Sunday, 18 October 2020
आवारा की विदर्भ डायरी
Thursday, 15 October 2020
किसान उभारों का कविताओं पर प्रभाव
Wednesday, 14 October 2020
क्या आप कैदी नंबर 307 को जानते हैं?
कथेतर गद्य :-
गोवा की यरवदा जेल में बंद कैदी नम्बर 307- सुधीर शर्मा, उन चुनिंदा लोगों में से है, जिन्होंने तमाम कुख्यातियों के बावजूद गुमनाम होते हुए भी बहुत सघन और गहरी चर्चाओं में जगह बनाई और राजेंद्र यादव, भीष्म साहनी और मनोज रूपड़ा जैसे रचनाकारों की जिसमे रुचि जगी, पत्रों का आना जाना शुरू हुआ और बौद्धिक जगत में एक नाम बनकर उभरा :- सुधीर शर्मा जिसने अपनी दमित, अतृप्त इच्छाओं को जेल की कालकोठरी में खतों के बहाने से जी भर के लिखा है...
सुधीर
के पास अनेक खत आया करते। जो अब एक किताब की शक्ल में छप भी चुके हैं।
कैदी
नंबर 302 उर्फ सुधीर शर्मा के लिए बौद्धिक छटपटाहट, उकलाहट,
बेचैनी और सहानुभूति किस शिद्दत से थी। किस चाहत के वश राजेन्द्र
यादव से लेकर भीष्म साहनी तक के दिग्गजों ने सुधीर का साथ दिया। भावनात्मक संबल
और- सहयोग दिया वो आपको स्थापित कथाकार मनोज रूपड़ा के इस खत (माफी के साथ कि इसको
अभी पूरा नही दूंगा और ना ही यह रचना पूरी पोस्ट करूँगा- छपते समय पूरा होगा,
अभी आंशिक ही।) से सहज पता लग जाता है।
"आपका
पत्र बहुत लंबा और कसा हुआ था जिससे यह साबित होता है कि आप अच्छे से अपनी समझ को
पकाने का प्रयास कर रहे हो मुझे यकीन है साहित्य और समझदार लोगों में आपको
सम्मानजनक जगह मिलेगी। आपने जिस गहराई से मेरी कहानी को महसूस किया है और जितनी
गंभीरता से उसे परखने की कोशिश की है उसके लिए शुक्रिया अपने दो-तीन बार पत्र में
विशेष जोर देकर इस बात को दोहराया कि आप प्रबुद्ध पाठक नहीं है इसलिए कहानी के
बारे में कोई पक्की और व्यवस्थित बात नहीं कह पाएंगे लेकिन मैं समझता हूं उसकी
जरूरत भी नहीं है ....क्योंकि किसी भी रचना के बारे में कोई ठोस बौद्धिक निष्कर्ष
निकालने की बजाए उस रचना के भीतर की संवेदना के साथ अपने आप को रच लेना एक पाठक के
लिए ज्यादा जरूरी है।
एक 'रचाव' 'पाठक के भीतर भी होना चाहिए यह लेखक की भी
सबसे बड़ी खूबी है कि उसकी रचना पाठक के भीतर क्या-क्या रच सकती है
लेकिन
हां एक खतरे से मैं आपको अदा कर दु!
कभी
भी किसी कहानी को इतनी बुरी तरह से गले मत लगाओ कि वह आपकी बाहों में दम तोड़ दे
कई पाठक होते हैं जो किसी खास कहानी को ही बंदरिया के मरे बच्चे की तरह गले लगाए
रहते हैं इससे पाठक की प्रगति भी बाधित होती है और लेखक अभी एक खास तरह के
मैनरिज्म में बंध जाता है
आपका
जीवन सचमुच विभिन्न और असभविक उबड़ खाबड़पन से गुजरा है और गुजर रहा है इस तरह के
अनुभवों का अगर वाजिब इस्तेमाल किया जाए तो यथार्थ को तरासने के सबसे ज्यादा कारगर
औजार बन सकते हैं आपने मैक्सिम और द साद के बारे में शायद न पढ़ा हो दोनों लेखकों
ने जीवन के सबसे महत्वपूर्ण दिन जेल में बिताए थे और जिस ब्यानर के यथार्थ का
उन्होंने पर्दाफाश किया उससे समुच्चय युग रूह कांप उठी थी वे क्रांतिकारी लेखक
नहीं थे ना ही उनमे किसी सामाजिक संकट से टकराने की हिम्मत थी वे भयानक स्नायविक
तनाव से ग्रस्त थे उन्हें सेक्स ड्रग्स और यौन अपराधों के अमर्यादित आवेग ने अपने
घेरे में घसीट लिया मुझे लगता है कि आपके साथ ही शायद कुछ ऐसा ही हुआ था...."
कैदी सुधीर शर्मा के पत्रों के संकलन में उसने जो सुशीला टाकभौरे को लिखे एक पत्र का अंश ... '‘खुशी व उत्तेजना से मैंने सीधे अपना बिस्तर पकड़ा और आपके पत्र को खोलकर पढ़ना शुरू किया। जैसे- जैसे पत्र पढ़ता गया, खुद में सिमटता चला गया। मैंने पत्र को बड़ी देर में खत्म किया, क्योंकि पत्र ने हर पंक्ति के साथ इतना उद्वेलित किया कि मैं उसी के भंवर में काफी देर तक डूबता-उतरता रहा. मेरी यह उथल-पुथल इतनी गहरी थी कि लाख रोकने के बाद भी वह चेहरे पर उतर आती. क्या आप यकीन करेंगी कि बीच में तीन जगह मैं इतना भाव विकल हो उठा कि मेरी आंखें नम हो उठीं. एक बार पढ़ने के बाद, मैंने फिर-फिर पत्र को पढ़ा. हर बार पढ़ते हुए मेरी गम्भीरता ऐसी हो गयी कि आसपास का वातावरण उससे प्रभावित हो गया. साथियों की हिम्मत ही न हो पा रही थी कि वे मुझसे इस गम्भीरता के बारे में कुछ पूछें. वे मेरी गम्भीरता से खुद ही गम्भीर हो गये और चोर नजरों से मुझे देखने लगे... फिर हिचकते, सकुचाते हुए बोले - ‘शर्मा भाई, क्या बात है जो इतने उद्वेलित हो गये ?’ मैं हल्के से मुस्कुराया और बोला- ‘ऐसी बात है दोस्तों कि इस पत्र ने मेरी आत्मा में प्रवेश करके इसके बहुत-से दाग-धब्बों को धो-पोंछकर, उसे नये रूप में चमका दिया है । आत्मा की धुलाई-पुछाई में ही मैं इस तरह उद्वेलित हो गया.....'’
मध्यम
या निम्न मध्यम वर्ग का औसत से कोई लड़का अस्सी के दशक में क्या सपने देखता होगा।
नौकरी,
पैसा, प्रेमिका या जीवनसाथी या आवारगी,
फक्कड़ बेपरवाही या मौज मस्तियाँ या यायावरी- कला- रंगमंच या इसी तरह
के ही होते हैं ज्यादातर सपने। मिठास, जो जीवन मे कम हो या
हो ही नही तो सपने गुड़ की समूची बोरी में बदल जाते हैं। सभी के नही, कुछ एक उसमे बागी, बगावत और अन्य सपने पालते हैं तो
कुछ मिथुन की तरह फिल्मी दादा या गली का गुंडा या भाई का पट्ठा या अंडरवर्ल्ड का
डॉन- कातिल, हत्यारा, नशेड़ी, गंजेड़ी, या जुआरी सटोरिया या जिंदगी के कोठे का भड़वा
। वो बहुत समय तक या कहें बरसों बरस तक
दादागिरी, हत्या, लूटपाट और नशे की
दलदल में फसे रहे। उन पर अनेक मामले थे शायद और कुछ बड़े केस बजी दर्ज हुए। जिसमे
मार कुटाई से लेकर अन्य झूठे मामले भी
शामिल थे। अपनी जिंदगी के कई साल बर्बाद
करने के बाद - एक दिन हैरोइन रखने के
जुर्म में
अरेस्ट
हुआ और बीस साल तक जेल में बंद रहने के
बदल गया सब कुछ...... लेकिन फिर भी इतना जानना भी जरूरी है...
नाम सुधीर शर्मा हैं। माफ़िया से निकला यह शख़्स उसी अंडरवर्ल्ड माफिया के बेताज बादशाह करीम लाला का ख़ास था। इसको भाई या दादा के नाम से भी जाना जाता होगा। आप लगभग दो दशक तक गोवा समेत अन्य जेल में भी रहे हैं। सुधीर अंडरवर्ड के डॉन हाजी मस्तान , करीम लाला के खास तो थे ही बल्कि उनके साथ काम भी किया। तमाम बुरे और खराब और गैरकानूनी धंधे जो एक डॉन कर सकता था या करता था - में उसके सभी गुर्गे भी शामिल होते हैं। खतरनाक समय। खतरनाक जगह। ख़तरनाक़ लोग। खतरनाक सड़क। खतरनाक गली..... लाशें... लाशें और बस लाशें ही लाशें।
जो
खराबा किसी तुष्टीकरण के चलते बढा था वो जो अब तक एक बर्बरान मिजाज के साथ ही कोमल
भाव परोटे हुआ था- वो समय गुजर गया था और
अब दाऊद जो दुबई में था- उसके गुर्गे अबू सलेम या राजन या जो भी हो- आतंक का
पर्याय थे- उन सब मे से एक मजदूर जो जमीन से उठकर आया- अरुण गवली था। अरुण गवली, मान्या सुर्वे, लाला, पठान और
दाऊद... सरगर्मियां ज्यादा हुई तो पुलिस ने
खोल दिए बंदूकों के मुंह और अपराधी और गैर
अपराधी सब के सब एनकाउंटर जो सच्चे भी और थे झूठे भी- सड़क पर लाशें बनकर बिखरे थे।
अंधा- धुंद गोलियों और उनकी दहशत, जीवन जैसे उजड़ गया हो।
जवान बेटों की देह लाशें बन पसरी थी। नशा, नशा, नशा और बस नशा-- स्मगलर्स का करोड़ो के इस व्यापार के पसराव के साथ ही बढ़ता
गया हथियारों का बाजार। और मौत का नंगा नाच भी।
सुधीर
इन सबमे शामिल था या नही था- मालूम नही लेकिन उसके भीतर उजास जो उम्मीद बनकर आया
इन सब मे से , आज का वो आधार और नजरिया, सब वहीं से आए थे। ड्रग्स
स्मगलिंग, या बढाते रहने के जुर्म में उसको गोवा कारागृह में
डाल दिया गया ।
यहां
उसका प्लस पॉइंट जुड़ता है वो है बचपन से ही उसका किताबो व पेपर पत्रिका व फिल्मो का चाव। जेल में किताबों का साथ नहीं
छोड़ा फिर जब जेल से छूटे तो श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय आजमगढ़ में आ गये।
यहां
उनको साहित्यिक आधार मिला। उनके मित्र बताते हैं कि विख्यात पत्रिकाएं जैसे हंस, वर्तमान साहित्य, तहलका, पाखी,आह ज़िन्दगी, इंडिया टुडे, वागर्थ,
जनपथ और आउटलुक निरंतर उनकी अध्ययन सामग्री में शामिल थी। जो इनके
कारण इनके दोस्त लोग भी सआदत हसन मंटो, हरिशंकर परसाई ,
कबीर ,मुंशी प्रेमचंद ,मोहन
राकेश ,विजय दान देथा, कमलेश्वर,
राजेंद्र यादव के बारे में पता चला। इस बंदे का जेल जाने की कथा भी
अपने आप मे बेहतरीन है।
पूरा
का पूरा गैंग उन पर हंसने लगा और कहा कि ये जानवर का ख़ून देखकर और जानवर कटते
देखकर डर जाने वाली क़ौम है। क्या मज़ाक़ है- एक पठान ने पूछा कि निहारी खाते हो।
.पटककर गर्दन भी रेत देते.गोलियाँ भी चलाते.करीम लाला को गिरफ़्तार करना पुलिस के
लिए चुनौती थी लेकिन पुलिस हाथ नहीं डालती.कभी हाथ भी डालती तो करीम लाला के
दिग्गज वकील चुटकी में छुड़ा लेते। करीम
लाला के भतीजे समद ख़ान को दाऊद ने अहमदाबाद में घेरा। समद ख़ान कार से था और
सुधीर शर्मा उसी में बैठे थे। दाऊद ने कार गोलियों से छलनी कर दी। .लेकिन दोनों बच
निकले,
अब एक दिन अपनी बिल्डिंग की लिफ़्ट से उतरते समय समद ख़ान को दाऊद
ने गोली मार कर हत्या कर दी।
पठान
गैंग का खात्मा होते ही करीम किसी होटल को चलाने लगा और सुधीर शर्मा ड्रग्स में
पकड़े गए अठारह साल की जेल हुई। गोवा जेल में क़ैद रहे।
यह
प्रसिद्धि उनको जेल में मिले साहित्य ल कारण ही मिली थी, उनको साहित्य पढ़ना अच्छा लगा।
किताब लिखी, चिट्ठी द्वारा एक तत्कालीन आइपीएस और विख्यात
कथाकार विभूतिनारायण राय के संपर्क में आर
फिर सुधीर शर्मा से आकर मिले और उनके लिए जेल में मनपसंद किताबों का इंतज़ाम
करवाया।
सुधीर
गोवा जेल में कैदी नंबर तीन सौ सात थे। एक लड़की उनको खत लिखती, स्नेहिल खत, अजीब मजबूत और गरिमामय संबंध था। जब
सज़ा काट बाहर आए तो एक अच्छे इंसान बन चुके थे। और विभूतिनारायण राय ने आज़मगढ़
में एक लाइब्रेरी खुलवाई और शर्मा जी को लाइब्रेरियन बना दिया। उनके पास अनेक खत आया करते। जो अब एक किताब की
शक्ल में छप भी चुके हैं।
(२)
*****
गोवा
की आग्वाद जेल में बंद कैदी नम्बर 307- सुधीर शर्मा, उन
चुनिंदा लोगों में से है, जिन्होंने ख्वाहिशों के खतों को जी
भर के कागजों पर उतारा है।
इस
कहानी को आप जिस नज़र से देखते हो फरक नही पड़ता, -दुखान्तिका
सी भीतर उतर यह कहानी समय का चाक बन गई।
सुधीर
अचानक गायब हो जाता है. जेल से निकलने के बाद साहित्य से अपने इस जुड़ाव के लिए
सुधीर को सम्मानित भी किया जाता है, और वह अपने
आत्मकथात्मक संस्मरण भी लिखता है. लेकिन किसी भी जगह सुधीर न तो लेखिका का,
न उनके द्वारा की गई आर्थिक मदद का और न ही उनके साथ चले इस बेहद
गहरे भावनात्मक पत्राचार का जिक्र करता है. लेखिका इसे एक सवर्ण कैदी को सम्मानित
किये जाने और उसके द्वारा एक दलित लेखिका के साथ भावनात्मक धोखाधड़ी की तरह देखती
हैं. सुधीर के नाम किताब के अंतिम खत में वे लिखती हैं - और 'युद्धरत्त आदमी''
के एक अंक में छपा भी था ::--
‘असल में आपसे पत्राचार करने वाले लेखकों-लेखिकाओं की सूची पढ़ते समय, मैं उनमें अपना भी नाम ढू़ंढ़ने लगी थी, मगर हर बार मुझे निराशा ही मिली. क्या आपने कभी किसी को मेरा नाम नहीं ''
मैं फिर से वही बात कहूंगी सुधीर जी, “अपराध की अंधेरी गलियों से गुजरते युवक सुधीर शर्मा ने क्या कुछ झेला सहा, उन तल्ख यादों के मीठे संस्मरण'_' भारतीय लेखक' 2004 और 2005 के अंक में छपे। मगर उस संस्मरण में भी आपने मेरी उन बातों को कोई स्थान नहीं दिया। जबकि हमारे पत्र व्यवहार का इतना लम्बा समय बीता है, कितनी बातें होती रहीं हमारे पत्रों के बीच? मगर कहीं कोई जिक्र नहीं, जैसे वे कभी कही थीं ही नहीं। जबकि आप लिखते हैं- “मेरी साढे दस वर्ष की सजा खत्म होने में लगभग दो बरस बाकी रह गएथे। साहित्य व साहित्यकारों से मिले प्यार व सहारे ने मेरी सजा को आसान कर दिया था।''
यद्यपि
गोवा की सेन्ट्रल जेल में आपके साथ अन्याय हुआ, आपके
साहित्य शौक पर रोक लगाई गई, तब असगर वजाहत स्व.भीष्म साहनी,
स्व. राजेन्द्र यादव, मैनेजर पाण्डे लगभग तीस
साहित्यकारों के हस्ताक्षर के साथ की गई अपील से आपको न्याय मिला। यह बात आपने
अपने पत्रों में लिखी थी। आपकी उस पीड़ा को जानकर मुझे भी दुख हुआ था। आपको
पढ़ने-लिखने और पत्र पाने के अधिकार दिलाने में श्री विभूतिनारायण जी और सुमन्त
भट्टाचार्य जी का योगदान बहुत बड़ा है। ऐसे सहयोगी यदि सभी कैदी को मिलें, शोषण और अन्याय-अत्याचार से पीड़ित दलितों को भी मिलें, तो क्या उनके जीवन में भी परिवर्तन नहीं हो सकता ''.......... ( बहुत गहरी और सघन है उदासी।..... यह उक्त ख़त का अंश है।)
जाने
क्यों हम लोग खासकर जीवन को प्यार करने और
उसकी कामुक तहों से जुड़ाव की हद तक गहरे जुड़कर भावुकता के बेहद बीमार स्तर की तरफ
झुकाव हो जाता- और यही कुछ मेरे साथ भी
हुआ- कैदी सुधीर शर्मा से सहानुभूति अचानक ही खत्म हो गई- और घ्रणित तरह की
विरक्तियों सूग और हिकारत का घोलमेल सा बन गया था-- मगर हमेशा की तरह जब इस भावुक
जंजाल से बाहर निकला तो लगा भाई सतीश-- टिक जाओ, बाज
आओ... और बस लिखा हुआ लिखे की तरह ही लेकर निकल लिया... मगर यह भी है कि जब स्कूली
दिनों में इस खंड को पढा तो युवतर लड़के की तरह ही- जो स्वाभाविक भी था, बड़ा नाम कमाता रहता अक्सर- जब तक कि ख्यालों की हीरोगिरी को दूसरा कोई
पात्र नहीं मिल जाता था। सुशीला जी टाकभौरे के चेहरे मोहरे को याद या कहें की
इमेजिनेशन में ढालते हुए. लगातार.... फिर भूल गया...।
● सतीश छिम्पा
आवारा की विदर्भ डायरी -
सड़क पर चलते हुए, ठप ठप, टप-टप की आवाज़ें, आगे जाकर बरसात के जमा हुए पानी की शांत, चुप, एकदम सन्नाटा,... जैसे सदियों पहले ही मर चुके हों शब्द, भाषा अलोप हो गई हो जैसे... दरख्तों, पौधों और पशु पक्षियों की भाषा, तितलियों, भँवरों और कबूतरों की भी भाषा जैसे अचानक लोप हो गयी हो। जैसे मर गया हो सब कुछ यहां, कुदरत का शब्दकोष जल गया लगता था। ज़बान बस बोझ थी। भाव सब अभाव में लौट लगाकर ठस गए थे।
Tuesday, 13 October 2020
हमारे पूरोधा - (१)
लोक भाषाओं में हमारे पुरोधा...
प्रेमचंद को या 'उसने कहा था' जैसी महान रचना देने वाले चन्द्रधर शर्मा गलेरी, या पंत, प्रसाद या भारतेंदु हरिश्चंद्र या फिर वैश्विक स्तर पर टॉलस्टॉय या बाल्ज़ाक या बाई जुई या मार्खेज.... आदि महान शख्सियत अपनी जो छब या छटा या रचनात्मक रूप गुण का प्रभाव रखते हैं वैसा ही असर रखते हैं हमारी लोक भाषाओं के महान मगर हमारी अज्ञानता के चलते अनजान बने रहने और अल्पज्ञात समझे जाने वाले रचनाकार...... भाई वीर सिंह, मोहन सिंह, जसवंत कंवल, गुरदयाल सिंह, गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी आदि....... और अजमेर सिधु भाई एक अद्भुत कहानीकार जिनको अगर मैं समकालीन पंजाबी कहानी का लीजेंड कहूँ तो भी अतिश्योक्ति नही होगी, अपनी अद्भुत कहानियों के बावजूद इस महान काम के लिए प्रसिद्ध हैं। हिंदी जमात या कहें भारतीय भाषाओं के पाठक अगर इन महान वीरों के अवदान बाबत जो थोड़ा बहुत जानते हैं - वो सब अजमेर भाई के मार्फ़त या कहें उनकी लिखतों के मार्फ़त अमर हुआ है हमारा स्वर्णिम अतीत।
यह तस्वीर किसी भांत के महिमामंडन के लिए नही बल्कि दो अग्रज पुरौधा लेखकों की इस तस्वीर को देखकर आए समकालीन युवा रचनाकार के भीतर उठे भाव हैं जो तुलनात्मक या मूल्यांकन के लिए नही बल्कि दो समयों के भीतर के स्पेश को जानते हुए, इनके अवदान का परिचय भर देना चाह रहा है।
हमारे पुरौधा... (१)
गुरबख्श सिंह प्रीतलड़ी
गुरबख्श सिंह प्रितलड़ी का जन्म 26 अप्रैल 1895 को सियालकोट में हुआ था। उनके पिता का नाम पेशावर सिंह और उनकी माता का नाम मिलणी कौर था। उनके पिता की मृत्यु हो गई जब वह केवल सात वर्ष के थे। गुरबख्श सिंह आदर्शो पर चलने वाले, सत जीवन के और सकारात्मक दीठ के सूझबूझ और उज्ज्वल जीवन के स्वप्नदर्शी ही नही बल्कि उन देखे हुए स्वप्नो को हकीकतन रूप देने वाले व्यक्ति थे।
पंजाबी साहित्य के लियो टॉलस्टॉय की तरह से दिखने और व्यवहार और लहजा जो उनका मौलिक था। किसी दरवेश की तरह का पाक साफ और काल्पनिक या मिथकीय पत्रों की तरह अलौकिक चमत्कारी भेष और उजास भरे शब्द..... पंजाबी साहित्य के इस टॉलस्टॉय के लिए लोगो का मानना था कि वे दुनिया को बर्ट्रेंड रसेल की तरह एक समुदाय के रूप में देखना चाहते थे, बेशक अव्यवहारिक, मगर मिथ स्वप्नों सा रोचक है।
मार्क्सवाद के सिंपेथाइज़र थे और इस दीठ से वे अक्सर अक्टूबर क्रांति के महान कारज और उनके तेज गति से विकसित होने की प्रभावशाली स्थापनाओं और धारणाओं और सिद्धांतों से सहमत और प्रभावित भी थे, वे मार्क्सवाद के आर्थिक और सामाजिक समानता के इस महान सिद्धांतों के समर्थक थे। उन्होंने लोगों से जाति और रंग भेद से ऊपर उठने को कहा।
गुरबख्श सिंह मार्क्सवादी विचारधारा और सोवियत मेहनतकश व्यवस्था के बहुत करीब थे। वे पहले ही व्यक्ति थे जिन्होंने मैक्सिम गोर्की के महान रूसी उपन्यास "मदर" का पंजाबी में अनुवाद किया.... और 1971 में, उन्हें सोवियत नेहरू पुरस्कार मिला।
गुरबख्श सिंह पंजाबी में एक नई, मानव हित और प्रेमिल, मानवजनित विचारधारा को स्थापित भी किया और इस सिद्धांत पर अपने सभी कार्यों को अनुकूलित किया। प्लेटो के प्लेटोनिक प्रेम के नक्शेकदम पर चले सिद्धांतो को हल्का और धुंधला रहे भावों की तरह हटाने के बाजाए उन्नत मानवोचित स्वभावो का गांभीर्य भी स्थापित किए और परम्पराओं में थापित हुए, गुरबख्श सिंह ने प्यार को कब्जे की भावना के साथ असंगत बताया और सहज प्रेम की अवधारणा को समझाया। प्रीत झरोखा से उनके संपादकीय, लेख और कॉलम के बारे में चर्चा, जो कि प्रिटाल्डी में प्रकाशित हुई थी, पंजाब के पाठकों के बीच आम थी। स्वास्थ्य पर उनके लेख युवा लोगों में नई स्वस्थ सोच विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
उन्होंने सियालकोट से 10 वीं पास की थी। उन्होंने लाहौर में उच्च अध्ययन के लिए कॉलेज में प्रवेश किया। आर्थिक तंगी के कारण, उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया क्योंकि खेतीबाड़ी बहुत जरूरी थी जिसके बिना घर की तरफ देखा तक नही जा सकता था.... साथ ही आजीविका में रुपये के लिए क्लर्क की नौकरी कर ली। फिर उन्होंने सेना में भर्ती होकर इराक और ईरान का रुख किया। वहाँ उन्होंने एक ईसाई मिशनरी रेवरेंड मिस्टर स्टैंड से मुलाकात की और उनकी सलाह पर आगे पढाई जारी रखी।
उन्हें इंजीनियरिंग में उच्च अध्ययन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका के मिशिगन विश्वविद्यालय में दाखिला दिलाया। उन्होंने 1922 में इंजीनियरिंग में अपनी बीएससी की डिग्री प्राप्त की। जब वह लौटा, तो उसे रेलवे में नौकरी मिल गई।
1932 में इस नौकरी से मुक्त होकर, उन्होंने नौशेरा की जगह पर जमीन ली और खेती, वैज्ञानिक ढंग से और स्थानीयता के भरपूर गहरे अनुभवों और वैज्ञानिक तरीके की सांझ से खेती शुरू की।
एक आदर्श समाज बनाने के लिए लोगों को प्रेरित करने के लिए सितंबर 1933 में एक मासिक पत्रिका प्रितलारी का प्रकाशन शुरू किया। प्रितलारी पंजाबी पत्रकारिता के क्षेत्र में एक मील का पत्थर था। यह मासिक पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय हुआ साथ ही पंजाबी अदब में वैज्ञानिक, या कहें आधुनिक बदलाव बिंदु भी स्थापित किए, प्रयोगों को जमीन जो वैचारिक हो को यहां मुहैया करवाया।
उठापटक अलगावों भरे तीसरे दशक में वे मॉडल टाउन लाहौर चले गए। कुछ साल बाद, 1938 में, उन्होंने 15 एकड़ की जमीन बराबरी से लाहौर और अमृतसर के बीच प्रीत नगर की स्थापना की। 1947 में देश के विभाजन के दौरान, प्रीत नगर निर्जन हो गया था और वे दिल्ली चले गए लेकिन वहाँ उन्हें यह पसंद नहीं आया। वह 1950 में प्रीत नगर लौट आए और उनका पुनर्वास किया और उनकी मृत्यु तक वहीं रहे।
जसवंत कंवल (२)
भारतीय भाषाओं का बाबा बोहड़- कंवल
इधर भारतीय भाषाओं के कुछ महान लेखक जिनसे हिंदी के पाठक अभी तक भी परिचित नही है- में से एक जरुरी नाम है जसवंत कंवल। उनका चर्चित उपन्यास - "लहू दी लौ’ पंजाबी में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है।
सन 1967 ई में पंजाब में नक्सलबाड़ी लहर ने दस्तक दी थी। उस लहर ने कई गहरे प्रभाव पंजाब के जनजीवन पर छोड़े जो भूले नही जाते और जख्म कायम हैं। जसवंत सिंह कंवल का लिखा उपन्यास ‘लहू दी लौ’ भी इनमें से एक है। इसके अनगिनत संस्करणों की पाँच लाख से ज्यादा प्रतियां पढ़ी गई। 1970 के बाद जसवंत सिंह कंवल ने इसे लिखा था। जब इसकी पांडुलिपि प्रकाशन के लिए तैयार हुई तो पंजाब में इसे किसी ने नहीं छापा। फिर आपातकाल लागू हो गया था तो संभव ही नही रहा।
नक्सलवादी आंदोलन का खुला समर्थन करने वाले कँवल ने उपन्यास 'लहू की लो' पँजाबी में इस संघर्ष के ऐतिहासिक दस्तावेजों की तरह लिखा। इसकी पांडुलिपि को प्रतिबंधित कर दिया गया था। आखिरकार उन्होंने ‘लहू दी लौ’ सिंगापुर से छपवाया और गुप्त रूप से उसे पंजाब लाया गया। प्रतिबंधित होते हुए भी उस समय ब्लैक में 700 रूप में बिकने वाला यह संसार का एकमात्र ही उपन्यास है। पंजाब में तो बहुत बाद में यह आपातकाल हटने के बाद प्रकाशित हुआ, तब भी लोगों ने इसे खूब खरीदा और पढ़ा। लहू दी लो इंकलाबी पराक्रम और दुखांत और पंजाब के किसानों (खेतिहर मज़दूरों) के संघर्ष, उनकी मुश्किलों और उस दौर में नक्सलवाद की बहस तलब प्रासंगिकता का गान था।
'"लहू दी लौ’ पंजाबी में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद भी खूब पढ़ा गया। बहुत सघन कृषि क्षेत्र में आर्थिक असमानता और समाज में जमीनी स्तर पर विचर कर वह उसका सूक्ष्म अध्ययन किया करते थे, इसीलिए उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज की ऐसी छवियां और परछाइयां और पहलू मिलेंगे जो कहीं नहीं हैं। लोक की नब्ज़ पकड़ने वाला यह रचनाकार पंजाब का रसूल हमजातोव कहलाता है। उनकी रचनाओं पर लेव टॉलस्टॉय की छाप बिल्कुल भी नही है लेकिन शायद डीलडौल और जीवन शैली के चलते उन्हें टॉल्स्टोय कहा जाता रहा है। वे सत्ता के खिलाफ जाते हुए सिख अलगाववादी आंदोलन से भी खुली सहानुभूति रखते थे ।
उनको महत्वपूर्ण रचनाओं में मुख्य है - "सत्य को फांसी, पूर्णिमा, पाली, रात बाकी है, मित्र प्यारे को, साथी, बर्फ की आग, लहू, की लौ, जिंदगी दूर नहीं चर्चित रचनाएं रहीं। उन्हें मरना है कि जीना, लहू की लौ, कहानी पुस्तक मुक्ति मार्ग, रूपधारा, मानवता, मोड़, सिविल लाइंस, जंगल के शेर, रात बाकी है, पूर्णिमा, मित्र प्यारे को, गोरा मुख्य सज्जनों का, सत्य को फांसी, देवदास, रूह का साथी, कीचड़ के कमल, जिदगी दूर नहीं, सिदूर, कांटे, हाल मुरीदों का, अपना राष्ट्रीय घर, जित्तनामा, उठो सूरमा, नए सुरमे, हाउका और मुस्कान, आराधना, भावना, जीवन आदि पुस्तकें रखकर पंजाबी साहित्य को समृद्ध किया।
कंवल की अपनी दिनचर्या किताबों, लेखन, खेतों और गांव की हथाई और चर्चाओं और लिखने की मेज पर ही शुरू और खत्म होती थी। जसवंत सिंह कंवल ने आपात काल के समय और उससे पहले नक्सलवाद व बाद में पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ अपनी कलाम चलाई। उन्होंने लहू की लौ उपन्यास में नक्सलवाड़ी महान उभार को ओजस्वी स्वर दिए थे। उस समय देश में इमरजेंसी लगी होने के कारण कोई भी पब्लिशर जसवंत सिंह कंवल की इस पुस्तक को छापने के लिए तैयार नहीं था- ऊपर जो बताया कि विदेश में छपने के बाद जब यह पंजाब आया- तो पाठकों का रैला सा उमड़ पड़ा इसको खरीदने पढ़ने के लिए।
जसवंत कंवल एक ऐसा नाम जिसने अपनी सो साला ज़िंदगी मे अनवरत अस्सी साल तक लिखा। और जिसको पंजाब का रसूल हमजातोव तक कहा जाता है। जो मार्क्सवादी रचनाधर्मी होने के साथ ही- लगातार निर्विरोध चुना जाने वाला शरीफ ग्रामीण सरपंच के तौर पर भी प्रसिद्ध था- यह गजब का तथ्य है कि जसवंत कंवल अनेक बार गाव के निर्विरोध सरपंच चुने गए। वे पंजाब, पंजाबी सभ्याचार और समाज के हर उतार-चढ़ाव से बखूबी वाकिफ थे, यहीं कारण है कि उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज की ऐसी छविया और परछाइया और पहलू मिलेंगे जो अन्यत्र कहीं नहीं हैं। लोक रंग की उनकी समझ बहुत सूक्ष्म थी जो उनके किसी दूसरे साथी में नहीं पाई गई, इसीलिए जब लोग उनको पंजाब का रसूल हमजातोव' कहते है तो आश्चर्य नही होता।
अजमेर सिधु- वैचारिक नींव (३)
अजमेर सिद्धू ... बेमिशाल कथाकार और जीवन का चितेरा
(25 मई के दिन बंगाल से उठी एक प्रचंड लाल इंकलाबी लहर जिसने ना केवल बंगाली बल्कि आंध्रा और पंजाब को भी रंग दिया इंकलाबी रंग में... और साहित्य को इंकलाबी कविताओं और गीतों का खजाना भी दिया था।)
.....अजमेर सिद्धू ना होते तो मुमकिन नही था शायद यह खजाना सहेजना अगर मुमकिन था भी तो इस बेहतरीन तरीके से नहीं होता। अजमेर भाऊ मेहनतकश वर्ग के हिमायती रहे हैं। विचार और वर्ग सर्वहारा, के प्रति प्रतिबद्ध। ''गदर से लेकर नक्सली तक'' (शहीद बाबा बूझा सिंह जी की जीवनी), 'लालसिंह दिल, सन्तराम उदासी की जीवनी भी इन्होंने ही लिखी- ''क्रांति लई बळदा कण कण" नाम से उदासी पर गजब काम किया है। मूल रूप से कहानियां लिखते हैं। अजमेर के चार कहानी संग्रह छप चुके हैं।
पंजाबी साहित्य पर कम्युनिष्ट किसान उभार का बहुत गहरा और भरपूर प्रभाव पड़ा था जो आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाता है। इस इंकलाबी दौर और उसके बाद के लेखक कवि विस्फोट की तरह निकले थे। लेकिन उन तक या उनकी लिखतों तक पहुंच बनानी भी तो आसान नही थी। भले ही कोई कितना ही झूठ बोले या स्थापित करना चाहे लेकिन आखिरकार यह स्वीकार करने में कोई मुश्किल नही होनी चाहिए कि अगर पंजाबी के युवा रचनाकार (सौभाग्य से मेरे दोस्त भी हैं।) अजमेर सिधु जी के ही प्रयासों, लग्न और मेहनत का नतीजा है कि आज हम पंजाबी की क्रांतिकारी विरासत के संतराम उदासी, बाबा बूझा सिंह और लाल सिंह दिल जैसे इंकलाबी कवियो से परिचित हैं। जसवंत कंवल ने 'लहू दी लो' उपन्यास लिखा जो इसी पृष्टभूमि पर था- प्रतिबंध लगाने के कारण वाया सिंगापुर, उस समय 600- 1000 रुपये तक के ब्लैक में बिका था, एक ही महीने में इसके सभी कॉपी बिक गई थी।
25 मई 1967-69 और 1969 से 1970 ई. तक के तीन साल लगातार चलने वाला महान किसान उभार और संघर्ष जो 1972 ई. में खत्म हुआ अति -आत्मविश्वासी नेतृत्व और स्थितियों को समझे बिना लिए गए निर्णयों के कारण और अन्य हुई गलतियों के चलते वे युवा कतारें जो शहीद हुए या जो दमन और टॉर्चर के कारण हीन हो गए। या जो आए थे उभर कर कलाओं की राह से या भूमिगत जीवन से जो निकले थे। यह दुखांत था एक ऐसे क्रांतिकारी उभार का जो तेलंगाना से भी आगे जा सकता था। लीडरशिप की मूर्खताओं और निर्णयों के चलते असंख्य युवाओ की शहादत और तसदत्त और मौत के बाद तीन साल में ही राजसत्ता के दमन से यह बिल्कुल खत्म हो गया।
पश्चिम बंगाल के बाद पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी नक्सल लहर में पंजाब के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। मास्टर हरपाल से लेकर जसवंत कंवल और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे, वे भी शामिल हुए थे। बलदेव सिंह मान, सतनाम, अवतार पाश, लाल सिंह दिल, संतराम उदासी, दर्शन खटकड़ और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।। उनमें से कई तो कालजई कविताओं के रचयिता भी थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे सब जो उस समय या उसके बाद खालिस्तानी अतिवाद के शिकार हुए वे अद्भुत सर्जक निकले। सन्तराम उदासी, पाश, खटकड़ और लालसिंह दिल जैसे अनेक बेहतरीन क्रांतिकारी कवि थे। राज सत्ता और धार्मिक अतिवादी, लोकल बुर्जुआ किसी भी नक्सल को बख्शना नहीं चाहते थे।
भयानक गरीबी, आर्थिक सामाजिक असमानता, अन्याय, शोषण कुपोषण और राज सत्ता के बर्बर दमन और अनदेखी के विरुद्ध उठे प्रचण्ड आक्रोश की लहरों के साथ इंकलाबी लाल परचम उठाए युवा क्रांतिकारियों को उस समय ताजा उठे नक्सलबाड़ी किसान उभार से आस बंधी और वे सभी युवा जो जीवित थे, क्रांति की महिमा से वाकिफ़ थे, इस लहर में शामिल हुए। यह अलग मुद्दा है कि कुछ तानाशाही और मूर्ख नेतृत्व के कारण एक महान उभार कुछ ही समय मे दमन का शिकार होकर खत्म हो गया।
यह लहर पश्चिम बंगाल के बाद आंध्रप्रदेश और फिर पंजाब में प्रचण्ड रूप से उठी थी। इसमें पंजाब सहित देश के बहुत से युवा लाल झंडा उठाकर शामिल हुए थे। इस क्रांतिकारी लहर ने जब तक दुःसाहस की लाइन नहीं पकड़ी तब तक यह एक खालिस मानव मुक्ति का युद्ध थी जिसमे अनेक कवि, लेखक, कलाकार, रंगकर्मी आदि खुलकर शरीक हुए और शहीद बाबा बूझा सिंह जैसे वयोवृद्ध पूर्व में ग़दर लहर और पार्टी से जुड़े हुए व्यक्ति भी इसमें शामिल थे। हाकिम के अन्याय और अत्याचार से व्यथित होकर वे भी शामिल हुए थे। अनेक कवियो की कविता का जन्म भी इसी समर में हुआ। हरभजन सोही, अमर सिंह अचरवाल और दर्शन खटकड़ जैसे और बहुत से युवा इसमे शामिल थे।
लाल सिंह दिल जो बेहतरीन क्रांतिकारी के साथ कवि भी थे जिनका घर किसी खंडहर की तरह हो गया था। इस महान क्रांतिकारी कवि को पंजाबी और भारतीय भाषाओं के साहित्य में हाशिए पर डाल रखा है। इनके अब तक के संग्रह जो मैंने मूल पंजाबी में पढ़े हैं, वे निम्न है, 'सतलज की हवा', 'बहुत सारे सूरज', 'सत्थर', और आत्मकथा 'दास्तान' (दास्तान मैंने नहीं पढ़ी अभी), हालांकि वे चर्चित थे मगर उस तरह से नहीं जिस तरह से उन्हें होना चाहिए था। जबकी पाश की प्रसिद्धि उनकी शहादत के कारण भी हुई थी। यह बाद का मुद्दा है कि किसी ने सार सुध नहीं ली। महान लेनिन के राष्ट्र राज्य सिद्धांत से दोलित होकर ट्राटस्की की तरफ मुड़ जाना या उनके विरोधियों द्वारा यह कुत्सा प्रचार भी एक मुख्य कारण था।
सन 1967-69 और 1970-71 के साल गदर मचाने वाली नक्सल लहर के बहुत ज्यादा सक्रियता और उभार के साल थे। देश के हर एक संकट की मार आम आदमी पर पड़ रही थी । सन 1967 ई में पश्चिम बंगाल से शुरू होने वाली कम्युनिष्ट लहर जो एक महान कम्युनिष्ट क्रांति में बदलने लग गई थी की देन है पंजाबी साहित्य में आमूल चूल बदलाव और जीवन और उसकी गरिमा को स्थापित करने वाली इंकलाबी कविता का उत्स जो किसी उजास की तरह से हुआ था। जबकि इससे पहले जो प्रेम और व्यक्तिगत संघर्षों के महिमा मंडन, प्यार के बीमार पक्ष मतलब निराशा, जुदाई आदि का हावी होना बहुत अश्लील था। यह अमृता प्रीतम और शिव कुमार बटालवी का दौर था। शिव कुमार बटालवी के गीतों में प्यार के संक्रामक पक्ष, उसकी "बिरह की पीड़ा’ इस कदर सघन थी कि उस दौर में पंजाबी ही नही बल्कि भारतीय भाषाओं में कई बड़ी कवयित्री अमृता प्रीतम ने उन्हें ‘बिरह का सुल्तान’ नाम दे दिया था। शिव कुमार बटालवी पंजाबी का वह शायर जिसके गीत भाषाओ के बंधनों को तोड़कर आजाद हो चुके थे। पंजाब ही नही बल्कि उसकी ख्याति हर कहीं फैली थी। उसने जो गीत अपनी गुम हुई महबूबा के लिए किसी छुपे प्रेमी की तरह की इबारत की तरह लिखा था वो जब स्टेज पर होते तो अनेक फरमाइशें आती थी इस एक गीत की।
साहित्य पर कम्युनिष्ट किसान उभार का बहुत गहरा और भरपूर प्रभाव पड़ा था जो आज भी कहीं न कहीं देखने को मिल ही जाता है। इस इंकलाबी दौर और उसके बाद के लेखक कवि विस्फोट की तरह निकले थे। लेकिन उन तक या उनकी लिखतों तक पहुंच बनानी भी तो आसान नही थी। भले ही कोई कितना ही झूठ बोले या स्थापित करना चाहे लेकिन आखिरकार यह स्वीकार करने में कोई मुश्किल नही होनी चाहिए कि अगर पंजाबी के युवा रचनाकार (सौभाग्य से मेरे दोस्त भी हैं।) अजमेर सिधु जी के ही प्रयासों, लग्न और मेहनत का नतीजा है कि आज हम पंजाबी की क्रांतिकारी विरासत के संतराम उदासी, बाबा बूझा सिंह और लाल सिंह दिल जैसे इंकलाबी कवियो से परिचित हैं।
25 मई 1967-69 और 1969 से 1970 ई. तक के तीन साल लगातार चलने वाला महान किसान उभार और संघर्ष जो 1972 ई. में खत्म हुआ अति -आत्मविश्वासी नेतृत्व और स्थितियों को समझे बिना लिए गए निर्णयों के कारण और अन्य हुई गलतियों के चलते वे युवा कतारें जो शहीद हुए या जो दमन और टॉर्चर के कारण हीन हो गए। या जो आए थे उभर कर कलाओं की राह से या भूमिगत जीवन से जो निकले थे। यह दुखांत था एक ऐसे क्रांतिकारी उभार का जो तेलंगाना से भी आगे जा सकता था। चलते असंख्य युवाओ की शहादत और तसदत्त और मौत के बाद तीन साल में ही राजसत्ता के दमन से यह बिल्कुल खत्म हो गया था।
पाश और जयमल पढा, संतराम उदासी और दिल भारतीय समाज के थल्लड़े वर्ग के शोषण के विरुद्ध राजसत्ता के प्रतिरोधी तूफान की तरह खड़े हुए तो बाद में उनके संघर्षों के कवि भी थे।
एक अद्भुत कहानीकार जो पंजाबी का शोलोखोव (अक्सर मैं कहता हूँ भाई साहब को) है, अपनी अद्भुत कहानियों के बावजूद इस महान काम के लिए प्रसिद्ध हर हैं। हिंदी जमात या कहें भारतीय भाषाओं के पाठक अगर इन महान वीरों के अवदान बाबत जो थोड़ा बहुत जानते हैं - वो सब अजमेर भाई के मार्फ़त या कहें उनकी लिखतों के मार्फ़त अमर हुआ है हमारा स्वर्णिम अतीत।
● सतीश छिम्पा...
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अन्न दाता कौन है ? कुलुक किसान या सीरी ● सतीश छिम्पा पंजाब के युवा साथी सुखविंदर की एक...








