह, समाज या वर्ग में आर्थिक, जातीय और वर्गीय और शोषण और  कुपोषण, जबर जुल्म, अन्याय के विरुद्ध जन का आह्वान करने वाली कविता जिसमे वर्ग विभेद, पक्षधरता और इंकलाब या मुक्ति का दर्शन हो वो मार्क्सवादी या इंकलाबी सृजन है।  वे कविताएं जो मध्यम मार्गीय समाजवादी या नवजनवादी कविताओ का आवरण लेकर रचाव करते हैं, कमजोर लिबर्ल्स स्थापित हो ही रहे होते हैं।
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           मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे जब  सामंतवाद का   अंतिम रूप से व्यवस्थागत बदलाव और उठा पटक और नीतिगत ढांचा के ध्वस्त हो चुके अवशेषों के भी खत्म होने के बाद जब नवजात भारतीय पूंजीवाद और उसके आपसांस्कृतिक अवमूल्यों के विरुद्ध लोकयुद्ध की कविता गीत लिखे - प्रतिरोध का पहला आधार जो बने उन्हें ना मार्क्सवादी माना या स्थापित किया गया और  जिसे मुख्य धारा से अलग भी अलग रखा गया था। आप देखिए कि मानव समूह, समाज या वर्ग में आर्थिक, जातीय और वर्गीय और शोषण और  कुपोषण, जबर जुल्म, अन्याय के विरुद्ध जन का आह्वान करने वाली कविता जिसमे वर्ग विभेद, पक्षधरता और इंकलाब या मुक्ति का दर्शन हो वो मार्क्सवादी या इंकलाबी सृजन है।  वे कविताएं जो मध्यम मार्गीय समाजवादी या नवजनवादी कविताओ का आवरण लेकर रचाव करते हैं, कमजोर लिबर्ल्स स्थापित हो ही रहे होते हैं। 

   एक जरुरी बात यह भी है कि किसी मूवमेंट के दौरान उसी के तत्वों को कविता में ढाला जाता है तो जाहिर है वे उसी विचारधारा या बिरादराना संगठन के होंगे-- लेकिन इसी तरह के मूवमेंट से प्रभावित होकर मध्यममार्गी लोग कविता रचे तो उस कविता को उसी धारा के साथ ही जोड़ा जाता है, कवि यहां गौण है।

   भारतीय भाषाओं में छठे और सातवां दशक इंकलाबी- क्रांतिकारी कविताओं का दौर था- और अस्सी के दशक विद्रोही मगर दिशाहीन विध्वंसात्मक दृष्टिकोण को स्थापित करते हुए अंत मे बदलाव के मार्फ़त कविता को नया और श्रेष्ठ वैचारिक और द्वंद्ववादी रूप देते हैं। अगर हम वैचारिक धरातल पर ही खड़कर देखें तो जिस कविता को जनवादी कविता के मुलम्मे में गढ़कर रखा है वो हकीकतन मार्क्सवादी/ इंकलाबी कविता है। यह विडंबना ही है यहां की ज्यादातर लोग जनवाद को मार्क्सवाद समझे बैठे हैं। मार्क्सवादी अवधारणा जिस महान परिवर्तन के समांतर है जिससे इसका फलक वैश्विक होता है- जबकि जनवाद, डेमोक्रेसी- इसी की वजह से अनेक कवियों का मूल्यांकन ही गड़बड़ झाला है। यह ना ही अतिशयोक्ति है और ना ही आत्ममुग्ध बयानबाजी है कि कविताओ के सही और सटीक मूल्यांकन के लिए वैज्ञानिक तर्कणा विकसित करना बहुत जरूरी है जो वाक्यों के भीतर जमी विचारधारा को पकड़ जान सके यह बहुत सूक्ष्म और गहराई मांगता है- मगर अभी समय लगेगा आलोचनाओ में वैज्ञानिक दीठ को स्थापित करने में।

       वैचारिक कपट के इतिहास में यह एक झूठ जो इस सामंती वर्ग के 'मेहनती किसान या अन्नदाता' के झूठे किस्सों से हम लगाते है-- संसार का अब तक का सबसे घ्रणित और हास्यास्पद है(कभी भी किसानी जमात, जिससे आप, मैं और हम ज्यादातर संबंधित है - को उसके हकीकतन रूप और शब्दों के साथ मज़दूर या सिरी या भूमि हीन या सीमांत के ध्वन्यार्थ विहीन शब्दो के साथ क्यों लिया जाता है, क्या इसका कारण पता है ?? कैसे अभी भी कुछ तथाकथित मार्क्सवादी धड़ों का एजेंडा सामंतवाद को सत्ता का अंग या सामंतवादी व्यवस्था को स्वीकारते हुए पूंजीवादी व्यवस्था या पूंजीवाद की उपस्थिती से ना केवल इनकार बल्कि इसको स्थापित तक करने के प्रयासों में निरंतर लगे हैं, जो पूंजीवाद के अस्तित्व को नकारने के लिए सामंतवादी शब्द पर चढ़े हुए हैं। यह अच्छा हुआ कि कुछ जिंदा लोगों ने जनसंगठनों के माध्यम से इसको साहित्यिक वैचारिक रूप खारिज किया है.... क्योंकी लोक चेतना ने इसका नकार करके श्रम की गरिमा को स्थापित किया है।) अन्नदाता के झूठ का मतलब है कि वही श्रम साधक खेतिहर। सिरी है अन्नदाता, अन्नदाता सीमांत है।

        इसका सकारत्मक पक्ष आधार रूप स्थापित करना बेहतरीन ईमानदार रचाव के लिए जरूरी हो जाता है, जबकि कुलुक नरोदीज्म के शिकार ज्यादातर युवा इस वर्गीय आपराधिक जमात की स्थापनाओं के तमगे के साथ इसको स्थापित करने के लगातार प्रयासो के साथ आ रहे हैं, आत्मघाती है यह.... और इसके साथ वे मनुष्य के सबसे बीमारू और सड़ चुके भावबोध को लेकर आते और उसको स्थापित तक कर देते हैं, उस दयनीयता जिसको सिमपेथीजेनर अपनी कामयाब सृजना समझते हुए प्रतिक्रियाओं में सकारात्मक फीडबैक हासिल करके और भी तेज गति से लिखते हुए इस सड़ चुके अमानवीय अवमूल्य को स्थापित कर देते हैं। यह सचमुच बड़ा खतरा हैं, दयनीयता का, हम सिमपेथी मिलने को रचाव की सार्थकता मान बैठते हैं- दयनीय, गरीब, उजड़ा, सूखा हुआ आदि आदि-  और दोगलापन से भी ग्रस्त हो जाते हैं। हम आधुनिकता या अत्याधुनिकता के साथ गांव की तुलनात्मक मगर बड़ी ही बुरी, भारी और बेमेल चीज़ों को अतीत के मोहपाश में बंधकर कब तक स्थापित करते रहेंगे। सीधी सी बात है कि ओम नागर गांव को याद करने की कोशिश में उसको बीमार, अधमरा या संक्रामक सी सोच के चलते जाने किस तरह का अवसाद जनित माहौल बना देते हैं। आपको रोजगार में तरक्की चाहिए, ट्रांसफर या व्यापार या साहित्यिक ताम झाम, टिपटॉप बंदे का सेलेब्रेटी रूप भी रखना है, शहर को गरियाना भी है और गांव, गांव का तो जाने अब किस तरह का लेखकीय जुल्म सहना होगा।
         इस बात को हवा हवाई भी समझ सकते हैं यह आपकी स्वतंत्रता है- लेकिन इसके साथ ही एक और बात की अभी भारतीय इतिहास का जो सबसे बड़ा मजदूर पलायन हुआ सड़को पर, एक साथ, एक समय मे, वे मजदूर जिनको रोजगार मिला, वे सब के सब खेतिहर, सिरी, सीमांत और भूमिहीन थे जो भारतीय अर्थव्यवस्था के कींसीयन ट्रिकल डाउन थ्योरी के शिकार बनकर सीमांत  से भूमिहीन और फिर पलायन कर गए मज़दूर में बदले. जो रोटी के टुकड़े के लिए तरसता हो उस वर्ग की अनदेखी या उसको घ्रणित समझ हाशिए से बाहर रखकर कुलुक संस्कृति के बारे में लिखना, मानवद्रोही है, जो साहित्यजगत में आपको स्थापित कर देगा मगर, विचार ..???? .... इस सिद्धांत के बिना या विचार बिंदु विहीन होकर या उसको गलत स्थापित करके हम तालियां, वाह वाह, शाबासी तो ले सकते हैं मगर..... रचाव अंतर्मन से भी तो जुड़ा होता है।
         ....
            
   अगर मनुज की कविताओं का द्वंद्ववादी विश्लेषण करें तो यह एक नई परम्परा का उत्स होगा लेकिन समस्याएं बहुत है जैसे मार्क्सवादी विचारधारा में किसी रचना को समझने के लिए वस्तु तथा रूप के संबंध को समझना आवश्यक माना जाता है। इसके अंतर्गत लेखक क्या कहता है तथा कैसे कहता है- पर जोर दिया जाता है-- जिसमे एक तटस्थ तीसरा पक्ष भी होता है लेकिन यहां मनुज की कविता में या कहें दर्शन में ऐसा नही मिल पाया।  अब जब ये पंक्ति सामने है इसलिए उन्होंने धोरों की जनता को जागने का आह्वान किया -

धोरां आळा देस जाग रै, ऊंठा आळा देस जाग।
छाती पर पैणां पड़्या नाग रै, धोरां आळा देस जाग।।

    बड़ा कारण सामाजिक विषमता और मानव की परतंत्रता थी।

इन सभी स्थितियों से दुःखी होकर मनुज ने अपने काव्य में विद्रोह का स्वर गुंजाया।
मानव को कायरता से जगा कर नए युग निर्माण की प्रेरणा देने का काम मनुज की कविताएं करती हैं। उनकी दृष्टि में वे सब परम्पराएं मृतप्राय हो गयी हैं और अब उनके मोह में फंसे रहने की आवश्यकता नहीं है। शोषकों एवं उत्पीड़कों के प्रति 

जीवन बोध की अनुपस्थिति के या, संवेदनहीनता और शुष्कता के  यातना-शिविर में  उम्मीदों और स्वप्नों को बचाकर अपने वक्त की तमाम सरगर्मियों और जोखिम के साथ ढलना भूलते नहीं है। मंगाए सामाजिक, राजनीतिक अपरिपक्व सोच और अराजक जीवन शैली इन्हें पेशेवरों की श्रवणी में जाने नहीं देती। भूमि हीन, सीमांत किसान और सर्वहारा मुक्ति के गीत एक अस्मिता, संघर्षशील मूल्यों  और समझौता विहीन प्रतिबद्धता सबसे जरुरी है।
मानव खुद अपना ईश्वर है,
साहस उसका भाग्य विधाता।
प्राणों में प्रतिशोध जगाकर,
वह परिवर्तन का युग लाता।
स्वतंत्रता की लगन उनकी अन्तरात्मा की जोरदार लगन थी। इसी आवाज को बुलन्द करते हुए वे कठपुतली शासकों को सम्बोधित करते हैं-
वां कायर कीट कपूतां की,
कवि कथा सुणावण नै जावै
अम्बर री आंख्यां लाज मरै,
धरती लचकाणी पड़ जावै
जद झुकै शीश, नीचां व्है नैण,

धरती रो कण-कण सरमावै।
इसी तरह उन्होंने सामंतशाही  की नीतियों की भयानकता का पर्दाफाश किया तथा शोषण और अन्याय के खिलाफ मजदूर-किसानों को संघर्ष का संदेश दिया। यह संदेश आज भी जन-आंदोलनों में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। व्यवस्थागत असमानता के लिए-

रै देख मिनख मुरझाय रह्यो, मरणै सूं मुसकल है जीणो
ऐ खड़ी हवेल्यां हंसै आज, पण झूंपड़ल्यां रो दुःख दूणो
ऐ धनआळा थारी काया रा, भक्षक बणता जावै है
रै जाग खेत रा रखवाळा, आ बाड़ खेत नै खावै है
ऐ जका उजाड़ै झूंपड़ल्यां, उण महलां रै लगा आग।
यही प्रबल भावना उनके सामाजिक एवं साहित्यिक कार्यों से फूट-फूटकर निकल पड़ती दिखाई देती है। उनकी लेखनी समाज के शोषित जीवन को चित्रित करना अपना उद्देश्य घोषित करती है। 
सभी स्थितियों से दुःखी होकर मनुज ने अपने काव्य में विद्रोह का स्वर गुंजाया।

मानव को कायरता से जगा कर नए युग निर्माण की प्रेरणा देने का काम मनुज की कविताएं करती हैं। उनकी दृष्टि में वे सब परम्पराएं मृतप्राय हो गयी हैं और अब उनके मोह में फंसे रहने की आवश्यकता नहीं है। शोषकों एवं उत्पीड़कों के प्रति । बहुत बुरा है कि एक महान इंकलाबी कविता और कवि को मार्क्सवाद के तौर पर नोटिस ही नही किया गया..... जबकि वे वाम राजनीति में इतने पारंगत थे कि सामंतशाही की हर उस मानवद्रोही शय को पकड़ लेते थे जो हुक्काम की नफरत का कारण बना है।  उनकी रचना भावनात्मक अंधी में उठते हर एक भाव का उपयोग करती है। हालांकि उस समय हिंदी में   नई कविता का दौर आया नहीं था मगर मनुज की भाषा और शैली नई कविता की परछाई का आभास देती थो। उनकी भाषा कलवाद और छायावाद की बीमार शाश्वत मगर अनैतिक सॉफ्ट फ़ासिस्ट वैल्यूज़ और उसके  अमूल्य के अलौकिक स्वरूप का विरोध करती है। यह कितनी बड़ी और समृद्ध राजनीतिक समझ का नतीजा है कि जन विरोध वहां हिमायत में उपस्थित रहता है। यथा :-

वह राग बेबसी का उठता, महफ़िल के मधुर निनादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।

तभी तो समाज, राजनीति और लोक की स्थितियों को पकड़नेे में सफल रहें। उस कला विरोधी दौर में भी वे जिस ठोस जमीन पर खड़े होकर विप्लव के गौरव गान थे उस कविता विरोधी मानव द्रोही दौर में एक विद्रोही स्वर और मुक्त आवाज के नाते एक मुक्तिकामी युवा रूप में इनकी पहचान रही हैं। इनकी कविताओं में प्रतिबद्धता के मूल्यों का सभज, सरल समावेश होता है।

     दरअसल जब काव्य भाषा का प्रश्न आता है तब।  साहित्यिक भाषा नामक शब्द मुखरित होता जाता है। केवल व्यंजना ही नहीं बल्कि रंजकीय गुणों के साथ लौकिक भाषा पक्ष। सहज, जायज प्रतिरोध उच्च स्तरीय भाषा अभिज्ञान के कारण ही टिकत है।

  आम  बोलचाल में राजस्थान का सामंती परिवेश बाहरो बाहरी ही फलत चलत है बाकी पोलिटिकल प्रतिबद्धता को कभी समझा ही नहीं गया है। वह अलौकिक साधन बन चुके भावों का नकार बन कर जन स्वीकार रुपक बन गया है।

    "फिर भी वे अपनी सत्ता का, कुछ सार जमाने वाले हैं !
कंगलों के झूठे टुकड़ों पर, अधिकार जमाने वाले हैं !
यह मानव की दुनिया कठोर, यह मानव का संसार विषम !
दुर्बल के निर्बल कन्धों पर, दुस्साह जीवन का भार विषम !"
.....

      एक बात जो मुझे बहुत बाद में आदरणीय और चर्चित आलोचक राजाराम भादू से बात चीत के दौरान ध्यान में आई और फिर थोड़ी पड़ताल और सब जच गया। कवि भपी दक्षिणपंथी हो या मध्यम मार्गी या लिबरल या न्यूटल, कुछ फर्क नही पड़ता, हाँ अगर वो एक ऐसे समय मे है जहाँ एक मुक्ति का महासंग्राम छिड़ा हुआ है और वो उस पर उसी तरह की द्वंद्वात्मक रचना लिखता है तो उस कविता को इंकलाबी कविता ही कहा जाएगा ना कि कवि को। और इसी संदर्भ में आगे बढ़ें तो पाएंगे कि सत्तर के दशक में नक्सल किसान महाउभार के दौरान रेवंतदान चारण, 'इंकलाब री आंधी'', तो बिल्कुल स्पष्ट मार्क्सवादी कविता है, इसके अलावा 'घण मूंघा मोती मत ढळका रोयां रुजगार मिलै कोनी'',, में भी वर्ग संघर्ष की धारणाओं का स्पष्ट पता लग रहा है।  क्या यह आलोचकों की चार सौ बीसी है कि जिस तरह से कालविभाजन या प्रवृत्तिमूलक दर्शन का संयुक्त आधार रूप में मार्क्सवादी कविता का मौजूदा कोई विवरण है तो बताएं कि कहां है- या वत्सलनिधि के बजट की पाण अभी उतरी नही है।

   इसी एक छोटी मगर बहुत बड़ी और गंभीर कमी या साजिश या कपटपूर्ण मूल्यांकन या जो भी कारण रहा हो के चलते भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (भाकपा, तब जब संशोधनवादी नही थी) तेलंगाना सशस्त्र  महान  किसान उभार के दौरान या उसके थोड़ा बाद में आए बदलाव या प्रभाव जो लोक भाषाओं और कविताओं में स्पष्ट दिखता है को नकारा नही जा सकता, यहां उदाहरण देखिए:-

   रै उठो किसानां मज़दूरां

 थे उंटा कस ल्यो आज जीन

इं नफा खोर अन्याय नै

कर दयो कोडी रा तीन तीन

     मनुज को हम किसी भी मध्यमार्गी या संसद- गामी विचार के साथ नही जोड़ सकते हैं- यह तो उनकी कविताओं में ही साबित हो जाता है कि मध्यममार्गी छलावा जिसको सोशलिज़्म या जाने क्या क्या कहते है में नहीं बल्कि उनका रुझान- मार्क्सवाद की तरफ ही रहा। सामंती और नव पूंजीवादी सत्ताओ का मुखर विरोध लेकिन इनकी रचनाओं में गहन चिंतन का बीज भी इसी आक्रोश और नकार के साथ आया है - इसलिए अब इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नही कि मनुज देपावत राजस्थानी साहित्य के पहले प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कवि थे- और यही से उस एक बेहतरीन श्रंखला का राह बनता है जो मार्क्सवादी इंकलाबी कविता का उत्स और पसराव दोनों ही है। भले ही यह कुछ जगह  गहन लोक रंजकताओं का बीमार सामंती रूढ़ हुए किसी शब्द को ले आते हैं मगर स्थापित नही करते हैं।

      भारतीय इतिहास में राजस्थान का वर्णन अवश्यम्भावी है। इतिहास की हर एक बड़ी घटना के साथ राजस्थान का गहरा संबन्ध रहा है। और उसमें में मानवद्रोही दैत्य प्रवृतियों का बहुतायत में आंकड़ा है। मुगलों की गुलामी से लेकर अंग्रेजो की झूठी बोटी खाने वाला यहां का सामंतवादी तबका अनेक  वर्षों तक यहां की मेहनतकश जनता  के टुकड़ो पर पलता रहा था। हालांकि थोथा घमंड, जातीय  उच्चता का भाव और बहादुरी के मनगढ़ंत किस्से ही बस उनके हिस्से थे।  और इसी सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त तत्कालीन चारण कवियों का काव्य था। कुछेक को छोड़कर, जबकि मनुज देपावत राजस्थनी कविता की घोर, अमानवीय, बर्बर, झूठी सामंतशाही दरबारों की कविता परम्परा से आने के बाद भी वे एस्थेटिक सेंस का कल्चरल लेवल पर प्रयोग करते थे। कह सकते हैं कि उनका संबंध राजस्थनी सामंतवादी कविता की बीमार धारा का मुखर, रेडिकल विरोध करके खत्म करने से था। लेकिन इनकी रचनाओं में जातीय चिंतन का अभाव है इसलिए खलिस मार्क्सवादी इंकलाबी कविता का उत्स है।  सामाजिक उत्पीड़न के प्रति अदम्य विद्रोह, लोकमानस से अथाह राग, शोषणपरक सामाजिक व्यवस्था को आमूल-चूल बदलकर समतामूलक समाज निर्माण और वक नया और महान महामानव की मुक्ति गान है। क्रांति के ज़ज़्बे से ओत-प्रोत थे। उसने  साहित्य और विशेषकर लोकपखी कविता के सौंदर्यशास्त्र को गहरे से प्रभावित किया।
एक बात यह भी गौरतलब है कि कुछ कवि राज दरबार और सामंतों के प्रभाव या छाया में नहीं थे, इसलिए उनकी कविता में जीवन की धड़कन स्पष्ट सुनी जा सकती है। मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे प्रतिरोध की मार्क्सवादी अवधारणा को कविता में ढाल कर मुक्ति के गीत गाया करते थे। उनके मन मे इस सामंती व्यवस्था का विध्वंस करके एक नया राज्य, मेहनतकशों का स्टेट सृजन की बातें यूँ ही नही आई बल्कि '1925 ई. में एम.एम. रॉय और दूजे साथियों ने मिल कर भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का गठन कर लिया था जो सदी के तीसरे दशक के आसपास शेखावाटी के किसान समूहों को काफी प्रभावित कर ही थी। 

...... और उधर मनुज के मन मे प्रचंड प्रलंयकारी आग धधक रही थी जो सिर्फ सृजनधर्मिता ही नहीं बल्कि आक्रोश की भी उत्प्रेरक थी। यही बात हम आगे बढ़ेंगे तब रेवंतदान चारण, और सत्तर के दशक के मुख्य कवि तेजसिंह जोधा और पारस अरोड़ा की कविता ध्वनि में देखेंगे, उसी बात के साथ कि इनकी विचारधारा यहां महत्व नही रखती बल्कि कविता का सुर बहुत महत्वपूर्ण होता है। 

    शुद्ध इंकलाबी या मार्क्सवादी कवि को आलोचकों ने वैचारिक स्तर पर क्यों नही मूल्यांकित किया।  एक जरुरी बात यह भी है कि किसी मूवमेंट के दौरान उसी के तत्वों को कविता में ढाला जाता है तो जाहिर है वे उसी विचारधारा या बिरादराना संगठन के होंगे-- लेकिन इसी तरह के मूवमेंट से प्रभावित होकर मध्यममार्गी लोग कविता रचे तो उस कविता को उसी धारा के साथ ही जोड़ा जाता है, कवि यहां गौण है।

   भारतीय भाषाओं में सबसे पहले जिस इंकलाबी दौर ने सब कुछ का अमूल चूल बदल दिया था वो था सन 1939- 1952-53 का काल, जब तेलंगाना सशस्त्र किसान महान उभार दक्षिण 

 छठे और सातवां दशक इंकलाबी- क्रांतिकारी कविताओं का दौर था- और अस्सी के दशक विद्रोही मगर दिशाहीन विध्वंसात्मक दृष्टिकोण को स्थापित करते हुए अंत मे बदलाव के मार्फ़त कविता को नया और श्रेष्ठ वैचारिक और द्वंद्ववादी रूप देते हैं। अगर हम वैचारिक धरातल पर ही खड़कर देखें तो जिस कविता को जनवादी कविता के मुलम्मे में गढ़कर रखा है वो हकीकतन मार्क्सवादी/ इंकलाबी कविता है। यह विडंबना ही है यहां की ज्यादातर लोग जनवाद को मार्क्सवाद समझे बैठे हैं। मार्क्सवादी अवधारणा जिस महान परिवर्तन के समांतर है जिससे इसका फलक वैश्विक होता है- जबकि जनवाद, डेमोक्रेसी- इसी की वजह से अनेक कवियों का मूल्यांकन ही गड़बड़ झाला है। यह ना ही अतिशयोक्ति है और ना ही आत्ममुग्ध बयानबाजी है कि कविताओ के सही और सटीक मूल्यांकन के लिए वैज्ञानिक तर्कणा विकसित करना बहुत जरूरी है जो वाक्यों के भीतर जमी विचारधारा को पकड़ जान सके यह बहुत सूक्ष्म और गहराई मांगता है- मगर अभी समय लगेगा आलोचनाओ में वैज्ञानिक दीठ को स्थापित करने में।

   इसी एक छोटी मगर बहुत बड़ी और गंभीर कमी या साजिश या कपटपूर्ण मूल्यांकन या जो भी कारण रहा हो के चलते भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी (भाकपा, तब जब संशोधनवादी नही थी) तेलंगाना सशस्त्र  महान  किसान उभार के दौरान या उसके थोड़ा बाद में आए बदलाव या प्रभाव जो लोक भाषाओं और कविताओं में स्पष्ट दिखता है को नकारा नही जा सकता, यहां उदाहरण देखिए:-

   रै उठो किसानां मज़दूरां

 थे उंटा कस ल्यो आज जीन

इं नफा खोर अन्याय नै

कर दयो कोडी रा तीन तीन

     मनुज को हम किसी पार्टी या संसद गामी विचार के साथ नही जोड़ सकते हैं- यह तो उनकी कविताओं में ही साबित हो जाता है कि डेमोक्रेटिक या सोशलिज़्म या सर्वहारा अधिनायकत्व आदि में नहीं बल्कि उनका रुझान- मार्क्सवाद की तरफ ही रहा। सामंती और नव पूंजीवादी सत्ताओ का मुखर विरोध लेकिन इनकी रचनाओं में गहन चिंतन का बीज भी इसी आक्रोश और नकार के साथ आया है - इसलिए अब इसमें कोई शक की गुंजाइश ही नही कि मनुज देपावत राजस्थानी साहित्य के पहले प्रतिबद्ध मार्क्सवादी कवि थे- और यही से उस एक बेहतरीन श्रंखला का राह बनता है जो मार्क्सवादी इंकलाबी कविता का उत्स और पसराव दोनों ही है। भले ही यह कुछ जगह  गहन लोक रंजकताओं का बीमार सामंती रूढ़ हुए किसी शब्द को ले आते हैं मगर स्थापित नही करते हैं।

      भारतीय इतिहास में राजस्थान का वर्णन अवश्यम्भावी है। इतिहास की हर एक बड़ी घटना के साथ राजस्थान का गहरा संबन्ध रहा है। मुगलों की गुलामी से लेकर अंग्रेजो की झूठी बोटी खाने वाला यहां का सामंतवादी तबका अनेक  वर्षों तक यहां की मेहनतकश जनता  के टुकड़ो पर पलता रहा था। हालांकि थोथा घमंड, जातीय  उच्चता का भाव और बहादुरी के मनगढ़ंत किस्से ही बस उनके हिस्से थे।  और इसी सामंतवादी मानसिकता से ग्रस्त तत्कालीन चारण कवियों का काव्य था। कुछेक को छोड़कर, जबकि मनुज देपावत राजस्थनी कविता की घोर, अमानवीय, बर्बर, झूठी सामंतशाही दरबारों की कविता परम्परा से आने के बाद भी वे एस्थेटिक सेंस का कल्चरल लेवल पर प्रयोग करते थे। कह सकते हैं कि उनका संबंध राजस्थनी सामंतवादी कविता की बीमार धारा का मुखर, रेडिकल विरोध करके खत्म करने से था। लेकिन इनकी रचनाओं में जातीय चिंतन का अभाव है इसलिए खलिस मार्क्सवादी इंकलाबी कविता का उत्स है।  सामाजिक उत्पीड़न के प्रति अदम्य विद्रोह, लोकमानस से अथाह राग, शोषणपरक सामाजिक व्यवस्था को आमूल-चूल बदलकर समतामूलक समाज निर्माण और वक नया और महान महामानव की मुक्ति गान है। क्रांति के ज़ज़्बे से ओत-प्रोत थे। उसने  साहित्य और विशेषकर लोकपखी कविता के सौंदर्यशास्त्र को गहरे से प्रभावित किया।

एक बात यह भी गौरतलब है कि कुछ कवि राज दरबार और सामंतों के प्रभाव या छाया में नहीं थे, इसलिए उनकी कविता में जीवन की धड़कन स्पष्ट सुनी जा सकती है। मनुज देपावत तत्कालीन घोर सामंती समय मे प्रतिरोध की मार्क्सवादी अवधारणा को को कविता में ढाल कर मुक्ति के गीत गाया करते थे।
उनके मन मे इस सामंती व्यवस्था का विध्वंस करके एक नया राज्य, मेहनतकशों का स्टेट सृजन की बातें यूँ ही नही आई बल्कि '1925 ई. में एम.एम. रॉय और दूजे साथियों ने मिल कर भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का गठन कर लिया था जो सदी के तीसरे दशक के आसपास शेखावाटी के किसान समूहों को काफी प्रभावित कर ही थी। और उधर मनुज के मन मे प्रचंड प्रलंयकारी आग धधक रही थी जो सिर्फ सृजनधर्मिता ही नहीं बल्कि आक्रोश की भी उत्प्रेरक थी।
   अगर मनुज की कविताओं का द्वंद्ववादी विश्लेषण करें तो यह एक नई परम्परा का उत्स होगा लेकिन समस्याएं बहुत है जैसे मार्क्सवादी विचारधारा में किसी रचना को समझने के लिए वस्तु तथा रूप के संबंध को समझना आवश्यक माना जाता है। इसके अंतर्गत लेखक क्या कहता है तथा कैसे कहता है- पर जोर दिया जाता है-- जिसमे एक तटस्थ तीसरा पक्ष भी होता है लेकिन यहां मनुज की कविता में या कहें दर्शन में ऐसा नही मिल पाया।  अब जब ये पंक्ति सामने है इसलिए उन्होंने धोरों की जनता को जागने का आह्वान किया -

धोरां आळा देस जाग रै, ऊंठा आळा देस जाग।
छाती पर पैणां पड़्या नाग रै, धोरां आळा देस जाग।।

    बड़ा कारण सामाजिक विषमता और मानव की परतंत्रता थी।

इन सभी स्थितियों से दुःखी होकर मनुज ने अपने काव्य में विद्रोह का स्वर गुंजाया।
मानव को कायरता से जगा कर नए युग निर्माण की प्रेरणा देने का काम मनुज की कविताएं करती हैं। उनकी दृष्टि में वे सब परम्पराएं मृतप्राय हो गयी हैं और अब उनके मोह में फंसे रहने की आवश्यकता नहीं है। शोषकों एवं उत्पीड़कों के प्रति 

जीवन बोध की अनुपस्थिति के या, संवेदनहीनता और शुष्कता के  यातना-शिविर में  उम्मीदों और स्वप्नों को बचाकर अपने वक्त की तमाम सरगर्मियों और जोखिम के साथ ढलना भूलते नहीं है। मंगाए सामाजिक, राजनीतिक अपरिपक्व सोच और अराजक जीवन शैली इन्हें पेशेवरों की श्रवणी में जाने नहीं देती। भूमि हीन, सीमांत किसान और सर्वहारा मुक्ति के गीत एक अस्मिता, संघर्षशील मूल्यों  और समझौता विहीन प्रतिबद्धता सबसे जरुरी है।
मानव खुद अपना ईश्वर है,
साहस उसका भाग्य विधाता।
प्राणों में प्रतिशोध जगाकर,
वह परिवर्तन का युग लाता।
स्वतंत्रता की लगन उनकी अन्तरात्मा की जोरदार लगन थी। इसी आवाज को बुलन्द करते हुए वे कठपुतली शासकों को सम्बोधित करते हैं-
वां कायर कीट कपूतां की,
कवि कथा सुणावण नै जावै
अम्बर री आंख्यां लाज मरै,
धरती लचकाणी पड़ जावै
जद झुकै शीश, नीचां व्है नैण,

धरती रो कण-कण सरमावै।
इसी तरह उन्होंने सामंतशाही  की नीतियों की भयानकता का पर्दाफाश किया तथा शोषण और अन्याय के खिलाफ मजदूर-किसानों को संघर्ष का संदेश दिया। यह संदेश आज भी जन-आंदोलनों में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। व्यवस्थागत असमानता के लिए-

रै देख मिनख मुरझाय रह्यो, मरणै सूं मुसकल है जीणो
ऐ खड़ी हवेल्यां हंसै आज, पण झूंपड़ल्यां रो दुःख दूणो
ऐ धनआळा थारी काया रा, भक्षक बणता जावै है
रै जाग खेत रा रखवाळा, आ बाड़ खेत नै खावै है
ऐ जका उजाड़ै झूंपड़ल्यां, उण महलां रै लगा आग।
यही प्रबल भावना उनके सामाजिक एवं साहित्यिक कार्यों से फूट-फूटकर निकल पड़ती दिखाई देती है। उनकी लेखनी समाज के शोषित जीवन को चित्रित करना अपना उद्देश्य घोषित करती है। 
सभी स्थितियों से दुःखी होकर मनुज ने अपने काव्य में विद्रोह का स्वर गुंजाया।

मानव को कायरता से जगा कर नए युग निर्माण की प्रेरणा देने का काम मनुज की कविताएं करती हैं। उनकी दृष्टि में वे सब परम्पराएं मृतप्राय हो गयी हैं और अब उनके मोह में फंसे रहने की आवश्यकता नहीं है। शोषकों एवं उत्पीड़कों के प्रति । बहुत बुरा है कि एक महान इंकलाबी कविता और कवि को मार्क्सवाद के तौर पर नोटिस ही नही किया गया..... जबकि वे वाम राजनीति में इतने पारंगत थे कि सामंतशाही की हर उस मानवद्रोही शय को पकड़ लेते थे जो हुक्काम की नफरत का कारण बना है।  उनकी रचना भावनात्मक अंधी में उठते हर एक भाव का उपयोग करती है। हालांकि उस समय हिंदी में   नई कविता का दौर आया नहीं था मगर मनुज की भाषा और शैली नई कविता की परछाई का आभास देती थो। उनकी भाषा कलवाद और छायावाद की बीमार शाश्वत मगर अनैतिक सॉफ्ट फ़ासिस्ट वैल्यूज़ और उसके  अमूल्य के अलौकिक स्वरूप का विरोध करती है। यह कितनी बड़ी और समृद्ध राजनीतिक समझ का नतीजा है कि जन विरोध वहां हिमायत में उपस्थित रहता है। यथा :-

वह राग बेबसी का उठता, महफ़िल के मधुर निनादों में ! हे गाँव, तुझे मैं छोड़ चला, लाचार भरे इस भादों में ।

तभी तो समाज, राजनीति और लोक की स्थितियों को पकड़नेे में सफल रहें। उस कला विरोधी दौर में भी वे जिस ठोस जमीन पर खड़े होकर विप्लव के गौरव गान थे उस कविता विरोधी मानव द्रोही दौर में एक विद्रोही स्वर और मुक्त आवाज के नाते एक मुक्तिकामी युवा रूप में इनकी पहचान रही हैं। इनकी कविताओं में प्रतिबद्धता के मूल्यों का सभज, सरल समावेश होता है।

     दरअसल जब काव्य भाषा का प्रश्न आता है तब।  साहित्यिक भाषा नामक शब्द मुखरित होता जाता है। केवल व्यंजना ही नहीं बल्कि रंजकीय गुणों के साथ लौकिक भाषा पक्ष। सहज, जायज प्रतिरोध उच्च स्तरीय भाषा अभिज्ञान के कारण ही टिकत है।

  आम  बोलचाल में राजस्थान का सामंती परिवेश बाहरो बाहरी ही फलत चलत है बाकी पोलिटिकल प्रतिबद्धता को कभी समझा ही नहीं गया है। वह अलौकिक साधन बन चुके भावों का नकार बन कर जन स्वीकार रुपक बन गया है।
    "फिर भी वे अपनी सत्ता का, कुछ सार जमाने वाले हैं !
कंगलों के झूठे टुकड़ों पर, अधिकार जमाने वाले हैं !
यह मानव की दुनिया कठोर, यह मानव का संसार विषम !
दुर्बल के निर्बल कन्धों पर, दुस्साह जीवन का भार विषम !"

             राजस्थान की कविता हिंदी और राजस्थानी की खासियत रही है कि आप जिस जिस काल के कवि को पढ़ रहे हैं या जिस प्रवृति या विचार या आधार की कविताओ या कवि डायरी या उपलब्ध जो भी विषयवस्तु हो या विधा हो- हर एक का कोई ना कोई आधार गांवों से जुड़ा मिलेगा। यह बुरा नही है, शायद जड़ों की तरफ लौटने की प्रक्रिया है- जरूरी भी है मगर एक हद तक, लेकिन हम इस आत्ममुग्धता से नक्को नक्क भरे हुए- भूल जाते हैं कि कविता का पहला सकारात्मक असर मानव द्रोही या जीवन को अपमानित करने वाले प्रदूषकों के इलाज से शुरू होता है। जबकि द्वंद्ववात्मक या वैज्ञानिक तर्कणा के अभाव, नासमझी या आत्मालोचना की कमी के चलते हमने कविताओं में गांवों का वो सत्यानाश किया है कि इन कविताओ को पढ़ने का मन ही नही करता है।

      किसान (सामंतवादी कुलुक) के शोषण और जनद्रोही व्यवहार को जाने बिना, स्त्री विरोधी, श्रमिक या जीवन के द्रोही उसके वर्ग को महिमामंडित करके जिस तरह से पेश करते हैं वहां हमे सोचना पड़ेगा कि क्या हकीकतन गांव का आदमी कठोर जीवन शैली या मेहनती है- झुग्गियों में तो जीवन और संघर्ष शायद है कि नही- नरोदवाद मानवद्रोहियों के कुकर्मो से विश्व इतिहास के जनांदोलनों में कुलुक किसानी दुष्कर्मो, पाप कर्मों और गद्दारी से हर्फ डर हर्फ भरे हुए मिलते हैं। हम श्रम विभाजन के नियम जानने होंगे और फिर मूल्यांकन के माध्यम से पुनःविचार भी करना होगा कि यह कढ़ी जो घोली है, इसका समाधान कैसे करें????

 अब साहित्य में नरोदवादी अमानवीय अवमूल्यों के साथ आने लगा है।   क्या सच मे हमारा जुड़ाव जन से इसी भांत है ? क्या सच मे हम गावों के अतिशय महिमामंडन की धूप में उसके जीवंत रूप को मार रहे हैं ??? 

       इसमे कोई दो राय नही कि इस विषयक कुछेक कविताएं बेहतरीन होती है, मगर एक हद तक। इनका नजरिया भी बेहतरीन है, मगर रचाव के समय जो समस्या ज्यादा उभरकर आती है- वो विचारों और स्थितियों और दीठ के साथ न्याय नही कर पाने की कमजोरी और बौद्धिक चालाकी, अक्सर हम बौद्धिक धूर्तता को कलाओं के साथ रखते हुए प्रतिबद्धता के दृष्टिकोण का गलत अंदाजा लगाकर, अमानवीय अपसंस्कृतिक अवमूल्यों को नैतिक मूल्यों के रूप में स्थापित करने के मानवद्रोही काम को जो अक्सर वैचारिक कमजोरी के चलते अनजाने में हो जाता है, और जानबूझकर भी... स्थापित करने जैसा काम कर देते हैं। 

     
  

Wednesday, 14 October 2020

क्या आप कैदी नंबर 307 को जानते हैं?

कथेतर गद्य :-

गोवा की यरवदा जेल में बंद कैदी नम्बर 307- सुधीर शर्मा, उन चुनिंदा लोगों में से है, जिन्होंने तमाम कुख्यातियों के बावजूद गुमनाम होते हुए भी बहुत सघन और गहरी चर्चाओं में जगह बनाई और राजेंद्र यादव, भीष्म साहनी और मनोज रूपड़ा जैसे रचनाकारों की जिसमे रुचि जगी, पत्रों का आना जाना शुरू हुआ और बौद्धिक जगत में एक नाम बनकर उभरा :- सुधीर शर्मा जिसने अपनी दमित, अतृप्त इच्छाओं को जेल की कालकोठरी में खतों के बहाने से जी भर के लिखा है...

सुधीर के पास अनेक खत आया करते। जो अब एक किताब की शक्ल में छप भी चुके हैं। 

कैदी नंबर 302 उर्फ सुधीर शर्मा के लिए बौद्धिक छटपटाहट, उकलाहट, बेचैनी और सहानुभूति किस शिद्दत से थी। किस चाहत के वश राजेन्द्र यादव से लेकर भीष्म साहनी तक के दिग्गजों ने सुधीर का साथ दिया। भावनात्मक संबल और- सहयोग दिया वो आपको स्थापित कथाकार मनोज रूपड़ा के इस खत (माफी के साथ कि इसको अभी पूरा नही दूंगा और ना ही यह रचना पूरी पोस्ट करूँगा- छपते समय पूरा होगा, अभी आंशिक ही।) से सहज पता लग जाता है।

"आपका पत्र बहुत लंबा और कसा हुआ था जिससे यह साबित होता है कि आप अच्छे से अपनी समझ को पकाने का प्रयास कर रहे हो मुझे यकीन है साहित्य और समझदार लोगों में आपको सम्मानजनक जगह मिलेगी। आपने जिस गहराई से मेरी कहानी को महसूस किया है और जितनी गंभीरता से उसे परखने की कोशिश की है उसके लिए शुक्रिया अपने दो-तीन बार पत्र में विशेष जोर देकर इस बात को दोहराया कि आप प्रबुद्ध पाठक नहीं है इसलिए कहानी के बारे में कोई पक्की और व्यवस्थित बात नहीं कह पाएंगे लेकिन मैं समझता हूं उसकी जरूरत भी नहीं है ....क्योंकि किसी भी रचना के बारे में कोई ठोस बौद्धिक निष्कर्ष निकालने की बजाए उस रचना के भीतर की संवेदना के साथ अपने आप को रच लेना एक पाठक के लिए ज्यादा जरूरी है।

एक 'रचाव' 'पाठक के भीतर भी होना चाहिए यह लेखक की भी सबसे बड़ी खूबी है कि उसकी रचना पाठक के भीतर क्या-क्या रच सकती है

लेकिन हां एक खतरे से मैं आपको अदा कर दु!

कभी भी किसी कहानी को इतनी बुरी तरह से गले मत लगाओ कि वह आपकी बाहों में दम तोड़ दे कई पाठक होते हैं जो किसी खास कहानी को ही बंदरिया के मरे बच्चे की तरह गले लगाए रहते हैं इससे पाठक की प्रगति भी बाधित होती है और लेखक अभी एक खास तरह के मैनरिज्म में बंध जाता है

आपका जीवन सचमुच विभिन्न और असभविक उबड़ खाबड़पन से गुजरा है और गुजर रहा है इस तरह के अनुभवों का अगर वाजिब इस्तेमाल किया जाए तो यथार्थ को तरासने के सबसे ज्यादा कारगर औजार बन सकते हैं आपने मैक्सिम और द साद के बारे में शायद न पढ़ा हो दोनों लेखकों ने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन जेल में बिताए थे और जिस ब्यानर के यथार्थ का उन्होंने पर्दाफाश किया उससे समुच्चय युग रूह कांप उठी थी वे क्रांतिकारी लेखक नहीं थे ना ही उनमे किसी सामाजिक संकट से टकराने की हिम्मत थी वे भयानक स्नायविक तनाव से ग्रस्त थे उन्हें सेक्स ड्रग्स और यौन अपराधों के अमर्यादित आवेग ने अपने घेरे में घसीट लिया मुझे लगता है कि आपके साथ ही शायद कुछ ऐसा ही हुआ था...."

कैदी सुधीर शर्मा के पत्रों के संकलन में  उसने जो सुशीला टाकभौरे को लिखे एक पत्र का अंश ... '‘खुशी व उत्तेजना से मैंने सीधे अपना बिस्तर पकड़ा और आपके पत्र को खोलकर पढ़ना शुरू किया। जैसे- जैसे पत्र पढ़ता गया, खुद में सिमटता चला गया। मैंने पत्र को बड़ी देर में खत्म किया, क्योंकि पत्र ने हर पंक्ति के साथ इतना उद्वेलित किया कि मैं उसी के भंवर में काफी देर तक डूबता-उतरता रहा. मेरी यह उथल-पुथल इतनी गहरी थी कि लाख रोकने के बाद भी वह चेहरे पर उतर आती. क्या आप यकीन करेंगी कि बीच में तीन जगह मैं इतना भाव विकल हो उठा कि मेरी आंखें नम हो उठीं. एक बार पढ़ने के बाद, मैंने फिर-फिर पत्र को पढ़ा. हर बार पढ़ते हुए मेरी गम्भीरता ऐसी हो गयी कि आसपास का वातावरण उससे प्रभावित हो गया. साथियों की हिम्मत ही न हो पा रही थी कि वे मुझसे इस गम्भीरता के बारे में कुछ पूछें. वे मेरी गम्भीरता से खुद ही गम्भीर हो गये और चोर नजरों से मुझे देखने लगे... फिर हिचकते, सकुचाते हुए बोले - शर्मा भाई, क्या बात है जो इतने उद्वेलित हो गये ?’ मैं हल्के से मुस्कुराया और बोला- ऐसी बात है दोस्तों कि इस पत्र ने मेरी आत्मा में प्रवेश करके इसके बहुत-से दाग-धब्बों को धो-पोंछकर, उसे नये रूप में चमका दिया है ।  आत्मा की धुलाई-पुछाई में ही मैं इस तरह उद्वेलित हो गया.....'’

मध्यम या निम्न मध्यम वर्ग का औसत से कोई लड़का अस्सी के दशक में क्या सपने देखता होगा। नौकरी, पैसा, प्रेमिका या जीवनसाथी या आवारगी, फक्कड़ बेपरवाही या मौज मस्तियाँ या यायावरी- कला- रंगमंच या इसी तरह के ही होते हैं ज्यादातर सपने। मिठास, जो जीवन मे कम हो या हो ही नही तो सपने गुड़ की समूची बोरी में बदल जाते हैं। सभी के नही, कुछ एक उसमे बागी, बगावत और अन्य सपने पालते हैं तो कुछ मिथुन की तरह फिल्मी दादा या गली का गुंडा या भाई का पट्ठा या अंडरवर्ल्ड का डॉन- कातिल, हत्यारा, नशेड़ी, गंजेड़ी, या जुआरी सटोरिया या जिंदगी के कोठे का भड़वा । वो बहुत समय तक या कहें  बरसों बरस तक दादागिरी, हत्या, लूटपाट और नशे की दलदल में फसे रहे। उन पर अनेक मामले थे शायद और कुछ बड़े केस बजी दर्ज हुए। जिसमे मार कुटाई से लेकर अन्य झूठे  मामले भी शामिल थे। अपनी  जिंदगी के कई साल बर्बाद करने के बाद -  एक दिन हैरोइन रखने के जुर्म में

अरेस्ट हुआ और बीस साल तक जेल में बंद रहने के  बदल गया सब कुछ...... लेकिन फिर भी इतना जानना भी जरूरी है...


नाम  सुधीर शर्मा हैं। माफ़िया से निकला यह शख़्स उसी अंडरवर्ल्ड माफिया के बेताज बादशाह करीम लाला का ख़ास था। इसको भाई या दादा के नाम से भी जाना जाता होगा। आप लगभग दो दशक तक गोवा समेत अन्य जेल में भी रहे हैं। सुधीर अंडरवर्ड के डॉन हाजी मस्तान , करीम लाला के खास तो थे ही बल्कि उनके साथ काम भी किया। तमाम बुरे और खराब और गैरकानूनी धंधे जो एक डॉन कर सकता था या करता था - में उसके सभी गुर्गे भी शामिल होते हैं। खतरनाक समय। खतरनाक जगह। ख़तरनाक़ लोग। खतरनाक सड़क। खतरनाक गली..... लाशें... लाशें और बस लाशें ही लाशें।

जो खराबा किसी तुष्टीकरण के चलते बढा था वो जो अब तक एक बर्बरान मिजाज के साथ ही कोमल भाव परोटे हुआ था-  वो समय गुजर गया था और अब दाऊद जो दुबई में था- उसके गुर्गे अबू सलेम या राजन या जो भी हो- आतंक का पर्याय थे- उन सब मे से एक मजदूर जो जमीन से उठकर आया- अरुण गवली था। अरुण गवली, मान्या सुर्वे, लाला, पठान और दाऊद... सरगर्मियां ज्यादा हुई तो पुलिस ने

 खोल दिए बंदूकों के मुंह और अपराधी और गैर अपराधी सब के सब एनकाउंटर जो सच्चे भी और थे झूठे भी- सड़क पर लाशें बनकर बिखरे थे। अंधा- धुंद गोलियों और उनकी दहशत, जीवन जैसे उजड़ गया हो। जवान बेटों की देह लाशें बन पसरी थी। नशा, नशा, नशा और बस नशा-- स्मगलर्स का करोड़ो के इस व्यापार के पसराव के साथ ही बढ़ता गया हथियारों का बाजार। और मौत का नंगा नाच भी।

सुधीर इन सबमे शामिल था या नही था- मालूम नही लेकिन उसके भीतर उजास जो उम्मीद बनकर आया इन सब मे से , आज का वो आधार और नजरिया, सब वहीं से आए थे।  ड्रग्स स्मगलिंग, या बढाते रहने के जुर्म में उसको गोवा कारागृह में डाल दिया गया ।

यहां उसका प्लस पॉइंट जुड़ता है वो है बचपन से ही उसका किताबो व पेपर पत्रिका  व फिल्मो का चाव। जेल में किताबों का साथ नहीं छोड़ा फिर जब जेल से छूटे तो श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय  आजमगढ़ में आ गये।

यहां उनको साहित्यिक आधार मिला। उनके मित्र बताते हैं कि विख्यात पत्रिकाएं जैसे हंस, वर्तमान साहित्य, तहलका, पाखी,आह ज़िन्दगी, इंडिया टुडे, वागर्थ, जनपथ और आउटलुक निरंतर उनकी अध्ययन सामग्री में शामिल थी। जो इनके कारण इनके दोस्त लोग भी सआदत हसन मंटो, हरिशंकर परसाई , कबीर ,मुंशी प्रेमचंद ,मोहन राकेश ,विजय दान देथा, कमलेश्वर, राजेंद्र यादव के बारे में पता चला। इस बंदे का जेल जाने की कथा भी अपने आप मे बेहतरीन है।



सुधीर शर्मा कॉलेज जाने लगे ही थे। स्नातक शुरू ही किया था और उनको उसी समय मे अंडरवर्ल्ड का डॉन बनने का चाव चढा तो बाम्बे पहुंचे। उस समय वहाँ  डॉन करीम लाला पठान के भतीजे समद ख़ान से दोस्ती हुई। एक दिन समद ख़ान उनको अपने गैंग में शामिल कराने करीम लाला गैंग के अड्डे पर पहुंचा। वहाँ सैकड़ों छह से सात फीट लम्बे और तगड़े पठान बैठकर निहारी खा रहे थे। हथियार रखे हुए थे.करीम लाला पठान एक छोटी सी मेज़ पर निहारी रखकर शौक़ फ़रमा रहे थे। समद ख़ान ने कहा कि ये मेरे दोस्त सुधीर शर्मा हैं और गैंग में शामिल होने आए हैं।

पूरा का पूरा गैंग उन पर हंसने लगा और कहा कि ये जानवर का ख़ून देखकर और जानवर कटते देखकर डर जाने वाली क़ौम है। क्या मज़ाक़ है- एक पठान ने पूछा कि निहारी खाते हो। .पटककर गर्दन भी रेत देते.गोलियाँ भी चलाते.करीम लाला को गिरफ़्तार करना पुलिस के लिए चुनौती थी लेकिन पुलिस हाथ नहीं डालती.कभी हाथ भी डालती तो करीम लाला के दिग्गज वकील चुटकी में छुड़ा लेते।   करीम लाला के भतीजे समद ख़ान को दाऊद ने अहमदाबाद में घेरा। समद ख़ान कार से था और सुधीर शर्मा उसी में बैठे थे। दाऊद ने कार गोलियों से छलनी कर दी। .लेकिन दोनों बच निकले, अब एक दिन अपनी बिल्डिंग की लिफ़्ट से उतरते समय समद ख़ान को दाऊद ने  गोली मार कर हत्या कर दी।


पठान गैंग का खात्मा होते ही करीम किसी होटल को चलाने लगा और सुधीर शर्मा ड्रग्स में पकड़े गए अठारह साल की जेल हुई। गोवा जेल में क़ैद रहे।

यह प्रसिद्धि उनको जेल में मिले साहित्य ल कारण ही मिली थी,  उनको साहित्य पढ़ना अच्छा लगा। किताब लिखी, चिट्ठी द्वारा एक तत्कालीन आइपीएस और विख्यात कथाकार विभूतिनारायण राय  के संपर्क में आर फिर सुधीर शर्मा से आकर मिले और उनके लिए जेल में मनपसंद किताबों का इंतज़ाम करवाया।

सुधीर गोवा जेल में कैदी नंबर तीन सौ सात थे। एक लड़की उनको खत लिखती, स्नेहिल खत, अजीब मजबूत और गरिमामय संबंध था। जब सज़ा काट बाहर आए तो एक अच्छे इंसान बन चुके थे। और विभूतिनारायण राय ने आज़मगढ़ में एक लाइब्रेरी खुलवाई और शर्मा जी को लाइब्रेरियन बना दिया।  उनके पास अनेक खत आया करते। जो अब एक किताब की शक्ल में छप भी चुके हैं।

(२)                                                                                  *****

गोवा की आग्वाद जेल में बंद कैदी नम्बर 307- सुधीर शर्मा, उन चुनिंदा लोगों में से है, जिन्होंने ख्वाहिशों के खतों को जी भर के कागजों पर उतारा है।

इस कहानी को आप जिस नज़र से देखते हो फरक नही पड़ता, -दुखान्तिका सी भीतर उतर यह कहानी समय का चाक बन गई।

सुधीर अचानक गायब हो जाता है. जेल से निकलने के बाद साहित्य से अपने इस जुड़ाव के लिए सुधीर को सम्मानित भी किया जाता है, और वह अपने आत्मकथात्मक संस्मरण भी लिखता है. लेकिन किसी भी जगह सुधीर न तो लेखिका का, न उनके द्वारा की गई आर्थिक मदद का और न ही उनके साथ चले इस बेहद गहरे भावनात्मक पत्राचार का जिक्र करता है. लेखिका इसे एक सवर्ण कैदी को सम्मानित किये जाने और उसके द्वारा एक दलित लेखिका के साथ भावनात्मक धोखाधड़ी की तरह देखती हैं. सुधीर के नाम किताब के अंतिम खत में वे लिखती हैं - और   'युद्धरत्त आदमी'' के एक अंक में छपा भी था ::--


असल में आपसे पत्राचार करने वाले लेखकों-लेखिकाओं की सूची पढ़ते समय, मैं उनमें अपना भी नाम ढू़ंढ़ने लगी थी, मगर हर बार मुझे निराशा ही मिली. क्या आपने कभी किसी को मेरा नाम नहीं ''


मैं फिर से वही बात कहूंगी सुधीर जी, “अपराध की अंधेरी गलियों से गुजरते युवक सुधीर शर्मा ने क्या कुछ झेला सहा, उन तल्ख यादों के मीठे संस्मरण'_' भारतीय लेखक' 2004 और 2005 के अंक में छपे। मगर उस संस्मरण में भी आपने मेरी उन बातों को कोई स्थान नहीं दिया। जबकि हमारे पत्र व्यवहार का इतना लम्बा समय बीता है, कितनी बातें होती रहीं हमारे पत्रों के बीच? मगर कहीं कोई जिक्र नहीं, जैसे वे कभी कही थीं ही नहीं। जबकि आप लिखते हैं- मेरी साढे दस वर्ष की सजा खत्म होने में लगभग दो बरस बाकी रह गएथे। साहित्य व साहित्यकारों से मिले प्यार व सहारे ने मेरी सजा को आसान कर दिया था।''

यद्यपि गोवा की सेन्ट्रल जेल में आपके साथ अन्याय हुआ, आपके साहित्य शौक पर रोक लगाई गई, तब असगर वजाहत स्व.भीष्म साहनी, स्व. राजेन्द्र यादव, मैनेजर पाण्डे लगभग तीस साहित्यकारों के हस्ताक्षर के साथ की गई अपील से आपको न्याय मिला। यह बात आपने अपने पत्रों में लिखी थी। आपकी उस पीड़ा को जानकर मुझे भी दुख हुआ था। आपको पढ़ने-लिखने और पत्र पाने के अधिकार दिलाने में श्री विभूतिनारायण जी और सुमन्त भट्टाचार्य जी का योगदान बहुत बड़ा है। ऐसे सहयोगी यदि सभी कैदी को मिलें, शोषण और अन्याय-अत्याचार से पीड़ित दलितों को भी मिलें, तो क्या उनके जीवन में भी परिवर्तन नहीं हो सकता ''.......... ( बहुत गहरी और सघन है उदासी।..... यह उक्त ख़त का अंश है।)

जाने क्यों हम  लोग खासकर जीवन को प्यार करने और उसकी कामुक तहों से जुड़ाव की हद तक गहरे जुड़कर भावुकता के बेहद बीमार स्तर की तरफ झुकाव हो जाता-  और यही कुछ मेरे साथ भी हुआ- कैदी सुधीर शर्मा से सहानुभूति अचानक ही खत्म हो गई- और घ्रणित तरह की विरक्तियों सूग और हिकारत का घोलमेल सा बन गया था-- मगर हमेशा की तरह जब इस भावुक जंजाल से बाहर निकला तो लगा भाई सतीश-- टिक जाओ, बाज आओ... और बस लिखा हुआ लिखे की तरह ही लेकर निकल लिया... मगर यह भी है कि जब स्कूली दिनों में इस खंड को पढा तो युवतर लड़के की तरह ही- जो स्वाभाविक भी था, बड़ा नाम कमाता रहता अक्सर- जब तक कि ख्यालों की हीरोगिरी को दूसरा कोई पात्र नहीं मिल जाता था। सुशीला जी टाकभौरे के चेहरे मोहरे को याद या कहें की इमेजिनेशन में ढालते हुए. लगातार.... फिर भूल गया...।

                           सतीश छिम्पा

 

आवारा की विदर्भ डायरी -


सड़क पर चलते हुए, ठप ठप, टप-टप की आवाज़ें, आगे जाकर बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा,... जैसे सदियों पहले ही मर चुके हों शब्द, भाषा अलोप हो गई हो जैसे...  दरख्तों, पौधों और पशु पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक लोप हो गयी हो। जैसे मर गया हो सब कुछ यहां, कुदरत का शब्दकोष जल गया लगता था। ज़बान बस बोझ थी। भाव सब अभाव में लौट लगाकर ठस गए थे।
-" प्यार...."कौन था जो बोल गया इस वर्जित शब्द को जोर से...जानता हूँ, कभी भी किसी को भी यह पता नही लगेगा।

यही कुछ चलता ही रहने वाला था मगर अचानक नज़रों ने आंखों को धोखा दे दिया, निःशब्द बात हुई, इकरार और इनकार के बीच का स्पेस भरने का काम अब नए बने शब्द करेंगे, जब कभी वे बन गए तब....  वे दो बड़ी बड़ी काजल लगी आंखें,  जो घनघोर उदासियों में भी उदास होना नही जानती थी। एक शरारत, प्यार करने को ललचाई और नश्याई आंखों में निमन्त्रण भरी मुस्कुराहट का तिलिस्म, नीचे के होंठ की शेप जो बाद में पता चलता है कि ये सब उसकी कुदरतन खूबसूरती है।

बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा टूट गया, कल...कल...कलकल बह निकला,...    शब्द जो लगता था कि मर गए, जीवन के गीत गा रहा हैं, अलोप हो गई भाषा मुखरित होकर अखर रच रही है ..  दरख्तों, पौधों और पशु -- पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक  हवाओं के शीतल वेग के साथ लौट रही हो। भाषा जो हर कहीं खत्म होने और लोप होने के खतरों से जूझ रही थी, उसकी हंसती आंखों के शब्दों को उधार लेकर बचा लिया है भाषा ने अपना अस्तित्व।

शब्दकोष सीने से लगाकर, जीभ को बोझ मुक्त करके एक गहरे और सघन चुंबन के साथ बाइज्जत बरी कर दिया गया है। वो गहरे समन्दरों से मुट्ठी भर मोती ले आती थी। वो एक जो इस धरती की मिट्टी की पैदाइश नही लगती थी.....   प्रीत के महीन धागों से बुनी गई थी। जिसके सपनो में असंख्य रंगों से भरी रंग-बिरंगी आकाश गंगा हर रोज आती थी। जिसकी एक छब देखने को इच्छाओं की भी इच्छाएं तरस जाती है। कामनाएं, धारणाएं, इच्छाएं सब की सब भटक कर निरर्थक हो जाती है।
   
वो अब कहाँ है..... कहाँ हैं अब वो लड़की.....?

 ● सतीश छिम्पा

Tuesday, 13 October 2020

हमारे पूरोधा - (१)

 

लोक भाषाओं में हमारे पुरोधा...                                   

प्रेमचंद को या 'उसने कहा था' जैसी महान रचना देने वाले चन्द्रधर शर्मा गलेरी, या पंत, प्रसाद या भारतेंदु हरिश्चंद्र या फिर वैश्विक स्तर पर टॉलस्टॉय या बाल्ज़ाक या बाई जुई या मार्खेज.... आदि महान शख्सियत अपनी जो छब या छटा या रचनात्मक रूप गुण का प्रभाव रखते हैं वैसा ही असर रखते हैं हमारी लोक भाषाओं के महान मगर हमारी अज्ञानता के चलते अनजान बने रहने और अल्पज्ञात समझे  जाने वाले रचनाकार...... भाई वीर सिंह, मोहन सिंह, जसवंत कंवल,  गुरदयाल सिंह,  गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी आदि....... और अजमेर सिधु भाई एक अद्भुत कहानीकार जिनको  अगर मैं समकालीन पंजाबी कहानी का लीजेंड कहूँ तो भी अतिश्योक्ति नही होगी, अपनी अद्भुत कहानियों के बावजूद इस महान काम के लिए प्रसिद्ध  हैं। हिंदी जमात या कहें भारतीय भाषाओं के पाठक अगर इन महान वीरों के अवदान बाबत जो थोड़ा बहुत  जानते हैं - वो सब अजमेर भाई के मार्फ़त या कहें उनकी लिखतों के मार्फ़त अमर हुआ है हमारा स्वर्णिम अतीत।

यह तस्वीर किसी भांत के महिमामंडन के लिए नही बल्कि दो अग्रज पुरौधा लेखकों की इस तस्वीर को देखकर आए समकालीन युवा रचनाकार के भीतर उठे भाव हैं जो तुलनात्मक या मूल्यांकन के लिए नही बल्कि दो समयों के भीतर के स्पेश को जानते हुए, इनके अवदान का परिचय भर देना चाह रहा है।



हमारे पुरौधा... (१)

गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी

गुरबख्श सिंह प्रितलड़ी का जन्म 26 अप्रैल 1895 को सियालकोट में हुआ था। उनके पिता का नाम पेशावर सिंह और उनकी माता का नाम मिलणी कौर था। उनके पिता की मृत्यु हो गई जब वह केवल सात वर्ष के थे। गुरबख्श सिंह आदर्शो पर चलने वाले, सत जीवन के और सकारात्मक दीठ के सूझबूझ और उज्ज्वल जीवन के स्वप्नदर्शी ही नही बल्कि उन देखे हुए स्वप्नो को हकीकतन रूप देने वाले व्यक्ति थे।

पंजाबी साहित्य के लियो टॉलस्टॉय की तरह से दिखने और व्यवहार और लहजा जो उनका मौलिक था। किसी दरवेश की तरह का पाक साफ और काल्पनिक या मिथकीय पत्रों की तरह अलौकिक चमत्कारी भेष और उजास भरे शब्द..... पंजाबी साहित्य के इस टॉलस्टॉय के लिए लोगो का मानना था कि वे दुनिया को बर्ट्रेंड रसेल की तरह एक समुदाय के रूप में देखना चाहते थे, बेशक अव्यवहारिक, मगर मिथ स्वप्नों सा रोचक है।

मार्क्सवाद के सिंपेथाइज़र थे और इस दीठ से वे अक्सर अक्टूबर क्रांति के महान कारज और उनके तेज गति से विकसित होने की प्रभावशाली स्थापनाओं  और धारणाओं और सिद्धांतों से सहमत और प्रभावित भी थे, वे मार्क्सवाद के आर्थिक और सामाजिक समानता के इस महान सिद्धांतों के समर्थक थे। उन्होंने लोगों से जाति और रंग भेद से ऊपर उठने को कहा।

गुरबख्श सिंह मार्क्सवादी विचारधारा और सोवियत मेहनतकश व्यवस्था के बहुत करीब थे। वे पहले ही व्यक्ति थे जिन्होंने मैक्सिम गोर्की के महान रूसी उपन्यास "मदर" का पंजाबी में अनुवाद किया.... और 1971 में, उन्हें सोवियत नेहरू पुरस्कार मिला।

गुरबख्श सिंह पंजाबी में एक नई, मानव हित और प्रेमिल, मानवजनित विचारधारा को स्थापित भी किया और इस सिद्धांत पर अपने सभी कार्यों को अनुकूलित किया। प्लेटो के प्लेटोनिक प्रेम के नक्शेकदम पर चले सिद्धांतो को हल्का और धुंधला रहे भावों की तरह हटाने के बाजाए उन्नत मानवोचित स्वभावो का गांभीर्य भी स्थापित किए और परम्पराओं में थापित हुए, गुरबख्श सिंह ने प्यार को कब्जे की भावना के साथ असंगत बताया और सहज प्रेम की अवधारणा को समझाया। प्रीत झरोखा से उनके संपादकीय, लेख और कॉलम के बारे में चर्चा, जो कि प्रिटाल्डी में प्रकाशित हुई थी, पंजाब के पाठकों के बीच आम थी। स्वास्थ्य पर उनके लेख युवा लोगों में नई स्वस्थ सोच विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उन्होंने सियालकोट से 10 वीं पास की थी। उन्होंने लाहौर में उच्च अध्ययन के लिए कॉलेज में प्रवेश किया। आर्थिक तंगी के कारण, उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया क्योंकि खेतीबाड़ी बहुत जरूरी थी जिसके बिना घर की तरफ देखा तक नही जा सकता था.... साथ ही आजीविका में रुपये के लिए क्लर्क की नौकरी कर ली। फिर उन्होंने सेना में भर्ती होकर इराक और ईरान का रुख किया। वहाँ उन्होंने एक ईसाई मिशनरी रेवरेंड मिस्टर स्टैंड से मुलाकात की और उनकी सलाह पर आगे पढाई जारी रखी।

उन्हें इंजीनियरिंग में उच्च अध्ययन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय में दाखिला दिलाया। उन्होंने 1922 में इंजीनियरिंग में अपनी बीएससी की डिग्री प्राप्त की। जब वह लौटा, तो उसे रेलवे में नौकरी मिल गई।

1932 में इस नौकरी से मुक्त होकर, उन्होंने नौशेरा की जगह पर जमीन ली और खेती, वैज्ञानिक ढंग से और स्थानीयता के भरपूर गहरे अनुभवों और  वैज्ञानिक तरीके की सांझ से खेती शुरू की।

एक आदर्श समाज बनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए सितंबर 1933 में एक मासिक पत्रिका प्रितलारी का प्रकाशन शुरू किया। प्रितलारी पंजाबी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक मील का पत्थर था। यह मासिक पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ साथ ही पंजाबी अदब में वैज्ञानिक, या कहें आधुनिक बदलाव बिंदु भी स्थापित किए, प्रयोगों को जमीन जो वैचारिक हो को यहां मुहैया करवाया।

उठापटक अलगावों भरे तीसरे दशक में वे मॉडल टाउन लाहौर चले गए। कुछ साल बाद, 1938 में, उन्होंने 15 एकड़ की जमीन बराबरी से लाहौर और अमृतसर के बीच प्रीत नगर की स्थापना की। 1947 में देश के विभाजन के दौरान,  प्रीत नगर निर्जन हो गया था और वे दिल्ली चले गए लेकिन वहाँ उन्हें यह पसंद नहीं आया। वह 1950 में प्रीत नगर लौट आए और उनका पुनर्वास किया और उनकी मृत्यु तक वहीं रहे।

जसवंत कंवल  (२)

भारतीय भाषाओं का बाबा बोहड़- कंवल

इधर भारतीय भाषाओं के कुछ महान लेखक जिनसे हिंदी के पाठक अभी तक भी परिचित नही है- में से एक जरुरी नाम है जसवंत कंवल। उनका चर्चित उपन्यास  - "लहू दी लौपंजाबी में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है।

सन 1967 ई में पंजाब में नक्सलबाड़ी लहर ने दस्तक दी थी। उस लहर ने कई गहरे प्रभाव पंजाब के जनजीवन पर छोड़े जो भूले नही जाते और जख्म कायम हैं। जसवंत सिंह कंवल का लिखा उपन्यास लहू दी लौभी इनमें से एक है। इसके अनगिनत संस्करणों की पाँच लाख से ज्यादा प्रतियां पढ़ी गई। 1970 के बाद जसवंत सिंह कंवल ने इसे लिखा था। जब इसकी पांडुलिपि प्रकाशन के लिए तैयार हुई तो पंजाब में इसे किसी ने नहीं छापा। फिर आपातकाल लागू हो गया था तो संभव ही नही रहा। 

नक्सलवादी आंदोलन का खुला समर्थन करने वाले कँवल ने उपन्यास 'लहू की लो' पँजाबी में इस संघर्ष के   ऐतिहासिक दस्तावेजों की तरह लिखा। इसकी पांडुलिपि को प्रतिबंधित कर दिया गया था। आखिरकार उन्होंने लहू दी लौसिंगापुर से छपवाया और गुप्त रूप से उसे पंजाब लाया गया। प्रतिबंधित होते हुए भी उस समय  ब्लैक में 700 रूप में बिकने वाला यह संसार का एकमात्र  ही उपन्यास है। पंजाब में तो बहुत बाद में यह आपातकाल हटने के बाद प्रकाशित हुआ, तब भी लोगों ने इसे खूब खरीदा और पढ़ा। लहू दी लो इंकलाबी पराक्रम और दुखांत और पंजाब के किसानों (खेतिहर मज़दूरों) के संघर्ष, उनकी मुश्किलों और उस दौर में नक्सलवाद की बहस तलब प्रासंगिकता का गान था।

'"लहू दी लौपंजाबी में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद भी खूब पढ़ा गया। बहुत सघन कृषि क्षेत्र में आर्थिक असमानता और समाज में जमीनी स्तर पर विचर कर वह उसका सूक्ष्म अध्ययन किया करते थे, इसीलिए उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज की ऐसी छवियां और परछाइयां और पहलू मिलेंगे जो कहीं नहीं हैं। लोक  की नब्ज़ पकड़ने वाला यह रचनाकार  पंजाब का रसूल हमजातोव कहलाता है। उनकी रचनाओं पर लेव टॉलस्टॉय की छाप बिल्कुल भी नही है लेकिन शायद डीलडौल और जीवन शैली के चलते उन्हें टॉल्स्टोय कहा जाता रहा है। वे सत्ता के खिलाफ जाते हुए सिख अलगाववादी आंदोलन से भी खुली सहानुभूति रखते थे ।

उनको महत्वपूर्ण रचनाओं में मुख्य है - "सत्य को फांसी, पूर्णिमा, पाली, रात बाकी है, मित्र प्यारे को, साथी, बर्फ की आग, लहू, की लौ, जिंदगी दूर नहीं चर्चित रचनाएं रहीं। उन्हें मरना है कि जीना, लहू की लौ, कहानी पुस्तक मुक्ति मार्ग, रूपधारा, मानवता, मोड़, सिविल लाइंस, जंगल के शेर, रात बाकी है, पूर्णिमा, मित्र प्यारे को, गोरा मुख्य सज्जनों का, सत्य को फांसी, देवदास, रूह का साथी, कीचड़ के कमल, जिदगी दूर नहीं, सिदूर, कांटे, हाल मुरीदों का, अपना राष्ट्रीय घर, जित्तनामा, उठो सूरमा, नए सुरमे, हाउका और मुस्कान, आराधना, भावना, जीवन आदि पुस्तकें रखकर पंजाबी साहित्य को समृद्ध किया।

कंवल की अपनी दिनचर्या किताबों, लेखन, खेतों और गांव की हथाई और चर्चाओं और लिखने की मेज पर ही शुरू और खत्म होती थी। जसवंत सिंह कंवल ने आपात काल के समय और उससे पहले नक्सलवाद व बाद में पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ अपनी कलाम चलाई। उन्होंने लहू की लौ उपन्यास में नक्सलवाड़ी महान उभार को ओजस्वी स्वर दिए थे। उस समय देश में इमरजेंसी लगी होने के कारण कोई भी पब्लिशर जसवंत सिंह कंवल की इस पुस्तक को छापने के लिए तैयार नहीं था-  ऊपर जो बताया कि विदेश में छपने के बाद जब यह पंजाब आया- तो पाठकों का रैला सा उमड़ पड़ा इसको खरीदने पढ़ने के लिए।

जसवंत कंवल एक ऐसा नाम जिसने अपनी सो साला ज़िंदगी मे  अनवरत अस्सी साल तक लिखा। और जिसको पंजाब का रसूल हमजातोव तक कहा जाता है। जो मार्क्सवादी रचनाधर्मी होने के साथ ही- लगातार निर्विरोध चुना जाने वाला शरीफ ग्रामीण सरपंच के तौर पर भी प्रसिद्ध था- यह गजब का तथ्य है कि जसवंत कंवल अनेक बार गाव के निर्विरोध सरपंच चुने गए। वे  पंजाब, पंजाबी सभ्याचार और समाज के हर उतार-चढ़ाव से बखूबी वाकिफ थे, यहीं कारण है कि उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज की ऐसी छविया और परछाइया और पहलू मिलेंगे जो अन्यत्र कहीं नहीं हैं। लोक रंग की उनकी समझ बहुत सूक्ष्म थी जो उनके किसी दूसरे साथी में  नहीं पाई गई, इसीलिए जब लोग उनको पंजाब का रसूल हमजातोव'  कहते है तो आश्चर्य नही होता।

अजमेर सिधु- वैचारिक नींव (३)

अजमेर सिद्धू ... बेमिशाल कथाकार और जीवन का चितेरा

(25 मई के दिन बंगाल से उठी एक प्रचंड लाल इंकलाबी लहर जिसने ना केवल बंगाली बल्कि आंध्रा और पंजाब को भी रंग दिया इंकलाबी रंग में... और साहित्य को इंकलाबी कविताओं और गीतों का खजाना भी दिया था।)

.....अजमेर सिद्धू ना होते तो मुमकिन नही था शायद यह खजाना सहेजना अगर मुमकिन था भी तो इस बेहतरीन तरीके से नहीं होता। अजमेर भाऊ मेहनतकश वर्ग के हिमायती रहे हैं। विचार और वर्ग सर्वहारा, के प्रति प्रतिबद्ध। ''गदर से लेकर नक्सली तक'' (शहीद बाबा बूझा सिंह जी की जीवनी), 'लालसिंह दिल, सन्तराम उदासी की जीवनी भी इन्होंने ही लिखी- ''क्रांति लई बळदा कण कण" नाम से उदासी पर गजब काम किया है। मूल रूप से कहानियां  लिखते हैं। अजमेर  के चार कहानी संग्रह छप चुके हैं।

पंजाबी साहित्य पर कम्युनिष्ट किसान उभार का बहुत गहरा और भरपूर प्रभाव पड़ा था जो आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाता है। इस इंकलाबी दौर और उसके बाद के लेखक कवि विस्फोट की तरह निकले थे। लेकिन उन तक या उनकी लिखतों तक पहुंच बनानी भी तो आसान नही थी। भले ही कोई कितना ही झूठ बोले या स्थापित करना चाहे लेकिन  आखिरकार यह स्वीकार करने में कोई मुश्किल नही होनी चाहिए कि अगर पंजाबी के युवा रचनाकार (सौभाग्य से मेरे दोस्त भी हैं।) अजमेर सिधु जी के ही प्रयासों, लग्न और मेहनत का नतीजा है कि आज हम पंजाबी की क्रांतिकारी विरासत के संतराम उदासी, बाबा बूझा सिंह और लाल सिंह दिल जैसे इंकलाबी कवियो से परिचित हैं। जसवंत कंवल ने 'लहू दी लो' उपन्यास लिखा जो इसी पृष्टभूमि पर था- प्रतिबंध लगाने के कारण वाया सिंगापुर, उस समय 600- 1000 रुपये तक के ब्लैक में बिका था, एक ही महीने में इसके सभी कॉपी बिक गई थी।

25 मई 1967-69 और 1969 से 1970 ई. तक के तीन साल लगातार चलने वाला  महान किसान उभार और संघर्ष जो 1972 ई. में खत्म हुआ अति -आत्मविश्वासी नेतृत्व और स्थितियों को समझे बिना लिए गए निर्णयों   के कारण और अन्य हुई गलतियों  के चलते वे युवा कतारें जो शहीद हुए या जो दमन और टॉर्चर के कारण हीन हो गए। या जो आए थे उभर कर कलाओं की राह से या भूमिगत जीवन से जो निकले थे। यह दुखांत था एक ऐसे क्रांतिकारी उभार का जो तेलंगाना से भी आगे जा सकता था। लीडरशिप की मूर्खताओं और  निर्णयों के चलते असंख्य युवाओ की शहादत और तसदत्त और मौत के बाद तीन साल में ही राजसत्ता के दमन से यह बिल्कुल खत्म हो गया।

पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी नक्सल लहर में पंजाब के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। मास्टर हरपाल से लेकर जसवंत कंवल और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे, वे भी शामिल हुए थे। बलदेव सिंह मान, सतनाम, अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़ और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।। उनमें से कई तो कालजई कविताओं के रचयिता  भी थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे सब जो उस समय या उसके बाद खालिस्तानी अतिवाद के शिकार हुए वे अद्भुत सर्जक निकले। सन्तराम उदासी, पाश, खटकड़ और लालसिंह दिल जैसे अनेक बेहतरीन क्रांतिकारी कवि थे। राज सत्ता और धार्मिक अतिवादी, लोकल बुर्जुआ किसी भी नक्सल को बख्शना नहीं चाहते थे।    

भयानक गरीबी, आर्थिक सामाजिक असमानता, अन्याय, शोषण कुपोषण और राज सत्ता के बर्बर दमन और अनदेखी के विरुद्ध उठे प्रचण्ड आक्रोश की लहरों के साथ इंकलाबी लाल परचम उठाए युवा क्रांतिकारियों को उस समय ताजा उठे नक्सलबाड़ी  किसान उभार से आस बंधी और वे सभी युवा जो जीवित थे, क्रांति की महिमा से वाकिफ़ थे, इस लहर में शामिल हुए। यह अलग मुद्दा है कि कुछ तानाशाही और मूर्ख नेतृत्व के कारण एक महान उभार कुछ ही समय मे दमन का शिकार होकर खत्म हो गया।

यह लहर पश्चिम बंगाल के बाद आंध्रप्रदेश और फिर पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी  थी। इसमें पंजाब सहित देश के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे।  इस क्रांतिकारी लहर ने जब तक दुःसाहस की लाइन नहीं पकड़ी तब तक यह एक खालिस मानव मुक्ति का युद्ध थी जिसमे अनेक कवि, लेखक, कलाकार, रंगकर्मी आदि खुलकर शरीक हुए और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति भी इसमें शामिल थे। हाकिम के अन्याय और अत्याचार से व्यथित होकर वे भी शामिल हुए थे।  अनेक कवियो की कविता का जन्म भी इसी समर में हुआ। हरभजन सोही, अमर सिंह अचरवाल और दर्शन खटकड़ जैसे और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।

लाल सिंह दिल जो बेहतरीन क्रांतिकारी के साथ कवि भी थे जिनका घर किसी खंडहर की तरह हो गया था। इस महान क्रांतिकारी कवि को पंजाबी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में हाशिए पर डाल रखा है। इनके अब तक के संग्रह जो मैंने मूल पंजाबी में पढ़े हैं, वे निम्न है,   'सतलज की हवा', 'बहुत सारे सूरज', 'सत्थर', और आत्मकथा 'दास्तान' (दास्तान मैंने नहीं पढ़ी अभी), हालांकि वे चर्चित थे मगर उस तरह से नहीं जिस तरह से उन्हें होना चाहिए था। जबकी पाश की प्रसिद्धि उनकी शहादत के कारण भी हुई थी। यह बाद का मुद्दा है कि किसी ने सार सुध नहीं ली। महान लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत से दोलित होकर ट्राटस्की की तरफ मुड़ जाना या उनके विरोधियों द्वारा यह कुत्सा प्रचार भी एक मुख्य कारण था।     

सन 1967-69 और 1970-71 के साल गदर मचाने वाली नक्सल लहर के बहुत ज्यादा सक्रियता और उभार के साल थे। देश के हर एक संकट की मार आम आदमी पर पड़ रही थी । सन 1967 ई में पश्चिम बंगाल से शुरू होने वाली कम्युनिष्ट लहर जो एक महान कम्युनिष्ट क्रांति में बदलने लग गई थी की देन है पंजाबी साहित्य में आमूल चूल बदलाव और जीवन और उसकी गरिमा को स्थापित करने वाली इंकलाबी कविता का उत्स जो किसी उजास की तरह से हुआ था। जबकि इससे पहले जो प्रेम और व्यक्तिगत संघर्षों के महिमा मंडन, प्यार के बीमार पक्ष मतलब निराशा, जुदाई आदि का हावी होना बहुत अश्लील था। यह अमृता प्रीतम और शिव कुमार बटालवी का दौर था।  शिव कुमार बटालवी के गीतों में प्यार के संक्रामक पक्ष, उसकी "बिरह की पीड़ाइस कदर सघन थी कि उस दौर में पंजाबी ही नही बल्कि भारतीय भाषाओं में कई बड़ी कवयित्री  अमृता प्रीतम ने उन्हें बिरह का सुल्ताननाम दे दिया था। शिव कुमार बटालवी पंजाबी का वह शायर जिसके गीत भाषाओ के बंधनों को तोड़कर आजाद हो चुके थे। पंजाब ही नही बल्कि उसकी ख्याति हर कहीं फैली थी। उसने जो गीत अपनी गुम हुई महबूबा के लिए किसी छुपे प्रेमी की तरह की इबारत की तरह लिखा था वो जब स्टेज पर होते तो अनेक फरमाइशें आती थी इस एक गीत की।

साहित्य पर कम्युनिष्ट किसान उभार का बहुत गहरा और भरपूर प्रभाव पड़ा था जो आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाता है। इस इंकलाबी दौर और उसके बाद के लेखक कवि विस्फोट की तरह निकले थे। लेकिन उन तक या उनकी लिखतों तक पहुंच बनानी भी तो आसान नही थी। भले ही कोई कितना ही झूठ बोले या स्थापित करना चाहे लेकिन  आखिरकार यह स्वीकार करने में कोई मुश्किल नही होनी चाहिए कि अगर पंजाबी के युवा रचनाकार (सौभाग्य से मेरे दोस्त भी हैं।) अजमेर सिधु जी के ही प्रयासों, लग्न और मेहनत का नतीजा है कि आज हम पंजाबी की क्रांतिकारी विरासत के संतराम उदासी, बाबा बूझा सिंह और लाल सिंह दिल जैसे इंकलाबी कवियो से परिचित हैं।

25 मई 1967-69 और 1969 से 1970 ई. तक के तीन साल लगातार चलने वाला  महान किसान उभार और संघर्ष जो 1972 ई. में खत्म हुआ अति -आत्मविश्वासी नेतृत्व और स्थितियों को समझे बिना लिए गए निर्णयों   के कारण और अन्य हुई गलतियों  के चलते वे युवा कतारें जो शहीद हुए या जो दमन और टॉर्चर के कारण हीन हो गए। या जो आए थे उभर कर कलाओं की राह से या भूमिगत जीवन से जो निकले थे। यह दुखांत था एक ऐसे क्रांतिकारी उभार का जो तेलंगाना से भी आगे जा सकता था।  चलते असंख्य युवाओ की शहादत और तसदत्त और मौत के बाद तीन साल में ही राजसत्ता के दमन से यह बिल्कुल खत्म हो गया था।



पाश और जयमल पढा, संतराम उदासी और दिल भारतीय समाज के थल्लड़े वर्ग के शोषण के विरुद्ध राजसत्ता के प्रतिरोधी तूफान की तरह खड़े हुए तो बाद में उनके संघर्षों के कवि भी थे।

एक अद्भुत कहानीकार जो पंजाबी का शोलोखोव (अक्सर मैं कहता हूँ भाई साहब को) है, अपनी अद्भुत कहानियों के बावजूद इस महान काम के लिए प्रसिद्ध हर हैं। हिंदी जमात या कहें भारतीय भाषाओं के पाठक अगर इन महान वीरों के अवदान बाबत जो थोड़ा बहुत  जानते हैं - वो सब अजमेर भाई के मार्फ़त या कहें उनकी लिखतों के मार्फ़त अमर हुआ है हमारा स्वर्णिम अतीत।

 

  सतीश छिम्पा...


एक उजास भरा पन्ना

आवारा की डायरी...... एक उजास भरा पन्ना- एक नही वे अनेक थीं.....                                                                 ...